Saturday, 23 April 2016

पर्चा : शिक्षित बनो ! संघर्ष करो ! संगठित रहो !


                     
बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा था इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई आततायी बहुमतदेश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।

                                                                                        (1939 Bombay legislative Council)

बाबासाहेब की बात से साफ जाहिर है कि किसी भी देश का हित उसमें रहने वाली दलित-दमित जनता के हित से अलग नहीं होता है। क्या देश में रहने वाले सभी समुदायों के हित एक-जैसे ही होते हैं या इनमें आपस में टकराव भी होता है? जाहिर सी बात है कि जहां पर भेदभाव, जुल्म होगा, वहाँ पर अधिकारों, आत्मसम्मान और न्याय की लड़ाई के लिए संघर्ष भी होगा।

जब एक तरफ दमन बढ़ेगा तो उसका प्रतिरोध भी होगा। रोहित वेमूला का संघर्ष और उनकी संस्थानिक हत्या इस बात का प्रमाण है। रोहित के लिए लगातार जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव का शिकार होना इतना भयावह था कि उन्होंने मजबूर होकर अपनी जान ले ली| उन्होंने अपने विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर को ख़त लिखा कि उके जैसे दलित विद्यार्थियों को दाखिले के समय ही 10 मिलीग्राम ज़हर या फांसी के लिए रस्सी दे देनी चाहिए क्योंकि वैसे भी बिना आत्म-सम्मान के वे ज़्यादा दिन यूनिवर्सिटी में जी नहीं पाएंगे| रोहित की स्कॉलरशिप बंद कर दी गयी थी और वो अपने गरीब परिवार को पैसे नहीं भेज पा रहे थे| एक गरीब दलित विद्यार्थी की स्कॉलरशिप बंद करना उस पर शारीरिक व मानसिक हमला है।
                                                                
हाल ही में राजस्थान के जैन आदर्श टीचर ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट की 17 साल की दलित छात्रा डेल्टा मेघवाल का मृत शरीर उनके छात्रावास के पानी के टैंक में मिला| मौत से एक दिन पहले डेल्टा को उनकी हॉस्टल वार्डन ने एक पुरुष शिक्षक का कमरा साफ करने को कहा थादेखा जाए तो ऐसा आदेश देना ही गलत है लेकिन सच्चाई यह है कि विद्यार्थियों से इस तरह के काम लेना एक आम बात है और अक्सर दलित विद्यार्थी, खासकर लड़कियाँ चाह कर भी मना नहीं कर पाती हैं। डेल्टा के साथ बलात्कार होने और मारे जाने की आशंका व्यक्त की गयी है| डेल्टा की हत्या की जांच अभी चल रही है लेकिन चुनौतियों को पार करके इतने असुरक्षित माहौल में पहुंची वो अकेली दलित विद्यार्थी नहीं है जिसकी शिक्षा यात्रा को मौत के अंजाम पर पहुँचा दिया गया हो| हाल के वर्षों में श्रेष्ठतम उच्च शिक्षा संस्थानों में 25 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की है| आखिर क्या वजह है कि इनमें से 23 विद्यार्थी दलित थे?

आज भी भारत के बहुत से गाँवों में दलित विद्यार्थियों को कक्षा में बैठने, पानी पीने, मिड-डे-मील परोसने, शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देने आदि स्तरों पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि दलित विद्यार्थियों के स्कूल छोड़ने का दर सामान्य विद्यार्थियों से कहीं ज़्यादा है। इसके कई सामाजिक-आर्थिक कारण भी हैं जिनमें जल-जंगल-जमीन से बेदखल किया जाना प्रमुख हैज़्यादातर दलित बच्चे अपने घर-खानदान-मोहल्ले से पढ़ने वाली पहली पीढ़ी के होते हैं| हम कल्पना कर सकते हैं कि अगर इतिहास में ज्योतिबा, सावित्री बाई और डॉ अंबेडकर की अगुवाई में लोगों ने संघर्ष ना किया होता तो हमारे सामने स्थिति और कितनी भयावह होती      

शिक्षा के इतर भी जाति व्यवस्था अपने संकीर्ण व क्रूरतम रूप में काम करती है। मार्च, 2016 में एक और अंतर्जातीय प्रेम विवाह में तमिलनाडु के त्रिपुर जिले में दलित लड़के शंकर और सवर्ण लड़की कौशल्या पर जानलेवा हमला किया गया। कौशल्या के परिवार वालों ने जाति के झूठे सम्मान को बचाए रखने के लिए इंजिनियरिंग के विद्यार्थी शंकर को मौत के घाट उतार दिया। शादी के आठ महीनों बाद यह हमला तात्कालिक गुस्से का परिणाम नहीं हो सकता| यह जातिगत सर्वोच्चता का अहंकार ही है जो अपने से निम्न माने जाने वाली जातियों से इस हद तक नफरत कराता है कि लोग अपने बच्चों की खुशियों की बलि और उनकी जान तक ले लेते हैं। पिछले तीन सालों में अकेले तमिलनाडु में ऐसी 80 हत्याएं हो चुकी हैं, जिनमें 80% मौतें महिलाओं की हुई| यह हमारी शिक्षा की भी विफलता है कि हमारा समाज आज भी डॉ अंबेडकर के और भारत के संविधान में दिये गए बराबरी, बंधुत्व, इंसाफ और आज़ादी के मूल्यों को आत्मसात नहीं कर पाया है।

