Friday, 19 December 2014

बच्चों की कूची से कौमी एकता को सलाम

आज अशफाक-उल्लाह खान और राम प्रसाद बिस्मिल के शहादत दिवस पर छात्राओं के बनाये चित्रों ने उम्मीद बरकरार रखने का हौंसला दिया है। कक्षा तीन की सामाजिक अध्ययन की परीक्षा में एक सवाल के संदर्भ में छात्राओं को किसी एक प्रार्थना स्थल का चित्र बनाने को कहा गया था। परीक्षा में उपस्थित 37 छात्राओं में से पांच मुस्लिम पृष्ठभूमि से थीं और 32 हिन्दू पृष्ठभूमि से। उन 5 में से 3 ने मंदिर बनाया और 32 में से 4 ने चर्च, 4 ने मस्जिद, 7 ने मंदिर व चर्च का मिश्रित चित्र, 1 ने मंदिर व मस्जिद का मिश्रित चित्र व 1 ने मंदिर, मस्जिद व चर्च का मिश्रित चित्र बनाया। विद्यार्थियों द्वारा धार्मिक पहचान और प्रार्थना स्थलों की इस निश्छल अभिव्यक्ति ने शहादत के इस दिन के कौमी एकता के स्वरूप को एक अनूठा सलाम दिया।











Tuesday, 2 December 2014

पर्चा : भोपाल गैस काण्ड और नन्हीं कली


आज से 30 साल पहले, 3 दिसंबर 1984 के दिन, भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी के रासायनिक खाद के कारखाने में जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। इसमें लगभग 3,000 इंसान उसी समय मारे गए और 20,000 से भी ज्यादा लोग धीरे-धीरे कुछ वर्षों के भीतर मारे गए। हजारों लोग हमेशा के लिए बीमार-विक्लांग हो गए और सैकड़ों बच्चे पैदा होने से पहले ही मर गए या विक्लांग पैदा हुए। आजतक कंपनी ने कारखाने व उसके आसपास के इलाके की सफाई करने की जिम्मेदारी नहीं निभाई है। इसका नतीजा यह है कि कारखाने के पास की जमीन व पानी भी प्रदूषित हो चुका है और लोगों की सेहत के लिए खतरा बना हुआ है।
हादसे के 26 साल बाद, 2010 में भोपाल की एक अदालत ने कारखाने के आठ मालिकों व अफ़सरों को विभिन्न धाराओं (घोर लापरवाही, गैर-इरादतन हत्या आदि) के तहत  दोषी करार देते हुए 2 साल की सजा सुनाई। हालांकि इनमें से किसी को भी एक दिन भी जेल में नहीं गुजारना पड़ा क्योंकि उन्हें जमानत मिल गई और आज मुकदमा अगली अदालत में चल रहा है। उन दोषियों में केशब महिन्द्रा प्रमुख थे। उस समय वे यूनियन कार्बाइड इण्डिया के चैयरमेन थे। बाद में यूनियन कार्बाइड कम्पनी को डाउ कैमिकल्स नाम की एक अन्य बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने खरीद लिया और हादसे की जिम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ना चाहा। मुआवजे की लड़ाई के दौरान डाउ कैमिकल्स की जन-संपर्क अधिकारी ने बयान दिया, ‘‘आप सचमुच में इससे ज्यादा नहीं कर सकते। एक भारतीय ख्के जीवन,  के लिए पांच सौ डाॅलर ख्लगभग 25-30 हजार रूपये, काफी अच्छी रकम है।’’ 
भोपाल गैस काण्ड के बारह साल बाद, 1996 में केशब महिन्दा एज्यूकेशन ट्रस्ट (के.सी.एम.ई.टी.) ने ‘नन्हीं कली’ नाम का एक दान आधारित कार्यक्रम शुरू किया। यही कार्यक्रम अब नंदी फाउंडेशन नामक संस्था के साथ भारत व दुनिया भर से अमीर व रईस लोगों से पैसे इकट्ठा करके चलाया जाता है।
नन्हीं कली में छात्राओं को कुछ सामान दिया जाता है मगर इसके बदले में कई छात्राओं को बेइज्जती का सामना करना पड़ा। जब कुछ छात्राएं इस टयूशन को छोड़ना चाहती थी तो कभी-कभी उन्हें जबरन रोक लिया जाता था और उन्हें इस तरह के शब्द सुनने पड़ते थे - सामान वापिस कर दे....सामान लेने तो आ गई आदि। इसमें ट्यूटर्स का दोष नहीं है। जब प्राइवेट कम्पनियां ऐसे कार्यक्रम चलाती हैं तो नीचे काम करने वालों पर एक जबरदस्त दबाव बनाती हैं जिससे उनके बर्ताव में भी बदलाव आ सकता है। दान से चल रहे किसी भी प्राइवेट कंपनी के कार्यक्रम में हमारा अपमान तो होना ही है क्योंकि उनके मालिक मेहनतकश लोगों को इज्जत-बराबरी से देखना ही नहीं जानते।
स्कूल में जब कोई शिक्षक अपनी छात्राओं को समझाते थे कि इस तरह के कार्यक्रम से उनकी पढ़ाई का भी नुकसान हो रहा है तो कंपनी के अफसरांे ने झूठा इलजाम लगा दिया कि वो छात्राओं के नाम काटने की धमकी व सजा दे रहे हैं। इसी तरह जब स्कूल में 1500 में से सिर्फ सौ-दौ सौ छात्राएं ट्यूशन के लिए रूकती थीं तब कंपनी अपनी रिपोर्ट में दावा करती थी कि स्कूल की सारी छात्राएं उनके कार्यक्रम में शामिल हैं।
हम लोगों को सोचना चाहिए कि जो प्राइवेट कम्पनियां (वेदान्ता, रिलायन्स, भारती एयरटेल.. आदि) किसानों-आदिवासियों की जमीनें हथिया रही हैं, अपने कारखानों में श्रम कानूनों का पालन नहीं कर रही हैं, ठेके पर मजदूरी करवा रही हैं और पर्यावरण को बेतहाशा नुकसान पहुंचा रही हैं, वो शिक्षा में - जिसमें उनकी कोई समझ व सरोकार नहीं है - अपनी दरियादिली क्यों दिखा रही हैं? वहीं दूसरी तरफ, मुआवजे के मुकदमे में कंपनी ने वह उदारता नहीं दिखाई जिसका इनके मालिक अपने दिखावी कार्यक्रमों में दावा करते हैं।
हमें यह भी समझना होगा कि आज के दौर में सरकारें ऐसे कार्यक्रमों व प्राइवेट कम्पनियों को इसलिये भी बढ़ावा दे रही हैं ताकि सरकारी स्कूलों को सुधारने, मजबूत करने की जिम्मेदारी से पीछा छुड़़ा सकें। आज जिस सामाजिक दायित्व की नीति के तहत ये देशी-विदेशी कंपनियां इस तरह के कार्यक्रम चला रही हैं उनसे सिर्फ इनकी करतूतों पर पर्दा डालने का मकसद ही पूरा नहीं होता है बल्कि इनका टैक्स भी बचता है। सबसे खतरनाक तो यह है कि ऐसे कार्यक्रमों से सरकारें अपनी जवाबदेही व जिम्मेदारी से बरी हो जाती हैं। दानदाताओं की पुण्य और परोपकार कमाने की भावनाओं के सहारे चलने वाले कार्यक्रमों से सबके लिए बराबरी, इज्ज़त की साझी व्यवस्था की उम्मीद भी खत्म हो सकती है। इससे समाज में व्यक्तिवाद, स्वार्थ व अलगाव की भावना बढ़ेगी। हम यह सोचने लगंेगे कि जब हमारे बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम हो गया तो हम क्यों फिक्र करें कि सरकारी स्कूल कैसा चल रहा है। 
नन्हीं कली कार्यक्रम का मकसद ही हल्का है। सभी छात्राओं को जहां तक वो चाहें वहां तक पढऩे और जो वो करना चाहें वो करने का अवसर होना चाहिए। (मगर इसके लिए समाज को बराबरी पर खड़ा करना होगा।) वहीं दूसरी ओर ऐसे कार्यक्रमों के मालिकों की चाहत है कि छात्राएं दसवीं पास करके कोई छोटा-मोटा काम करने लग जायें। अब जहां चाहत ही कम होगी वहां स्तर तो स्वयं हल्का हो जायेगा। देशी-विदेशी कंपनियां अगर हमारे बच्चों के लिए कोई कार्यक्रम चलाने का दावा करती हैं तो उन्हें बराबरी का हक देने के लिए नहीं बल्कि इस नीयत से कि उनको अपने कारखानों-दुकानों में कम मेहनताने पर काम करने वाले समर्पित मजदूर मिल सकें।
भोपाल गैस पीडि़तों के इंसाफ की लड़ाई आज भी जारी है। अब यह फैसला हम पर है कि जिन पूंजीपतियों, कंपनियों के मालिकों, धन्ना सेठों का धर्म-ईमान ही मुनाफा है और जो मजदूरों, श्रम कानूनों और पर्यावरण के प्रति खुद एक खतरा हैं, हमें और हमारे बच्चों को इज्ज़त की नजर से नहीं देखते हैं, उनके चलाये जा रहे तरस पर आधारित कार्यक्रम को हम अपना समर्थन दें या न दें। क्या यह लोगों की आंखों में दान एवं पैसे की धूल झोंककर अपने लालच, झूठ, बेईमानी और जुल्म पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं है? 