तमाम तरह के भेदभाव के बावजूद संघर्ष करके जब कुछ दलित विद्यार्थी पढ़-लिखकर कामयाब होते हैं,  और समाज में सम्मान और गरिमा के साथ जीने की कोशिश करते हैं तो उन्हें खैरलांजी, मिर्चपुर, धर्मपुरी हत्याकांड जैसी जातिगत हिंसा का शिकार होना पड़ता है। जब वे अपने हकों की आवाज़ उठाते हैं, जायज़ मजदूरी की मांग करते हैं, शादी-बारात में घोड़ी पर चढ़ते हैं तो उन पर रणवीर सेना जैसी निजी सेनाएं हमला करती हैं। ऐसी दमनकारी शक्तियों को समय-समय पर सत्तापक्ष का संरक्षण मिलता रहा है। आज जब दलित शिक्षित और संगठित होक संघर्ष कर रहे हैं तो सत्ता पर काबिज तबका यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है और उन पर तरह-तरह के राज्य संचालित हमले कर रहा है।

ये भेदभाव सब जगह दिखाई पड़ता है। कहीं दलितों को पुलिस थाने और राशन की दुकानों में घुसने नहीं दिया जाता, तो कहीं स्थानीय हाट में सामान नहीं बेचने दिया जाताइससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कानून, शिक्षा, सत्ता, संपत्ति पर केवल कुछ वर्गों का ही कब्जा है। गाँव हो या शहर, सफाई – सकें-नालियाँ-घर-दफ्तरों में शौचालय, मैला ढोना - ऐसा काम है जो सिर्फ और सिर्फ दलित ही करते हैं| 10 लाख से ज्यादा मैला ढोने वालों में 95% दलित हैं| वो वर्ग जो संसाधनों का दोहन करने और कूड़ा पैदा करने में अगुवाई दिखाते हैं, वो कूड़ा साफ़ करने में आगे क्यों नहीं रहते? हरियाणा में पंचायती चुनाव में उम्मीदवार बनने के लिए जब ऋणमुक्त होने की शर्त के साथ दलित महिला की न्यूनतम शिक्षा पाँचवीं पास और दलित पुरुष की आठवीं पास रखी गयी तो 68% दलित महिलाएं और 41% दलित पुरुष पंचायती चुनाव में खड़े होने के लिए ही अयोग्य हो गए| यह कैसा लोकतन्त्र है जो हमेशा से दबाए गए तबके को हाशिये पर रखता है और फिर उन्हें अयोग्य बताकर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है तथा उन्हें ही उनकी स्थिति का दोषी घोषित कर देता है?   

आज दलित समाज जान चुका है कि उसे संस्थागत हिंसक तरीके से रोकने की हर संभव कोशिश की जाएगी लेकिन वह यह भी जानता है कि इन संघर्षों से गुज़रकर ही वह अपनी जगह बना पाएगा| दलित विमर्श देश को शिक्षित कर रहा है, तमाम संघर्षों को एकजुट कर रहा है, लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है और हमारे सामने कुछ नए सवाल खड़े कर रहा है जिनके जवाब हमें मिलकर ढूँढने हैं।

आप सादर आमंत्रित हैं
                                                      
कार्यक्रम: फिल्म प्रदर्शन और चर्चा    
तिथि: 24 अप्रैल [रविवार], 2016
समय: दोपहर 3:30 बजे
     स्थान: सत्य विहार चौपाल, बुराड़ी      

Saturday, 9 April 2016

सरस्वती पूजा- धार्मिक वर्चस्व पर सांस्कृतिक ठप्पा

अर्जुन 
युवा कवि व विद्यार्थी 

(लेखक ने कुछ समय निजी स्कूल में पढ़ाया है और उसी के अनुभव के आधार पर अपने विचार रखे हैं, बहुत से शिक्षक साथियों ने भी समय समय पर इस तरह के कार्यक्रम के अनुभव और अपनी परेशानियों को हमारे साथ साझा किया है --------------------------संपादक

सोमवार का दिन है। आज स्कूल अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक रौशन और जीवंत प्रतीत हो रहा है। ज़्यादातर लोग (अध्यापकगण) पीले वस्त्रों से सुसज्जित हैं। विद्यालय के प्रांगण में पधारने के पश्चात मैं समझ पाया हूँ कि आज सरस्वती के, ज्ञान की देवी के प्रतीक के रूप में, ज्ञान के मंदिर, स्कूल में, पूजन के लिए ये लोग पीले रंग के वस्त्रों से ऊपर से देखने पर एक रंग के तारे जैसे प्रतीत हो रहे हैं। सरस्वती को ज्ञान की देवी के प्रतीक के रूप में स्वीकारने के प्रश्न पर मेरा मस्तिष्क विचलित हो उठता है। मैं किसी भी कीमत पर सरस्वती को ज्ञान की देवी के रूप में स्वीकारे जाने के पक्ष में नहीं हूँ। ऐसा मेरी नास्तिक प्रवृत्ति होने की वजह से नहीं है बल्कि इसकी जड़ें मेरे सामाजिक और जातीय चिंतन में तलाशी जा सकती हैं। मैं इसे केवल दलितों से जोड़कर न देखूँ तो भी यह मुझे आदिवासियों की शिक्षा और शिक्षा के जिस रूप के वर्चस्व को मैं देख पाता हूँ, उन दोनों के बीच निराशा के सिवाय कुछ और दे पाने में असमर्थ है। शूद्र और दलित भारतीय जाति-व्यवस्था के वो अंतिम पायदान हैं जहाँ तक आते-आते केवल और केवल सरस्वती ही नहीं बल्कि दुनिया के किसी भी देवी-देवता की कृपा (अनुकम्पा) शिथिल पड़ जाती है। उन दलितों के लिए जिनकी हज़ारों पीढ़ियाँ तथाकथित शिक्षा व्यवस्था व ज्ञान प्राप्ति से न केवल रोकी गईं - बल्कि मंदिरों पर जाने पर आँखें फोड़ना, मंत्रोच्चारण पर ज़बान काट देना जैसी घिनौनी घटनाओं से साहित्य भरा पड़ा है - सरस्वती को ज्ञान के रूप में प्रदर्शित किया जाना और स्कूल की मुहर लगाकर उसे भारतीय परम्परा का हिस्सा बनाने की प्रक्रिया मुझे इस पीढ़ी के भविष्य की चिंताजनक कल्पना करने को मजबूर करता है। बात सिर्फ दलितों तक सीमित नहीं है। जनजातीय समाज, जिसके लिए ज्ञान के मायनों को भारतीय प्रभुत्वशाली वर्ग ने बिल्कुल बदल दिया है, उनकी संस्कृति, उनके त्यौहार, उनकी शिक्षा के लिए सरस्वती का ज्ञान का प्रतीक होना कहाँ तक सही है? साथ ही, मुस्लिम समुदाय की बात किये बिना ज्ञान और शिक्षा की बात करना विचित्र प्रतीत होता है।
अब इन सब बातों को ध्यान में रखें तो ऐसे धार्मिक वर्चस्व को संस्कृति का नाम देकर स्कूल - जोकि सार्वजनिक और धर्मनिरपेक्ष संस्था होने के लिए वचनबद्ध है - की चारदीवारी के भीतर लाने का विचार और कर्म शिक्षा के सभी सिद्धांतों के खिलाफ प्रतीत होता है। कोई भी ऐसा कार्यक्रम जो इस देश की आबादी के 50% दलित-शूद्रों, 20% मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों, बौद्धों, जैनों और 8-9 % आदिवासियों का प्रतिनिधित्व नहीं करता, स्कूल जैसी संस्था द्वारा उसका प्रचार किया जाना और उसे लगातार पोषित करते जाना मुझे बहुत खतरनाक प्रतीत होता है। इसलिए स्कूलों को, और विशेष रूप से दिल्ली के स्कूलों को जिनमें लगभग सभी धर्मों, वर्गों, सम्प्रदायों के बच्चे पढ़ते हैं, उन्हें किसी एक विशेष धर्म-समुदाय के धार्मिक अनुष्ठानों पर स्कूल की मुहर लगाकर मतारोपण का माध्यम नहीं बनना चाहिए। जब तक स्कूलों में इस तरह की गतिविधियाँ बनी रहेंगी तब तक मेरे जैसे अध्यापक के लिए यह दुःख का कारण होगा।     