Friday, 28 November 2014

पर्चा : धार्मिक नफरत और हिंसा : शिक्षा के समक्ष चुनौती


स्कूलों की एक अनिवार्य भूमिका विद्यार्थियों को समाज में घट रहे अन्यायों, अत्याचारों के खिलाफ जूझने के लिए तैयार करना है|  आज हमारे देश में धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण तेज़ी से बढ़ रहा है| विभिन्न समुदायों के बीच सदियों से चलते आये सह-अस्तित्व पर व्यवस्थित ढंग से हमले हो रहे हैं| हमारे शहर में भी साम्प्रदायिक तनाव,  डर और हिंसा की आहटें डेरा डाल रही हैं। पिछले कुछ महीनों में एक-के-बाद-एक कई इलाके जैसे त्रिलोकपुरी, बवाना, ओखला, करबला, बाबरपुर इस तनाव से गुज़रे|
इस तनाव के कारण कुछ इलाक़ों में तो विद्यार्थियों का स्कूल आना पूरी तरह बंद हो गया| समाज में व्याप्त ऐसे डर का बच्चों के दिलो-दिमाग़ पर कितना गंभीर असर पड़ता होगा?  जब हिंसा और डर के माहौल में स्कूल बंद होते हैं तो सबसे ज़्यादा नुकसान उन इलाकों में हिंसा का शिकार हुए वर्गों के बच्चों का और खासतौर से लड़कियों का होता है (तमाम तरह की हिंसा  का निशाना बनना, बेघर होना, स्कूल का छूटना, उपस्थिति कम होना आदि) | त्रिलोकपुरी जैसे इलाकों में हुई हिंसा के बाद जो परिवार पलायन कर गए उनके बच्चों की स्कूली शिक्षा में आये विराम की ज़िम्मेदारी किसकी है?  
क्या हम बच्चों में इन तनावों से उपजे सवालों,  डर और क्रोध से जूझने के लिए तैयार हैं? क्या हम विद्यार्थियों को सहज और सुरक्षित महसूस कराने के लिए तैयार हैं? क्या हम अपने विद्यालयों में प्रेम और न्याय के बीज बोने के लिए तैयार हैं? इस पर्चे के माध्यम से हम ऐसे ही कुछ सवालों व उम्मीदों को साझा करेंगें|

भारत के संविधान से..
अनुच्छेद 51क. मूल कर्तव्य 
(ड.) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हैं। 
 (ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे। 
अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार)
सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने,आचरण करने और प्रचार करने का समान हक़ होगा। 
अनुच्छेद 28 (शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता)
(1) राज्य-निधि से पूर्णतः पोषित किसी शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। 
(3) राज्य से मान्यताप्राप्त या राज्य-निधि से सहायता पाने वाली शिक्षा संस्था में उपस्थित होने वाले किसी व्यक्ति को ऐसी संस्था में दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा में भाग लेने के लिए या ऐसी संस्था में या उससे संलग्न स्थान में की जाने वाली धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के लिए तब तक बाध्य नहीं किया जाएगा जब तक कि उस व्यक्ति ने, या यदि वह अवयस्क है तो उसके संरक्षक ने, इसके लिए अपनी सहमति नहीं दे दी है।  

हमारी ज़िम्मेदारी
1. व्यक्तिगत तौर पर अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आते हुए भी हम शिक्षक एक लोकतान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक समाज के निर्माण के लिए कार्यरत हैं| यह हमारे विवेक का ही परिणाम है कि हम अपने पूर्वाग्रहों से लड़ते हुए विद्यार्थियों को तर्कसंगत एवं निरपेक्ष माहौल उपलब्ध कराने की कोशिश करते हैं| यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि भारत के संविधान के मूलभूत आदर्शों (न्याय, स्वतन्त्रता, समता और बंधुत्व) को अपनी कक्षाओं तक लाएं|   

2. शिक्षक होने के नाते हमारी ज़िम्मेदारी है कि हमारे शिक्षण और व्यवहार में किसी विशेष जाति, धर्म, लिंग, नस्ल, क्षेत्र आदि को निशाना बनाने वाले प्रसंगों और टिप्पणियों का कोई स्थान न हो।
3. हमें यह आत्मसात करने की जरूरत है कि भारत एक विविधतापूर्ण देश है| हमें विभिन्न पृष्ठभूमियों के विद्यार्थियों को मिलजुल कर काम करने के मौके देने होंगे जिससे वे सामूहिक प्रगति के लिए प्रयासरत हों| वे सभी सामाजिक रूढ़ियों के पार जाकर  सहज दोस्ती करने और एक-दूसरे की संस्कृति को बिना पूर्वाग्रह के जानने के लिए प्रेरित महसूस करें|

4. शिक्षक होने के नाते हम  सभी विद्यार्थियों को बराबर प्यार, ध्यान और सहज माहौल देने की कोशिश करते हैं, पर आज जरूरत इस बात की है कि हम हाशिये पर धकेल दिए गए वर्गों से आने वाले बच्चों के प्रति अधिक संवेदनशील हों। बुद्ध, नानक, कबीर, रविदास, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई, भगत सिंह से लेकर अम्बेडकर तक की विरासत से हमें वो आधारभूत पैमाना हाथ लगता है जिसके अनुसार हम अपनी दिशा तय कर सकते हैं|