धर्मनिर्पेक्षता के सिद्धांत और मेरा अनुभव

अर्जुन 
 युवा कवि और विद्यार्थी 

धर्मनिर्पेक्षता के सिद्धांत को वर्तमान सरकार ने जिस क़दर नेस्तोनाबूत किया है, उसका अनुभव मैंने मुज़फ्फरनगर, दादरी आदि जगहों पर हुए दंगों से उभरी कराहटों में महसूस किया है। असहिष्णुता के माहौल को भी महसूस करने के लिए वर्तमान परिस्थितियों में किसी व्यक्ति विशेष को बहुत अधिक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। नफरत और हिंसा से सरकार पाँव से लेकर सर तक जिस प्रकार भरी हुई है उसे आज देश के प्रत्येक कोने में महसूस किया जा रहा है। कहना न होगा कि यह इस असहिष्णुता के माहौल की ही उपज है जो मेरे जैसा युवा (जो कभी लेखन में रुचि नहीं लेता था और न लेने की सोचता था) आज अपने लेखन की शुरुआत सरकार विरोधी लेख से कर रहा है। कहते हैं कि व्यक्ति को उसके आसपास की परिस्थितियाँ निर्मित करती हैं। शायद माहौल मुझे ऐसा करने पर मजबूर कर रहा है। खैर, जब मैंने 'धर्मनिर्पेक्षता' से इस लेख का आरम्भ किया है तो यह भी बता दूँ कि अब से कुछ समय पहले तक मुझे समझ नहीं आता था कि इस देश के लिए 'धर्मनिर्पेक्ष' शब्द का प्रयोग क्यों किया गया था और कुछ लोग शुरु से ही लगातार भारतीयों में धर्मनिर्पेक्ष मूल्य विकसित करने के पक्षधर क्यों थे। लेकिन शायद अब मेरी कुछ प्रतिशत समझ पिछले कुछ सालों या महीनों के माहौल से बनी है, और उसे साझा करना चाहता हूँ। पहली बात तो जहाँ तक मुझे समझ आता है, इतिहास में अधिकतर लड़ाइयाँ और सबसे खतरनाक युद्ध - जिनमें प्रथम व द्वितीय विश्व-युद्ध भी शामिल हैं - उन लोगों के क्रियाकलापों का परिणाम रहे हैं जो धार्मिक रूप से बहुत ज़्यादा असहिष्णु रहे हैं। और अगर हम वर्तमान संदर्भों में भी देखें तो ISIS का अंतर्राष्ट्रीय चेहरा हो या अपने देश में दिल्ली, गुजरात में बड़े स्तर पर तथा हाल ही में दादरी, मुज़फ्फरनगर के दंगे, इनमें हमें धर्म के विश्वास व पहचान के तत्व साफ़ दिखाई देते हैं। 
धर्म से नज़दीकी कैसे लोगों की मानवता से दूरी बनाने में बल्कि मानवता के नरसंहार के रूप में किस प्रकार पुष्पित व पल्ल्वित हो रही है, यह आज की पीढ़ी के युवाओं के लिए शोचनीय प्रश्न है। 
अगर मैं इतिहास पर नज़र डालूँ तो मेरी आँखें कम-से-कम अभी तो ऐसी कोई लड़ाई, दंगा, युद्ध देख पाने में असमर्थ हैं जिसमें धर्मनिर्पेक्ष तथा नास्तिक लोगों ने मुख्य भूमिका निभाई हो। एक धर्मनिर्पेक्ष और नास्तिक व्यक्ति का निर्माण मानवता के सिद्धांतों को आधार बनाकर होता है। शायद इसीलिए वह व्यक्ति न तो समाज के लिए खतरा है और न ही समाज उसके लिए। मानवतावादी मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण जहाँ सभी को समान समझा जाता हो, स्त्री-पुरुष को केवल मानव की तरह देखा जाता हो, न कि ताक़तवर और कमज़ोर के रूप में, ऐसे समाज के निर्माण का दायित्व केवल धर्मनिर्पेक्ष और नास्तिक लोगों को ही दिया जा सकता है। और शायद इसी दूरदर्शिता से प्रेरित होकर संविधान निर्माताओं ने एक धर्मनिर्पेक्ष भारत की कल्पना की थी और प्रत्येक भारतीय में धर्मनिर्पेक्ष मूल्यों को विकसित करने की ज़िम्मेदारी शिक्षा व्यवस्था पर छोड़ी थी। लेकिन 90 के दशक के बाद बदले शिक्षा के चरित्र ने स्थिति को बद से बदतर बना दिया है, और कम-से-कम मुझे तो इसका अहसास अब होने लगा है। 
  
(अर्जुन शिक्षा के विद्यार्थी हैं और शिक्षा के विभिन्न मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहते हैं। इन्होने कुछ समय प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया भी है )

Sunday, 20 March 2016

अनुवादित लेख: औरतों का कोई राष्ट्र नहीं: पिंजरा तोड़ का बयान



एक आदिवासी स्कूल-अध्यापिका और मानव अधिकार कार्यकर्त्ता, सोनी सोरी पर कुछ लोगों ने बुरी तरह हमला किया, उनके चहरे को ग्रीस से काला कर दिया| अभी सोनी का दिल्ली के एक अस्पताल में इलाज चल रहा है| भले ही उनका चेहरा विकृत और सूजा हुआ है, भले ही वह अपनी आँखें नहीं खोल पा रही हैं लेकिन उनका जज़्बा अभी भी अटल और निडर है| सोनी अपने लोगों, बस्तर और छत्तीसगढ़ के आदिवासी, अपने जल-जंगल-जमीन को बचाए रखने के लिए भारतीय सरकार और बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों के अत्याचारों के खिलाफ लम्बे समय से संघर्ष कर रही हैं|