5. आज शिक्षकों को धर्म के सवाल से बचने की नहीं, उसे इतिहास के नज़रिए से समझने की ज़रूरत है| इतिहास से पता चलता है कि राज्य और धर्म के गठबंधन ने लोगों को मानसिक गुलाम बनाकर उनके हक छीने| रोम के कॉनस्टेनटाइन, उत्तरी भारत के समुद्रगुप्त, सऊदी अरब के खलीफाओं आदि ने किसी न किसी धर्म को राज्य धर्म बनाकर शासन किया| यह सदियों के संघर्ष की देन है कि हम आज एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के नागरिक हैं जिसमें हर व्यक्ति धार्मिक और राजनीतिक बराबरी का अधिकारी है|

6. धर्म के नाम पर फैलने वाली अफवाहों के उद्देश्यों को समझने की ज़रूरत है कि कैसे इन अफवाहों से आपसी विश्वास और संबंधों में दरारें उत्पन्न की जाती हैं| इसके लिए हमें चीज़ों को ठहर कर देखने और समझने की ज़रूरत है| यही समझ हमें अपने विद्यार्थियों में भी विकसित करनी होगी ताकि वे ऐसे परिपक्व  नागरिक बन सकें जो न भड़कते हैं, न भड़काते हैं, न गुमराह होते हैं, न गुमराह करते हैं। 

7. हमें ऐसी कहानियों को खंगालने और साझा करने की ज़रूरत है जिनमें सभी समुदायों ने मिलकर विभाजक ताकतों के खिलाफ़ संघर्ष किया| एक ओर साम्राज्यवाद के खिलाफ  लड़ने वालों में भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़ के क्रांतिकारी उदाहरण हैं तो दूसरी ओर गाँधी, सुभाष, खड़क सिंह, अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान आदि के जनांदोलनकारी उदाहरण भी हैं जिनमें सभी वर्गों की हिस्सेदारी रही। 1947 के खूनखराबे से लेकर आजतक हुए सभी नरसंहारों में हमें इंसानियत की लौ जलाए रखने वाले उन लोगों के उदाहरण भी मिलते  हैं जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से  जान की बाज़ी लगाकर दूसरे समुदायों के लोगों की जानें बचाईं, उन्हें शरण दी और मानवता के सच्चे आदर्शों का पालन किया|

8. हमारी पाठ्यचर्या, विशेषत: इतिहास की किताबों में अक्सर कुछ सन्दर्भों/घटनाओं को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जिससे परस्पर धार्मिक विद्वेष और संकीर्ण पहचान को मज़बूती मिलती है| यही सोच बाद में समाज के ध्रुवीकरण और सांप्रदायिक हिंसा के लिए ज़मीन तैयार करती है| वर्षों की कोशिशों के बाद कहीं-कहीं महिलाओं, दलितों, आदिवासियों व अल्पसंख्यकों की कहानियाँ, चित्र व उदाहरण झलकने लगे हैं| किन्तु यह कोई मोहरबंद उपलब्धि नहीं है| ऐसे में हमारा बौद्धिक दायित्व है कि विद्यार्थियों को विभिन्न  मुद्दों के विविध पहलुओं से संवेदनशीलता से परिचित कराएं।

9. हमारे स्कूलों को भी लोकतांत्रिक होने और विविधता को स्थान देने की ज़रूरत है। क्या सिर्फ उन्हीं संस्कृतियों से परिचय कराया जाए जिनका स्कूल में वर्चस्व है? अगर किसी स्कूल में एक भी बौद्ध-जैन या आदिवासी नहीं है तो क्या तब भी  हमारी ज़िम्मेदारी और बच्चों का हक़  नहीं है कि इनके बारे में जानें? स्कूल धर्म-प्रचार और दकियानूसी विश्वासों के स्थान नहीं हो सकते। हाँ, स्कूल ऐसे स्थल ज़रूर हो सकते हैं जहाँ हमारे रिश्ते किसी संकीर्ण विचारधारा के अधीन ना हों|

आज शिक्षा पर कई प्रकार के राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक हमले हो रहे हैं जिन्हें समझने और जिनसे जूझने के लिए पूरे शिक्षक वर्ग को साथ आना होगा| आज हमें खुद को समाज के दूसरे हिस्सों के संघर्षों से जोड़ने की ज़रूरत है, वे संघर्ष जो मेहनतकश द्वारा श्रम के ठेकाकरण तथा अस्थायीकरण के खिलाफ जारी हैं| जिस तरह अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर (पैरा/गेस्ट/स्थायी) शिक्षकों की लड़ाई कमज़ोर की जाती है उसी तरह सांप्रदायिक दरारें डालकर मेहनतकश वर्गों का संघर्ष भी कमज़ोर किया जाता है। धार्मिक हिंसा के बाद जहाँ मज़दूरों को और खराब परिस्थितियों में और कम मेहनताने पर काम करने को मजबूर होना पड़ता है, वहीं महिलाओं की थोड़ी बहुत आज़ादी पर भी डर के ताले लगा दिए जाते हैं।

शिक्षक साथियों से अपील

·         विद्यार्थियों को तर्कसंगत एवं निरपेक्ष शैक्षिक माहौल उपलब्ध कराएं जिनमें वे एक-दूसरे के साथ काम करें तथा अन्य संस्कृतियों के प्रति संवेदनशील बनें।
·         व्यक्तिगत भाषा एवं व्यवहार में किसी विशेष जाति, धर्म, लिंग, नस्ल, क्षेत्र आदि को निशाना बनाने वाली टिप्पणियों का विरोध करें।
·         विद्यार्थियों के सामने ऐसे आदर्श प्रस्तुत करें जिनसे वे आपसी मतभेदों और विवादों से निबटने के लिए हिंसा को नहीं संवाद को चुनें।  
·         धर्म के सवाल को समझने के लिए संकीर्णता से नहीं, ऐतिहासिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से काम लें।   
·         विद्यालयों को सही मायनों में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक स्थल बनाएं जहाँ धार्मिक पर्वों, प्रार्थनाओं पर पुन:विचार किया जाए।  
·         शिक्षकों के संघर्ष को समाज के अन्य वर्गों के संघर्षों के साथ जोड़कर देखें और सामूहिक संघर्ष के लिए प्रयास करें।  


पर्चा : वर्णवाद पर आधारित गैरबराबरी का पुरजोर विरोध करें।


मुक्ति अकेले नहीं मिलती,
अगर वह कहीं मिलती है,
तो सबके साथ मिलती है
0 मुक्तिबोध
साथियों , 
सदियों से जातिप्रथा का भयावह दंश झेलने वाले समुदायों से प्रतिरोध के स्वर उभर रहे हैं। यह प्रतिरोध दृढ संकल्प के साथ उपस्थित होता हुआ स्वर है जो अपने साथ चेतना, जागरूकता और निर्माण की गूंज लिए हुए है। भारतीय समाज जातिव्यवस्था के ताने-बाने की सड़ांध में इस तरह लिप्त है कि जैसे ही इस व्यवस्था के खिलाफ कोई आवाज बुलंद होती है तो सदियों से सत्ता पर काबिज वर्ग उन आवाजों को दबाने के लिए एकजुट हो उठते हैं। 
विभिन्न जातियों के बीच शक्ति-संबंधों को धार्मिक ग्रन्थों के जरिए सांस्कृतिक वैधता प्रदान की गई। भारत के इतिहास में शिक्षा ने ’उच्च’ जातियों के ग्रन्थों को ‘ज्ञान’ का श्रेष्ठ आधार माना और शोषित जातियों के अनुभव-संसार को हमेशा बहिष्कृृृृृृृृृृृृृत किया। यह त्रासदी है कि लोहार, नाई, धोबी, चर्मकार, बढ़ई, किसान, राजमिस्त्री जैसे मेहनतकश वर्गों ने जिस ज्ञान का सृृृृृृजन व विस्तार किया उसे शिक्षा में जगह ही नहीं दी गई, बल्कि शिक्षा ने एक हथियार की तरह उनके काम, रचनाओं और स्वाभिमान पर लगातार ऐसा प्रहार किया जिससे वे उबरने में आज तक संघर्षरत हैं। आज भी हमारे स्कूलों, कॉलेजों में जो शिक्षा मिलती है वह जाति आधारित ताने-बाने और संस्कारों को मजबूत करती हुई दिखाई पड़ती है। 
इस वर्णवादी व्यवस्था के कारण न जाने कितनी जिंदगियां छल और कपट का शिकार होकर मिट जाती हैं। फिर भी अगर किसी तरह कुछ दलित अपनी पहचान बना भी लेते हैं तो उनको कई तरह के हथकंडों से घेरा जाता है। जिस उपेक्षा और छींटाकशी का शिकार उन्हें होना पड़ता है वह उनके आत्मविश्वास को कुचलकर रख देता है, जिसकी परिणति एम्स और आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में दलितों की आत्महत्या जैसी घटनाओं में उभर कर सामने आती है। जहां कहीं भी दलितों ने नाममात्र की जमीन, शिक्षा व नौकरियां प्राप्त की हैं, अक्सर वहां उन्हें रोकने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है। बथानी टोला, लक्ष्मनपुर बाथे, बंत सिंह, खैरलांजी, गोहाना, मिर्चपुर, भगाना जैसी घटनाएं इसके कुछ उदाहरण हंै। 
जातिगत दुर्भाव के एक रूप को सरकारी विद्यालयों में मिलने वाली विभिन्न छात्रवृतियों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है, जहां फॉर्म भरने से लेकर छात्रवृृृृृृृŸिा मिलने तक दलित छात्र-छात्राओं को बहुधा असंवेदनशील प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। संविधान के तहत किए गए इन प्रावधानों के प्रति कई बार शिक्षकों व सहपाठियों की समझ एक संकुचित धारणा प्रकट करती है। जबकि स्थिति यह है कि एक तरफ ये अपर्याप्त राशि दलित वर्गांे के अधिकांश हिस्से को तो प्रमाणपत्र के अभाव में मिल ही नही पाती। दूसरी तरफ शिक्षा के बाजारीकरण के इस दौर में हमारे विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पा रहे हैंै। हमारे विद्यालय समाज का प्रतिबिंब हंै और जो विश्वास व मान्यताएं हम घर-पड़ोस से लेकर आते हैं, वहां उनका पुनर्बलन होता है। हमारी शिक्षा समाज में सही मान्यताओं का संचार करने और भेदभाव मिटाने में काफी हद तक असफल रही है और यह हमारे सामने एक गंभीर चुनौती है। 
यहाँ हमें एक और सवाल उठाने की जरुरत है कि क्या इस व्यवस्था में अन्याय सिर्फ दलित छात्र-छात्राओं के साथ हो रहा है या किसी न किसी रूप में सब बच्चे इसका शिकार हो रहे हैं। क्या हमारी शिक्षा एक न्यायसंगत समाज की कल्पना करने का अवसर दे रही है? क्या बराबरी पर आधारित समाज के निर्माण की लड़ाई सिर्फ दलितों की लड़ाई है या पूरे समाज की? आज हमें इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है। जब इंसाफ का सवाल शिक्षा व शैक्षिक संस्थानों के केन्द्र में होगा तो यह दलितों तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसमें महिलाओं, आदिवासियों, विक्लांगों, अल्पसंख्यकों और मजदूरों सभी की साझी लड़ाई शामिल होगी।  
हम अपील करते हैं कि-
-वर्णवाद पर आधारित गैरबराबरी का पुरजोर विरोध करें।
-समानता पर आधारित समाज के निर्माण में सहयोग दें। 

                             
ओमप्रकाश वाल्मिकीः साहित्य में दलित विमर्श स्थापित करने वाले साहित्यकार

हिन्दी सहित्य के क्षेत्र में दलित अस्मिता का प्रश्न उठाने वाले प्रारंभिक साहित्यकारों में ओमप्रकाश वाल्मिकी का नाम प्रमुख है। उनकी आत्मकथा जूठन वर्ष 1997 में आयी और इसने दलित अभिव्यक्ति को एक क्रांतिकारी पहचान दी। - दलित साहित्य के बारे में उनका कहना है-“दलित साहित्य समाज में समानता, भाईचारा और मानवीय स्वतंत्रता की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध है। समाज में मनुष्य ही सर्वोपरि है। इस प्रकृति में जो कुछ भी हमारे सामने है, वह मनुष्य की ही देन है। इसलिए मनुष्य की महत्ता को स्वीकार करते हुए दलित साहित्य मनुष्यता का साहित्य है।”
लेखन की दुनिया में कदम रखने के कारणों को बताते हुए उनके लेख मेरे लिखने का कारण के कुछ अंश-

  •  हजारों सालों की घुटन, अंधेरे में गुूंजती चीत्कारों और भीषण यातनाओं से मुक्त होकर जब कोई खुली हवा में सांस लेने की कोशिश करता है तो उसके सामने सिर्फ चमत्कृत कर देने वाली चकाचैंध ही नहीं होती, उसकी अपनी अस्मिता का सवाल और पहचान भी उतनी ही तीव्र होती है। अज्ञानता और उत्पीड़न की परतों को तोड़कर जब पुस्तकों में छपे ‘शब्दों‘ से साक्षात्कार हुआ, तो मेरे जैसे अनेक दलित लेखकों की अपनी अपनी अभिव्यक्ति फूटकर बाहर आयी, मूक वेदनाएं तड़प उठी और आक्रोशित चेतना साहित्य की एक ऐसी धारा के रूप में प्रवाहित हुयी जिसमें मुक्ति-संघर्ष की अनुभूतियों को प्रचंड, दग्ध आवेग तो है ही, संवेदनाओं की सूक्ष्म प्रस्तुति भी है। इसमें यथार्थवादी जटिलताएं और मानवीय भावनाओं का महीन कसाव है, जो कलास्वादों और प्रतिमानों के पारंपरिक स्वरूप से भिन्न है। कल्पना के आधार पर सृजित गंभीर चिंतन से पूरित रचनाएं दलित पीड़ा को कभी उद्वेलित नहीं कर पायी।
  •  हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, मानवीय अनुभूतियों और संवेदनाओं की व्याख्या करने वाले विद्धानों व समीक्षकों के अंतः-करण जब संकीर्णताओं और घिनौनेपन से भरे हों, तब चुप कैसे रहा जा सकता है? ‘वसुधैवकुटुम्बकम‘ सूत्र वाक्य दोहराने वाले अपने ही धर्म और समाज के एक हिस्से को नारकीय स्थिति में पहुंचाकर उनके मानवीय अधिकार तक छीन लें तो महानता और शब्दों का खोखलापन स्वयं नंगा नाच हो जाता है। अशिक्षित 
  •  हिंदी साहित्य में जो सहज और सामान्य दिखाई पड़ता है वह सिर्फ बाह्य रूप है। भीरत ही भीतर ऐसा बहुत कुछ है जो ‘उन्हें‘ और ‘हमें‘ अलग अलग खेमों में बांटकर देखता है, यह एक भयानक ़त्रासदी है। तरह तरह के साहित्यिक आंदोलनों को समावेश कर लेने वाले हिंदी जगत को चारण काल, भक्ति काल, नवजागरण काल, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कहानी, नई कविता, जनवादी साहित्य, वामपंथी साहित्य, माक्र्सवादी साहित्य, गांधीवादी साहित्य, ललित साहित्य, वैदिक साहित्य, लौकिक साहित्य आदि कहने से कोई एतराज नहीं है, लेकिन दलित साहित्य या अंबेडकरवादी साहित्य कहने से उनकी भवें तन जाती है। सारी संवेदनाएं सूखे रेत की मानिंद मुठ्ठी से फिसल जाती हैं। वैचारिक असहमति को स्वीकार करने की परंपरा सिर्फ दिखावा है। 
  •  कुछ लोग अतीत पर गर्व कर सकते हैं, मेरे लिए अतीत एक भयावह स्याह रात है, जिसके गर्भ में असंख्य एकलव्य और शंबूक चीख रहे हैं, कितने ही कर्ण अपने जीवन रूपी धंसे रथ के कीचड़ से बाहर निकालने के संघर्ष में दिन-रात मारे जा रहे हैं। 
  •  दलितों को अस्पृश्य, अंत्यज बनाकर समाज से अलग कर देने के लिए इस देश में न तो कोई बाबर आया था, न कोई अंग्रेज। यहीं के हमारे अपने तथाकथित महान संस्कृति के लोग थे, जिन्होंने गत तीज हजार वर्षों में, जितने जुल्म ढाए, जितना शोषण किया, उतना तो विदेशाी शासक भी नहीं कर पाए। यह पीड़ा बार-बार उकसाती है, और मेरे लिखने का कारण बनती है। 