2011 में छत्तीसगढ़ पुलिस ने सोनी पर ‘माओवादी’ होने का इलज़ाम लगाया और उन पर कई झूठे केस लगाकर उन्हें ‘राष्ट्र-विरोधी’ घोषित कर दिया| हिरासत के दौरान सोनी को बुरी तरह मारा-पीटा गया और यंत्रणाएं दी गयी| जेल से उन्होंने एक ज़बरदस्त ख़त लिखा जिसमें उन्होंने गुस्से और साहस से पुछा “..मुझे करंट देकर, मुझे नंगा करके, निर्दयता से मारके, मेरे मलाशय में पत्थर डालके- क्या नक्सलवाद ख़त्म हो जाएगा| मैं अपने देशवासियों से जानना चाहती हूँ| उन पर ये सारी यंत्रणाएं करने वाले अफसर, अंकित गर्ग, को 2012 में वीरता पुरस्कार दिया गया| अपनी ‘बहादुरी’, ‘निर्भयता’, ‘आत्म-बलिदान’ और ‘राष्ट्र व् भारत माँ’ की सेवा करने के लिए उन्हें पुलिस मैडल मिला|  

सोनी सोरी का केस कोई अपवाद या एकलौता केस नहीं है| कवासी हिद्मे, बस्तर से आदिवासी, पर भी नक्सली होने का आरोप लगा| उन्हें भी बार-बार पीटा गया, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया, और जब एक थाने के पुलिसवालों का जी भर जातातो उन्हें एक जेल से दूसरी जेल भेजा गया| ऐसा 7 सालों तक चलता रहा| एक दिन राष्ट्रके रक्षकों की दिलेरीका नतीजा यह हुआ कि कवासी के शरीर ने उनके गर्भाशय को बाहर निकाल दिया| असहनीय दर्द में उनके शरीर से खून बहता रहा| पहली बार कवासी ने अपने ही हाथों से अपने गर्भाशय को अंदर डाला और दूसरी बार अपने साथी से ब्लेड मांगकर उसे काटने की कोशिश की| कवासी की कहानी तब सामने आई जब सोनी जेल की सज़ा काटते हुए उनसे मिली| सैकड़ों सोनियाँ और सैकड़ों हिद्मे आज भी भारत की जेलों में बंद हैं|

1991 में कश्मीर के गाँव, कोनन पोशपोर की महिलाओं के साथ भारतीय सेना की सबसे वरिष्ठ राइफल, चौथी राज राइफल्स, के सैनिकों ने बलात्कार किये| 25 साल बाद भी ये महिलाएं इंसाफ़ के इंतज़ार में हैं|

2004 में मणिपुर की महिलाओं ने इम्फाल में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू के खिलाफ शक्तिशाली विरोध किया | मनोरमा के बलात्कार और उनकी निर्मम हत्या के बाद इन महिलाओं ने अपने कपड़े उतारकर असम राइफल्स के मुख्यालय के सामने खड़े होकर भारतीय सेना के खिलाफ नारे लगाए – “भारतीय सेना हमारा बलात्कार करो, हमारा मांस ले लो”| ‘हाशियेसे आता उनका विरोध स्वर राष्ट्र-गर्व के बिगुल को भंग कर देता है|

विभाजन के दौरान भी हज़ारों महिलाओं के बलात्कार हुए| वे महिलाएं भी इतिहास से चिल्ला कर उस हिंसा का ब्यान दे रही हैं जो भारत के जन्म, ‘स्वतन्त्र’ राष्ट्र बनने के उस क्षण में उनके शरीरों पर हुआ| औपनिवेशिक शक्ति से आज़ाद भारत में भी इस हिंसा का तांडव बार-बार हुआ- चाहे वह आपातकालीन दौर हो, 1984 के दंगे, गोधरा हत्याकांड, गुजरात के दंगे, ऑपरेशन ग्रीन हंट, कंधमाल, या मुज़फ्फर नगर के दंगे|      