Monday, 27 October 2014

पर्चा : बुराड़ी स्कूल भवन को असुरक्षित घोषित करके विद्यार्थियों को कहीं और भेजने के विरोध में

दिल्ली के सम्मानित नागरिकों !

हम आपके सामने बुराड़ी विद्यालय के माध्यम से उभरी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आई हमारी शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई लेकर आये हैं। बुराड़ी स्कूल भवन को, जिसमें कि हमारे क्षेत्र के अधिकांश बच्चे पढ़ते हैं, अचानक इस सत्र के बीच में जबकि परीक्षाएँ होने वाली थीं, यह कहकर बंद कर दिया गया कि अब यह भवन बच्चों के पढ़ने के लिए सुरक्षित नहीं है। सुनने में आ रहा है कि अब इतने बच्चों को कहीं और भेजा जाएगा जो कि आस-पास तो कतई नहीं होगा। इस संदर्भ में हम आपसे कुछ सवाल साझा करना चाहते हैं-
प्रश्न: क्या स्कूल की इमारत अचानक खतरनाक घोषित हो गई ?
हमारा मानना है कि ऐसा नहीं है। यह इमारत अचानक खतरनाक घोषित नहीं हुई है बल्कि यह मरम्मत के अभाव में इस हालत में पहुँच गयी है। यदि इसका रखरखाव ठीक ढंग से किया जाता तो यह इस हालत में नहीं होती। इसके अलावा यह ठेकेदार द्वारा भवन बनाने में घटिया सामान लगाने की तरफ भी इशारा करता है।

प्रश्न: बुराड़ी के इस स्कूल में इतने अधिक बच्चे (लगभग सात हजार ) क्यों पढ़ते हैं ? 
हमारा क्षेत्र अभी नव-विकसित होता हुआ क्षेत्र है। हमारे इस इलाके में नए बसे हुए परिवारों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हमारे इस इलाके की जरूरत के अनुसार सही संख्या में स्कूल नहीं खोले गए और इसी कारण से एक ही विद्यालय में हमारे क्षेत्र के इतने बच्चे पढ़ने को मजबूर हैं।

प्रश्न: क्या बच्चों को सप्ताह में केवल तीन-तीन दिन स्कूल बुलाकर पढ़ाना ठीक है ?
हमारा मानना है कि यह बच्चों के साथ सरासर धोखा है। साथ ही, यह शिक्षा अधिकार कानून का भी खुला उल्लंघन है, जिसमें 6 से 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने की सरकार ने गारंटी दी है।

प्रश्न: क्या इस स्थिति को किसी भी तरह टाला नहीं जा सकता था? क्या सत्र के बीच में बच्चों की पढ़ाई में आई रुकावट को रोका नहीं जा सकता?
हमें लगता है कि अगर समय रहते, छुट्टियों में मरम्मत कराके, इलाके में प्राइवेट स्कूलों के दोपहर बाद खाली पड़े भवनों को सरकार के आदेश से बुराड़ी स्कूल की नई इमारत बनने तक स्कूल चलाने का इंतजाम कराके, क्षेत्र में सरकारी जमीनों पर समय रहते कक्ष बनाकर और निजी जमीनों को अधिग्रहित करके उन पर स्कूल बनाकर और सबसे बढ़कर पूर्व-नियोजित तरीके से समय रहते ही नए स्कूल खोलकर इस स्थिति से निबटा जा सकता था। मामला इच्छाशक्ति का भी है।
       
प्रश्नः क्या स्थानांतरण पर सभी बच्चे दूर के स्कूलों में जा पाएँगे?
हमें लगता है कि कई परिवार अपने बच्चों को दूर भेजकर नहीं पढ़ा पाएँगे। इस तरह सैकड़ों बच्चों की पढ़ाई छूट जाएगी। इसकी मार लड़कियों पर अधिक पड़ेगी। दूरी की वजह से स्कूल में बच्चों की हाजिरी भी कम हो सकती है। कुछ परिवार अपने दूसरे जरूरी खर्च कम करके अपने बच्चों की पढ़ाई और अपनी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को प्राइवेट स्कूलों के बाजार की भेंट चढ़ाने को मजबूर हो जाएँगे। जो बच्चे दूर के स्कूलों में स्थानांतरण ले भी लेंगे उन्हें अतिरिक्त वक्त, थकान, मारामारी और खर्चा वहन करना होगा। इस इलाकेे में ही नहीं बल्कि पूरी दिल्ली की परिवहन व्यवस्था की नाकामी से हम सब वाकिफ हैं - स्टूडेंट बस पास बनाए नहीं जा रहे, बसें हैं नहीं, हैं तो भरी रहती हैं, बच्चों के लिए रुकती नहीं या वो चढ़ नहीं पाते और दूसरी तरफ प्राइवेट स्कूलों के लिए धड़ल्ले से डी टी सी की बसें लगी हुई हैं।  

प्रश्नः ठेके पर काम करने वाले शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों का क्या होगा?
हमारा मानना है कि आज के दौर में जब सरकारें खुलकर निजीकरण को बढ़ावा दे रही हैं, पक्की नौकरियाँ खत्म करके सामाजिक असुरक्षा फैला रही हैं, मेहनतकश वर्गों के बरसों की लड़ाइयों से जीते गए हक छीन रही हैं और देशी-विदेशी कम्पनियों को जल-जंगल-जमीन व जनता के अन्य संसाधन सौंप रही हैं, स्कूल स्थानांतरित होने की गाज ठेके पर नियुक्त सफाई कर्मचारियों से लेकर शिक्षकों तक सभी पर गिरेगी।

प्रश्नः आज कितने विद्यालयों की इमारतें खतरनाक घोषित हो चुकी हैं? इनके बंद होने से फायदा किसे होगा ?
हमारे इसी इलाके में काली बिल्डिंग के नाम से मशहूर निगम के बुराड़ी बाल विद्यालय का भवन भी पिछले दो साल से खतरनाक घोषित होकर बंद है। उसमें पढ़ने वाले जो सैकड़ों विद्यार्थी पहले सुबह स्कूल जाते थे वो अब बगल के स्कूल में दोपहर बाद एक अन्य स्कूल के पहले से पढ़ रहे सैकड़ों बच्चों के साथ किसी तरह पढ़ने को मजबूर हैं। कइयों ने प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश ले लिया है। इसके बावजूद, नया भवन बनाना तो दूर, प्रशासन ने अबतक उस पुराने भवन को गिराने का काम भी शुरु नहीं किया है! दिल्ली के सौ से ज्यादा स्कूलों के भवन खतरनाक घोषित हो चुके हैं। जाहिर है, इस स्थिति से सीधा फायदा भवन निर्माण में लगे ठेकेदारों को और शिक्षा को बाजार में बेचने वाली चीज बनाकर मुनाफा कमाने के लिए निजी स्कूल खोलने व चलाने वालों को ही होगा।
             उपर्युक्त प्रश्नों के माध्यम से कुछ बातों पर रोशनी डाली गई हैं। शिक्षा का वही अधिकार मतलब रखता है जो बराबरी पर टिका हो। शिक्षा का अधिकार कोई सरकारी या प्राइवेट संस्था का अहसान या खैरात नहीं है। यह लोगों द्वारा लड़कर जीता गया हक है जिसका वादा संविधान भी करता है। स्कूलों में एक-एक दिन छोड़कर कक्षाएँ चलने लगें तो हम यह सोचकर संतुष्ट नहीं हो सकते कि चलो काम तो चल रहा है। विद्यार्थियों के लिए मुफ्त परिवहन की माँग उठाना भी बच्चों की शिक्षा के समान हक और राज्य सरकार की जवाबदेही का मसला है। सत्र के बीच में भी जब हजारों-लाखों बच्चे शिक्षकों का इंतजार कर रहे हैं तब हम यह हिसाब लगाकर संतुष्ट नहीं हो सकते कि चलो इतने शिक्षक तो हैं कि स्कूल लग रहा है। सब बच्चों के लिए उम्दा और बराबरी की शिक्षा के लिए लड़ने से ज्यादा गाइड, किताबों से परीक्षाएँ पास कराने को ही स्कूलों की जिम्मेदारी मानना खतरनाक है। जब 2009 में 6-14 साल के ही बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून संसद में पास हुआ तो उसके दायरे से 3-6 और 14-18 साल तक के बच्चे बाहर कर दिए गए। आज जब आठवीं कक्षा के बाद एक तरफ तो कानून बच्चों को शिक्षा का कोई अधिकार नहीं देकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देता है और दूसरी तरफ स्कूल के बाद की पढ़ाई के बिना अपनी पसंद की तो दूर कोई भी नौकरी मिलना नामुमकिन है, हम समझ सकते हैं कि शिक्षा की यह भेदभाव व ऊँच-नीच की व्यवस्था हमारे साथ एक धोखा है।

आइए हम सरकार से अपने बच्चों के लिए निम्न मांगे करें -

हमारे बच्चों के ळिए हमारे इलाके में ही स्कूल की व्यवस्था की जाए। 
सभी बच्चों के लिए स्कूल आने जाने के लिए मुफ्त परिवहन की सुविधा दी जाए। 
हमारे क्षेत्र के हिसाब से उचित संख्या में स्कूल खोले जाएँ। 
देश के सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था की जाए। 
देश में पड़ोस पर आधारित समान स्कूल व्यवस्था लागू की जाए।



राष्ट्रपति हो या मजदूर की संतान सबको शिक्षा एक समान

Thursday, 2 October 2014

शिक्षक डायरी : हमारे स्कूलों की बाल सभाएं

                                                                                      फ़िरोज़ अहमद



हमारे स्कूल में कई दफ़ा शनिवार को दैनिक सभा के बाद कुछ देर की बाल-सभा होती है। इसका स्वरूप पारम्परिक ही होता है - यानी कुछ छात्राएँ एक-एक करके कोई कविता, गीत आदि सुनाती हैं। मुझे नहीं पता कि अन्य स्कूलों में बाल-सभाओं का चरित्र कैसा है पर अपने स्कूल की 'मंचनवादी' सभाओं को देखते हुए ( और आयोजित करते हुए भी ) मुझे अपने बी एड के उन शिक्षक की आलोचनात्मक टिप्पणी याद आ जाती है कि मंच पर तथाकथित सांस्कृतिक प्रदर्शन करना मात्र स्कूल की सभाओं का मक़सद नहीं होना चाहिए। ( शायद वो यह कहना चाहते थे कि सभाओं का औचित्य विमर्श व संवाद को सार्वजनिक जीवन की लोकतान्त्रिक आदत बनाना है - अन्यथा तो वे कला को समाज के सरोकारों से काटकर अकादमिक-बौद्धिक संसार को ख़तरनाक रूप से अराजनैतिक बनाने का काम ही करेंगी। स्कूल की श्रेष्ठ संकल्पना में विद्यार्थी सभाओं में क़िस्से-कहानी तो सुनाएँगे ही मगर साथ ही इनका स्वरूप ऐसी बैठकों का होगा जिनमें वो स्कूली व व्यापक मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रखेंगे और स्वस्थ बहस करने की आदत डालेंगे। ) क्योंकि विद्यार्थियों की संख्या बड़ी है इसलिए ऐसी सभा के लिए उपयुक्त मौसम के अलावा माइक का सही होना भी अनिवार्य शर्त है। अधिकतर छात्राएँ जोड़ी में या तीन-चार तक के समूह में प्रस्तुति देती हैं। ( इस स्कूल में केवल छात्राएँ पढ़ती हैं। ) यह रोचक है कि अधिकतर छात्राओं की प्रस्तुति में स्कूल का प्रत्यक्ष योगदान नहीं के बराबर होता है फिर भी किताबों की कविताएँ काफ़ी लोकप्रिय मालूम पड़ती हैं। ख़ासतौर से ऐसी कविताएँ जिनके बारे में एक वर्ग में यह आलोचना व्यक्त की जाती है कि इनमें नैतिकतावादी मूल्य नहीं हैं। दूसरा बड़ा हिस्सा ( अगर पहला नहीं तो ) 'देशभक्ति/देशप्रेम' से जुड़े गीतों का होता है। स्कूलों में स्वतंत्रता व गणतंत्र दिवसों पर होने वाले आयोजनों में विद्यार्थियों की नियमित शिरकत की वजह से ऐसा होना स्वाभाविक भी है। बल्कि सच तो यह है कि चाहे राष्ट्रीय त्योहार हों या स्कूलों की आबादी के हिसाब से लोकप्रिय धार्मिक/स्थानीय/अन्य उत्सव हों, इन सभी में वयस्क कर्मचारियों से ज़्यादा उत्साह बच्चों में दिख रहा होता है। इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि हमारे स्कूलों में पढ़ने वाले मज़दूर वर्ग के बहुत से बच्चे ख़ासतौर से राष्ट्रीय त्योहारों पर अपने 'बेहतरीन' कपड़ों में स्कूल आते हैं। तीसरा नंबर धार्मिक आस्था से जुड़े गीतों का आता है। पहले मैं ऐसे सांस्कृतिक तत्वों को हतोत्साहित करता था - क्लास में शिद्द्त से और स्कूली स्तर पर कम-ज़्यादा - पर अब यह सोचकर इनसे समझौता कर लिया है कि प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की ये प्रस्तुतियाँ निश्छल होती हैं, उन्हें कम-से-कम अभिव्यक्ति के अभ्यास का मौक़ा देती हैं और अंततः स्कूलों के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को क़ायम रखने की वैधानिक ज़िम्मेदारी राज्य के कर्मचारी होने के नाते शिक्षकों की है, विद्यार्थियों की नहीं। फिर धार्मिक विश्वास के ये गीत/प्रार्थनाएँ स्कूल की दिनचर्या का औपचारिक हिस्सा नहीं हैं, केवल किसी विद्यार्थी की, किसी अवसर पर, कोई तात्कालिक प्रस्तुति हैं जिनमें हिस्सा लेना, जिन्हें सराहना किसी के लिए अनिवार्य नहीं है। ( पर क्या ऐसे मासूम कार्यक्रम दूसरों में धीरे-धीरे एक अलगाव की भावना नहीं पनपाएँगें? क्या इनसे एक ख़ास क़िस्म का माहौल नहीं बनेगा जोकि सांस्कृतिक रूप से स्कूलों की एकतरफ़ा छवि बरक़रार रखेगा? विशेषकर तब जब इन मासूम प्रस्तुतियों के ख़तरनाक पाठों पर शिक्षकों द्वारा भी स्वीकृति की एक मासूम चुप्पी बरती जाएगी। ) 
उस दिन भी जब मैंने माइक पर विद्यार्थियों को कुछ सुनाने के लिए आमंत्रित किया तो हमेशा की तरह कुछ क्षणों के प्रारम्भिक संकोच/आपसी फ़ैसले के बाद मंच पर एक लम्बी लाइन लग गई। ऐसे में अक़सर हमें लाइन में लगे अंतिम कुछ विद्यार्थियों और बाद में मंच पर आना चाह रही छात्राओं को 'अगली बार' का दिलासा देकर वापस भेजना पड़ता है। वैसे स्कूल में विद्यार्थियों की कुल संख्या के हिसाब से हम ईमानदारी से लाइन के लम्बे होने की ख़ुशफ़हमी नहीं पाल सकते - पाँच प्रतिशत विद्यार्थी ही तो मंच पर आते हैं और उनमें से भी अधिकतर चौथी-पाँचवीं के ही होते हैं। हाँ, एक चीज़ है जिसका श्रेय हम ले सकते हैं और वो यह है कि हमारी निरंतर ऐलानिया कोशिश रहती है कि वे अपनी-अपनी भाषा में कुछ प्रस्तुत करें। इसे मजबूरी को भुनाना भी कहा जा सकता है क्योंकि, जैसाकि मैंने ऊपर बताया, हमारी तरफ़ से उनको तैयार करने में कोई उल्लेखनीय योगदान वैसे भी नहीं होता है! जब चौथी कक्षा के विद्यार्थियों को आमंत्रित किया गया तो उनमें से मंच पर आई एक छात्रा ने वैष्णों देवी को सम्बोधित एक गीत सुनाया जिसमें बहन भाई पाने की प्रार्थना करती है। भजन के भाव से मैं तो विचलित हो ही रहा था पर उस दिन सुखद यह रहा कि मंच पर साथ खड़े एक साथी भी मेरे प्रतिक्रिया देने से पहले ही उस दौरान मुझसे बोले कि ऐसी चीज़ों से ही विस्फोट हो जाता है। कई कारणों से मुझे लगा कि वो धर्मनिरपेक्षता की मेरी समझ जानते हुए गीत के आस्था-विशेष से जुड़े होने की बात कर रहे थे। इस तात्कालिक अनुमान में मैं ग़लत भी हो सकता हूँ। मैंने गीत के लैंगिक विमर्श पर ही उनकी बात में बात जोड़ी और फिर गीत के ख़त्म होने पर माइक लेकर छात्रा की तारीफ़ करते हुए प्रार्थना के भाव पर एक आलोचनात्मक टिप्पणी कर दी। हमेशा की तरह मैंने महसूस किया कि ऐसे मौक़ों पर जितना सटीक मुझे बोलना चाहिए था , फ़ौरी प्रतिक्रिया देने के उतावलेपन में और कुशलता की कमी के कारण मैं अपनी बात फ़ूहड़ ढंग से ही रख पाया।   