आवेश के इस दौर में जब हर कोई, दक्षिण से लेकर वाम, ‘सच्चा राष्ट्रवादी’ होने की दौड़ में लगा है तब सोनी का काला किया गया चेहरा, मनोरमा का गलियों से भुना शरीर, कवासी का बाहर निकला गर्भाशय हमसे सवाल पूछ रहा है: क्या राष्ट्र, कोई भी राष्ट्र, कभी किसी महिला का हो सकता है? क्या राष्ट्रों को अपने निर्माण और एकीकरण के लिए महिलाओं पर बलात्कारों और अत्याचारों की आवश्यकता होती है? क्या महिलाओं की ज़िंदगियों, शरीरों, और इच्छाओं पर नियंत्रण राष्ट्र और राष्ट्रवाद का आधार है? क्या राष्ट्र की कल्पना और निर्माण में मर्दाना व् पुरुष-प्रधान विचार निहित तो नहीं है? यह विरोधाभास नहीं तो क्या है कि संघी टोली एक तरफ तो ‘भारत माता’ की जय के नारे लगाते हैं और दूसरी तरफ ‘माँओं’ और ‘बहनों’ को बलात्कार करने की धमकियाँ देते हैं, यौनिक उत्पीड़न से डराते हैं|
सबसे महत्वपूर्ण है यह पूछना कि भारत ‘माता’ क्यों है? इस राष्ट्र को जनाना क्यों बनाना? क्या भारत माता की यह संकल्पना महिलाओं को पिंजरों में कैद तो नहीं कर देती जहाँ हम महिलाओं को काम इसके सदस्यों (पुत्रों) को जन्म देने का रह जाता है? जहाँ हम वो ‘माँएं/बीवीयाँ/बहनें’ बनकर रह जाती हैं जिन्हें हमेशा सुरक्षा की ज़रुरत होती है? हमें उन्हीं प्रतिमाओं में कैद कर दिया जाता है जिनकी बहादुरी उनके आत्म-बलिदान से नापी जाती है|

राष्ट्र की इस जनाना संकल्पना में दलितों, आदिवासियों, कामगार महिलाओं ली ज़िंदगियाँ और अनुभव अदृश्य हो जाते हैं, लीक से हटकर लगते हैं, गलत-अपराधी लगने लगते हैं| हिंदुत्व की इस राष्ट्रीय परियोजना की आलोचना करते हुए हमें सोचना होगा कि क्या राष्ट्रवाद कभी भी संयुक्त हो सकता है या राष्ट्र काम ही तब करते हैं जब किसी और को ‘अन्य’ या ‘दूसरा’ बना कर अपने सामने खड़ा कर ले| राष्ट्रों की पहचान किसी दुसरे से मुकाबला करके ही स्थापित होती है|    

राष्ट्र द्वारा महिलाओं पर की गयी हिंसा ‘अपवाद’ घटनाएं नहीं होती, यह ‘रोज़ाना’, ‘साधारण’ व् हमारे सबसे घनिष्ट व् निजी संबंधों और दायरों में भी होती है| बड़े छुपे हुए तरीकों से हमारे परिवारों, विश्वविद्यालयों, कार्यस्थलों, और समाज में घट रही होती है| राष्ट्र का भार महिलाएं हर रोज़ अपने कन्धों पर उठा रही होती हैं –कड़े नियमों को मानते, अपनी आज़ादी की बलि चढ़ाते, लगातार अपनी स्वायत्ता, अपने निर्णयों को खुद लेने के अधिकारों के लिए मोल-भाव करते दिख रही होती हैं|
कितनी ही बार जब हमने अपने परिवारों में मुलभूत अधिकारों और आज़ादी की मांग की है तो हमारे परिवारों ने ‘पश्चिमी’ आदर्शों से भ्रष्ट हो जाने का ताना मारा है| चाहे वह रात को बाहर जाने की बात हो या पढ़ने/काम करने की आज़ादी हो या अपनी मर्ज़ी से किसी को प्यार करने की इच्छा (सूची बहुत लम्बी है?)

जब ज्योति सिंह केस के बाद जस्टिस वर्मा रिपोर्ट ने वैवाहिक बलात्कार को अपराधिक घोषित करने का सुझाव दिया तो संसदीय standing committee ने, वेंकैया नायडू की अध्यक्षता में, इस सुझाव को मानने से इनकार कर दिया| उनका कहना था कि अगर वैवाहिक बलात्कार को कानून के दायरे में ला खड़ा किया तो महान भारतीय परिवार का ढांचा टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा| तो क्या ‘भारतीय’ परिवार और शादियाँ वैवाहिक बलात्कार के दम पर ही खड़ी हैं? हम सभी को पता है कि कैसे जो महिलाएँ न्यायालयों में यौनिक शोषण के खिलाफ न्याय की उम्मीद से जाती हैं उनका अपमान किया जाता है, उन्हें शर्मिंदा महसूस कराया जाता है| उनसे ऐसे सवाल किया जाते हैं जैसे तो वे ‘आदर्श’ भारतीय महिला की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं|

हरियाणा के पूर्व OSD (ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) जवाहर यादव ने कहा, “JNU में विरोध करती महिलाओं को मैं यही कहना चाहता हूँ कि इनसे बेहतर तो वैश्याएँ हैं जो अपना शरीर बेचती हैं लेकिन देश नहीं”| यह सोच दर्शाती है कि राष्ट्रवाद की परिभाषा के केंद्र में है- पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद| हर समय हमें किसी ना किसी डब्बे में डाल दिया जाता है- ‘अच्छी’ या ‘बुरी’ औरतें, ‘राष्ट्र-विरोधी/माओवादी’ या ‘राष्ट्रवादी’ औरतें, इज्ज़तदार या बाज़ारू औरतें, ‘अच्छी बच्ची/विद्यार्थी’ या ‘नमकहराम बेटियाँ’| एक सेक्सवर्कर जिसका श्रम ब्राह्मणवादी नैतिकता एवं परिवार मूल्यों को भंग करता है उs पर धिक्कार है| एक स्वंतत्र महिला जो सोचती है, सवाल करती है, विरोध करती है, लड़ती है, वो इस राष्ट्र की सुरक्षा के लिए ‘घातक’ है| विशेषत: तब जब यह महिला आदिवासी, दलित, मुसलमान, मज़दूर हो और ज़ोर से अपनी आवाज़ उठा रही हो| ऐसी औरतें 19वीं शताब्दी में ऊँची जाति के पुरुषों द्वारा तैयार की गयी राष्ट्रवाद की मर्दाना और पुरुष-प्रधान पटकथा को नकारती हैं| पारिवारिक जीवन और अलगाव के पिंजरों को नकारती हैं जिनमें इनकी आवाज़ें बंधी हुई थीं|   

तुम्हारी सरहदें और सीमाएं हम महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय एकता और सामूहिकरण को रोक नहीं सकतीं| हमारी कल्पनाएँ नाच रही हैं, सितारों की धूल की तरह, चुड़ैलों के जादू-टोने की तरह|   


अनुवादित लेख: रोहित वेमुला को किसने मारा?


आनंद तेलतुम्बड़े

रोहित वेमुला, हैदराबाद विश्वविद्यालय के 26 वर्षीय दलित पीएचडी स्कॉलर ने अपने आत्महत्या पत्र में किसी, दोस्त या दुश्मन, को उसकी मौत के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया। इसका इस्तेमाल उसके हत्यारों ने उनकी बेगुनाही का दावा करने के लिए किया।  

वह कार्ल सगान की तरह लिखना और ब्रह्मांड की खोज में अपनी कल्पना को उड़ान देना चाहता था वह अपनी अंतरात्मा की गहराई तलाश रहा था, इस जाति-ग्रसित समाज में एक दलित की पीड़ित अंतरात्मा जो अस्तित्व की निरर्थकता के निष्कर्ष पर जा पहुंची। उसकी मौत से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि आत्महत्या खुद की हत्या करना नहीं है; बल्कि विशिष्ट हालातों में हुई मौत है, जिसमें परम्पराएं, रीति-रिवाज व संस्थाएं शामिल हैं, ऐसी मौत जो हत्यारों के चेहरों पर पर्दा डाल देती है|

रोहिके विशिष्ट हालात विश्वविद्यालय परिसर में उस जुगाडू टेंट के रूप में मौजूद हैं जिसमें हॉस्टल से निकाले जाने के बाद वह और उसके 4 साथी पिछले 12 दिनों से रह रहे थे। उसकी स्थिति आत्म-सम्मान के लिए चल रहे संघर्ष में भी ज़िन्दा है, जो उसके बाद भी चल रहा है। 18 दिसंबर को उप-कुलपति को लिखा मर्मभेदी ख़त, अपने दोस्तों के सामने 27वें जन्मदिन की पार्टी ना दे पाने का बोझ (जो कुछ ही दिन दूर था), उसकी माँ को आखिरी फ़ोन, जिसे उसने एक गहरा संकेत देते हुए बीच में ही काट दिया। इतनी जानकारी काफी है पर्दा हटाने के लिए, हत्या के लिए ज़िम्मेदार हालातों और संभवत: लोगों को दुनिया के सामने लाने के लिए।  

इस केस का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक है| ABVP HCU के अध्यक्ष नंदनम सुशील कुमार पर एक कथित हमला हुआ, जिसके लिए 5 दलित छात्रों को, जिनमें से एक रोहि था, सज़ा दी गयी। यह हमला आज तक साबित नहीं हो पाया है। बल्कि धिकारिक रिपोर्ट, डॉक्टर की जांच, और गवाहों ने यह स्थापित किया कि ऐसा कोई हमला नहीं हुआ था। फिर भी दलित विद्यार्थियों को सज़ा दी गयी। इसके बाद प्रशासन के निरंतर उतार-चढ़ावों ने यह साबित कर दिया कि जाति पूर्वाग्रहों, विश्वविद्यालय के बाहर से दबाव और प्रशासन की अकुशलता ने मिलकर कैसे खेल खेला।