मैंने महसूस किया कि मेरे उस छोटे-से कथन के बाद पास खड़े हुए उन्हीं साथी ने जो ताली बजाई वो सिर्फ़ उस छात्रा के गीत के लिए नहीं थी। ऐसा मुझे इसलिए भी लगा क्योंकि उसके गीत के दौरान या शायद उसके बाद उन्होंने हाल ही में राजस्थान में घटी उस घटना का ज़िक्र भी चिंतित स्वर में किया जिसके बारे में खबरों में यह बताया गया कि एक दो साल की बच्ची को दफ़नाने के बाद उसकी क़ब्र को समाधि रूपी दैवी स्थल की पहचान दे दी गई। मेरे लिए यह अप्रत्याशित इसलिए भी था क्योंकि इन्हीं साथी से मैं 'लाडली' योजना के बारे में यह सुन चुका था कि इसका उद्देश्य लड़कियों की शादी के लिए पैसे उपलब्ध कराना है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि उनके बारे में मेरे विचारों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन आ गया है बल्कि मुझे लगातार यह लग रहा है कि व्यक्तियों, वर्गों और समाजों में उथल-पुथल चल रही होती है और इस दौरान हमारे विचार-समूह कई बार असंतुलित, अव्यवस्थित होते हैं जिनसे किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव नहीं भी होता है। 
ख़ैर! मुझे माइक पर दो शब्द बोलकर ही संतोष नहीं हुआ और मैंने अपनी क्लास में पहुँचकर चर्चा आगे बढ़ाई। ( जिसेकि भाषण पिलाना भी कह सकते हैं। ) बात करने में मुझे इस बात से मदद मिली कि उस छात्रा की बहन मेरी क्लास में पढ़ती है। ( यह जानना भजन के बोलों और भाव को एक और संदर्भ दे गया कि वो तीन बहनें हैं और उनका कोई भाई नहीं है। तीसरी भी हमारे ही स्कूल की दूसरी कक्षा में पढ़ती है। ) मेरे सवालों की दिशा और निशाना भाँपते हुए मेरी क्लास की छात्रा का बचाव की भावना में कहना था कि उसकी बहन को उक्त भजन उसके मम्मी-पापा ने नहीं सिखाया है बल्कि वो उसने 'आंटी के फ़ोन' से सीखा है। अपनी क्लास से वक़्त निकालकर मैं उस छात्रा की क्लास में भी गया। इस तरह के 'बातचीत' के अवसर आने पर हमेशा की तरह मैंने सोचा था कि उक्त क्लास की शिक्षिका से अपनी चिंता ज़ाहिर करके उन्हें अपने स्तर पर इसे कक्षा व विद्यार्थी के समक्ष उठाने के लिए छोड़ दूँगा। मगर फिर हमेशा की तरह वही हुआ कि उक्त कक्षा अध्यापिका ने मुझसे ही 'समझाने' के लिए कहा और मैं भी हमेशा की तरह अपने को रोक नहीं पाया। रोचक यह था कि उन्हें मामले की जानकारी इसलिए नहीं थी क्योंकि स्वास्थ्य कारणों से वो सभा में उपस्थित नहीं रह पा रही हैं और जैसे ही उन्होंने यह सुना कि मैं उनकी कक्षा की छात्रा द्वारा सुनाए गए गीत पर कुछ बोलना चाहता हूँ तो उनको फ़ौरन यह लगा की ज़रूर यह गीत के धार्मिक विश्वास के संदर्भ में होगा! मैंने जल्दी से उन्हें बताया कि मेरी आपत्ति प्रार्थना द्वारा लैंगिक असमानता को पुनर्बलित करने को लेकर है। लेकिन इस बीच वो ( शायद मेरी छवि के कारण गीत के धार्मिक स्वभाव को लेकर ) और मैं ( अपनी उसी छवि को 'संतुलित' बनाने के चक्कर में भावना आहत न करने की हड़बड़ी में ) यह बोल चुके थे कि ऐसे गीत घर में गाए जा सकते हैं, मगर स्कूल में नहीं! स्कूल में अक़्सर ऐसे मौक़े आते हैं जब हमें गर्म लोहे पर चोट करनी होती है और हम चूक ही नहीं जाते बल्कि अपने औज़ारों को बोथरा कर देते हैं। फिर हम इन चुनौतियों से हमेशा एक क़दम पीछे चल रहे होते हैं - अगली चुनौती फिर हमें ग़ैरहाज़िर पाती है। उनकी कक्षा से भी मैं घिसे-पिटे संवाद बोलकर निकल गया। जब अपनी कक्षा में वापस आकर सवाल-जवाब का सिलसिला आगे बढ़ाया तो समय की अधिक उपलब्धता के कारण भी कुछ इत्मीनान से प्रक्रिया को अंजाम देने की स्थिति में था। 