इस हादसे को मोदी सरकार के श्रम और रोज़गार मंत्री, बंडारू दत्तात्रेय, के ख़त ने नया मोड़ दे दिया।  HRD मंत्री स्मृति रानी को लिखे इस ख़त में बंडारू ने HCU को जातिवादी, अतिवादी, और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का अड्डाबताया और आवश्यक कार्रवाकी मांग की। बंडारू ने अम्बेडकर विद्यार्थी एसोसिएशन (ASA) द्वारा याकूब मेमन की फांसी के खिलाफ प्रदर्शन को उनकी राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का सबूत बताया।  
ईरानी के विवादग्रस्त दफ्तर (जिसके अनुसार शायद HRD का अर्थ है हिंदुत्व रिसोर्स डेवलपमेंट’) ने सांकेतिक ढ़ंग से उप-कुलपति को लिखा, उसी तरह जिस तरह IIT मद्रास में अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल को प्रतिबंधित किया गया था और जिसके बाद देश-भर में प्रदर्शन हुए।  

MHRD से एक-के-बाद-एक चार ख़त भेजने से यह समझा जा सकता है कि VC पर विद्यार्थियों के खिलाफ कदम उठाने को लेकर कितना दबाव बना होगा। मंत्री से मिले इस सहयोग ने आंतरिक तौर पर जातिवादी प्रशासन को ऐसी सज़ा देने के लिए उत्साहित किया जो विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में मौत की सज़ा से कम नहीं थी। बिना हॉस्टल, प्रशासन इमारतों में घुसे, सार्वजानिक जगहों को इस्तेमाल करे और अन्य विद्यार्थियों से बात करे शोधार्थी कैसे रह सकते हैं? इन सबका मतलब ही शोधार्थी की मृत्यु होता है।

निष्कासन के बाद ये विद्यार्थी हैदराबाद की ठिठुरती ठण्ड में बाहर ही रहने लगे लेकिन फिर भी VC को अपने दुराचार की गंभीरता का एहसास नहीं हुआ| दिसंबर 18 को रोहि ने VC पर ख़त में दलित छात्रों और ABVP के बीच झगड़े में व्यक्तिगत दिलचस्पी लेने का इल्ज़ाम लगाया था।  उसने व्यंग्यात्मक  ढंग से HCU में दलित छात्रों की स्थिति उजागर की और लिखा कि VC को दाखिले के समय ही दलित छात्रों को ज़हर और फांसी का फंदा दे देना चाहिए और उसके जैसे विद्यार्थियों के लिए इच्छामृत्यु का प्रबंध कर देना चाहिए।    

यह ख़त किसी भी ज़िम्मेदार व्यक्ति के लिए विद्यार्थी की मानसिक दशा को गंभीरता से लेने का कारण  हो सकता था, ऐसा विद्यार्थी जो निरंतर उत्पीड़न और गरीबी के कारण स्वयं को निरुपाय महसूस कर रहा था और जिसे जुलाई से वज़ीफ़ा भी नहीं मिला था।  इसी वज़ीफ़े से वह गुंटूर में अपनी माँ और छोटे भाई को मदद करता था।   
  
एक तरफ तो सरकार बाबासाहेब अम्बेडकर की 125वीं जन्मतिथि पर खर्चा करने का दिखावा करके अपनी छवि निर्मित करने की कोशिश कर रही है ताकि दलितों को कांग्रेस से खींचकर अपनी तरफ कर सके। दूसरी तरफ सरकार उन सभी स्वतंत्र व मूलभूत बातों को दबा देना चाहती है जिनके लिए अम्बेडकर खड़े थे| अम्बेडकर ने प्राथमिक शिक्षा के बनिस्बत उच्च शिक्षा को इसलिए महत्व दिया क्योंकि उनका मानना था कि उच्च शिक्षा ही जनमानस में वो आलोचनात्मक नज़रिया और नैतिक शक्ति पैदा कर सकती है जिससे ताकतवर तत्वों के जातीय पूर्वाग्रहों को चुनौती दी जा सके।  

जैसे पूरी दुनिया में असहमति व्यक्त करने वाले मुसलमान युवाओं को आतंकवादी घोषित करना आसान है, वैसे ही दलित-आदिवासी युवाओं पर अतिवादी, जातिवादी और राष्ट्र-विरोधी होने का ठप्पा लगा देना भी आसान है।    

भारतीय जेलें ऐसे निर्दोष युवाओं से भरी पड़ी हैं जिन पर सालों से राजद्रोह और गैरकानूनी गतिविधियों में हिस्सा लेने का इल्ज़ाम है| जिस आक्रामक रूप से भाजपा संस्थाओं, विशेषत: उच्च शिक्षा संस्थानों, के भगवाकरण में लगी है उससे यह पूर्वाभास लगाया जा सकता है कि आने वाले वर्षों में अभी और रोहि बनाए जाएंगे 

वे लोग जो चुपचाप इस घृणित प्रक्रिया, भारत की बहुवादी संरचना के टूटने और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व की पुनर्स्थापना को दर्शक बने देख रहे हैं, वे भी उतने ही दोषी हैं जितने कि वे जो प्रत्यक्ष रूप से इसमें शामिल हैं।  

तेलतुम्बड़े लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा समिति के साथ नागरिक अधिकार कार्यकर्ता व लेखक हैं।