वैसे ख़ासतौर से प्राथमिक स्कूल के विद्यार्थियों के संदर्भ में एक चिंता यह भी रहती है कि सही राजनैतिक चेतना व अभिव्यक्ति को बढ़ाने के प्रयास में हम उनके बालपन के सहज उत्साह को निष्ठुरता से कुचल न दें। शायद धार्मिक भावना के विरुद्ध बोलने के डर के अलावा सभा और उसकी कक्षा दोनों जगह आलोचना से पहले छात्रा/गीत की तारीफ़ करने का एक कारण यह भी था। साथ ही दूसरी कक्षा में जाकर उसके विद्यार्थी को उसके शिक्षक के सामने कुछ 'समझाने' में एक सत्ता के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का संकोच भी काम करता है। आख़िर कल आपकी बारी भी आ सकती है। मैंने देखा भी कि जब मैं उस छात्रा की कक्षा में अपनी बात कह रहा था तो वह सर नीचे करके बैठी थी। ( इस कारण भी कि मेरे उन तीनों बहनों के साथ दोस्ताना संबंध हैं और वो भी मेरे साथ खुलकर बोलती-चालती हैं व सहज विश्वास जताती हैं, उसकी उस 'आपराधिक' मुद्रा ने मुझे और ग्लानियुक्त दुविधा में डाल दिया। )
अपनी कक्षा में छात्राओं के साथ 'संवेदनशील' मुद्दों पर बात करते रहने की आदत के कारण और 'अपने इलाक़े' में सहज शिक्षकीय दादागीरी बरतने के अधिकार से लैस होने के एहसास की वजह से भी कक्षा में इस विषय पर विस्तार से पूछताछ करना सम्भव था। अन्य सवालों व बातचीत के बीच मैंने उनसे पूछा कि अगर कोई भजन में व्यक्त भाव के अनुसार बेटे की चाह रखे और फिर बेटी पैदा हो जाए तो उसका ( परिवार का ) रवैया क्या होगा। मैं चर्चा को लड़कियों को परिवार में उपेक्षित महसूस कराने वाले अनुभवों की ओर ले जाना चाह रहा था। एक-एक करके कई जवाब आते गए - 'मार देते हैं', 'अस्पताल में गिरा देते हैं', 'नदी में बहा/डुबो देते हैं', 'फेंक देते हैं', 'छोड़ आते हैं', 'बेच देते हैं', 'रिश्तेदार को गोद दे देते हैं' आदि। क्योंकि अर्जुन की तरह मेरा निशाना सिर्फ़ अपनी अपेक्षित, सूक्ष्म बात पर लगा हुआ था इसलिए इन जीने-मरने के मोटे उदाहरणों को मैं यह कहकर ख़ारिज करता गया कि ऐसा बहुत कम होता है। आख़िरकार मेरे कुछ और इशारा करने पर एक छात्रा ने यह कहकर मुझे संतुष्ट कर ही दिया कि अनचाही होने पर बेटी के साथ जो व्यवहार परिवार में होगा उसमें निहित उपेक्षा उसकी हिम्मत तोड़ देगी। मुझे नहीं मालूम कि जो संभावित प्रतिक्रियाएँ छात्राओं ने गिनाईं उनका स्रोत क्या था - फ़िल्में-धारावाहिक, समाचार, सरकारी प्रचार या अपने अनुभव। ये छात्राएँ 7-9 साल की हैं।

हालाँकि उनके जवाब सुनते हुए भी मैं भौंचक था पर सुकरातीय संवाद की धुन में मगन होने के कारण उस वक़्त मैं पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष की ओर बढ़ता गया। बाद में उन हैरान-परेशान कर देने वाले जवाबों को जब फिर याद किया तो परिस्थिति की गंभीरता समझ आई। इतनी कम उम्र में ही मेरी छात्राओं को अपने लैंगिक अस्तित्व से जुड़ी उन सामाजिक परिघटनाओं के बारे में बख़ूबी पता है जिनके हिंसक तत्व के सामने मेरा शिक्षण केवल सतही 'जागरूकता' तक सिमट जाता है। मुझे अपनी उन दोस्तों की याद आ गई जिन्होंने इस बात से साफ़ इंकार किया कि उनके साथ जातिगत भेदभाव हुआ है और फिर उसी साँस में ऐसे कई वाक़ये भी गिना दिए जब अड़ोसी-पड़ोसी से लेकर दोस्तों और कार्यस्थल के साथियों तक ने उनके मुँह पर अपमानजनक जातिगत टिप्पणियाँ की थीं! सच कहूँ तो मेरे लिए यह कोई नया सबक़ नहीं था बल्कि जबसे स्कूल में पढ़ा रहा हूँ तभी से यह देखता आ रहा हूँ कि पहली कक्षा में दाख़िल हुए बच्चे भी लैंगिक सामाजीकरण की एक मुकम्मल प्रक्रिया के प्रभाव से तैयार होकर ही आते हैं। हाँ, सबूतों की श्रृंखला में एक और कड़ी जुड़ गई। इन छात्राओं - लड़कियाँ कहने में एक अकादमिक/राजनैतिक संकोच होता है - के लिए उपेक्षा, तिरस्कार, परायापन आदि की दैनिक हिंसा जीवन का सामान्य हिस्सा है। सम्भवतः यहाँ भी यह विश्वास हो कि प्रत्यक्ष/प्रकट हिंसा वो है जो औरों के साथ घटती है। इसके बावजूद यह भी स्वीकारना होगा कि, शायद निजता के प्रति संभ्रांत वर्गों से अलग अनुभव-समझ रखने के कारण और कुछ हमारी कक्षा के माहौल के कारण भी, काफ़ी छात्राएँ ऐसी घटनाओं की जानकारी को साझा करती रहती हैं जिनसे पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की जा सकती है। मगर क्योंकि मैं जानता हूँ कि इनको परिवार में सहज प्यार भी मिलता है ( और लैंगिक हिंसा किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है ) इसलिए साधारण ज़िंदगी में छुपी कुरूपता को पहचानना, उसे नाम देना और फिर ललकारना एक चुनौतीपूर्ण काम लगता है। क्या सिर्फ़ यही काफ़ी नहीं था कि दुश्मन कहीं ताक़तवर, कहीं संगठित है कि अब हमें बताया जाता है कि वो अपनों में भी छुपा है? और तो और, अपने मायाजाल से एक प्रेतात्मा की तरह हमारे अंतस तक में प्रवेश करके वो हमें ही हमारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहा है!