Thursday, 9 April 2015

पत्र : शिक्षा अधिकार कानून का उल्लंघन

प्रति                                                                                                        दिनांक : 07 अप्रैल, 2015 
     शिक्षा  निदेशक
   दिल्ली सरकार
   दिल्ली

विषय: शिक्षा अधिकार कानून के उल्लंघन व माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवमानना के संबंध में।  
महोदय/महोदया,
                     लोक शिक्षक मंच आपको अवगत कराना चाहता है कि दिल्ली प्रशासन के स्कूलों में विभिन्न कक्षाओं में दाखिला प्रक्रिया में शिक्षा अधिकार कानून का उल्लंघन व माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवमानना हो रही है। दाखिले के समय बच्चों के अभिभावकों पर विभिन्न प्रकार के दस्तावेज़, जिनमें आधार कार्ड भी शामिल है, लाने का दबाव डाला जा रहा है, प्रवेश के समय ही आधार कार्ड की प्रति व बैंक खाते की जानकारी माँगी जा रही है और इसके अभाव में दाखिला नहीं दिया जा रहा है। इस निर्देश को लेकर हमारी चिंता व आपत्ति के कुछ कारण निम्नलिखित हैं –

1.    शिक्षा अधिकार क़ानून (2009) बच्चों के प्रवेश और शिक्षा के लिए किसी भी दस्तावेज़ की अनिवार्यता को प्रतिबंधित करता है। 
2.    सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ये आदेश दिए जा चुके हैं कि किसी भी नागरिक अधिकार या सेवा के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं बनाया जाएगा। 
3.    इसके पालन में शिक्षकों का समय व उनकी ऊर्जा ऐसे काम में लग रही है जिसका बच्चों की शिक्षा से कोई सरोकार नहीं है। यह किसी भी तरह स्कूलों में शिक्षा के माहौल के लिए न अनिवार्य है और न फायदेमंद है। 
4.    हमारी जानकारी में ऐसे बच्चे हैं जिन्हें कि दिल्ली प्रशासन के स्कूलों की छठी कक्षा में प्रवेश इसलिए नहीं मिला क्योंकि वो आधार कार्ड प्रस्तुत नहीं कर पाए। ऐसे में जबकि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है और न ही शिक्षा के हक़ के लिए अनिवार्य, इस तरह के आदेश का खामियाजा बच्चों को शिक्षा से बाहर कर दिए जाने में चुकाना पड़ा। खासतौर उन विषम परिस्थितियों में जिनसे सरकारी स्कूली व्यवस्था में दाखिला लेने और पढ़ने वाले आते हैं आधार कार्ड व अन्य दस्तावेज़ों की माँग करना उनके साथ नाइंसाफी है। 

हम आपसे अपील करते हैं कि इस संदर्भ में त्वरित व कठोर आदेश जारी करके सभी बच्चों को शिक्षा का वास्तविक अधिकार दिलाने की परिस्थितियाँ उपलब्ध कराएँ। 

सधन्यवाद



सदस्य, संयोजक समिति          सदस्य, संयोजक समिति          सदस्य, संयोजक समिति
लोक शिक्षक मंच                 लोक शिक्षक मंच                लोक शिक्षक मंच 

 




प्रतिलिपि :
मुख्यमंत्री, दिल्ली सरकार
शिक्षा मंत्री, दिल्ली सरकार
दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग

गवर्नमेंट स्कूल टीचर्स एसोसिएशन (GSTA)

शिक्षक संघों के समक्ष चुनौतियाँ

 आज के दौर के विश्वव्यापी चरित्र को पहचानकर सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था पर हो रहे हमलों के प्रति सचेत रहकर उनका प्रतिरोध करना हमारे शिक्षक संगठनों की ज़िम्मेदारी है। ऐसे में जबकि पूँजीवाद की अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय, बाज़ारू संस्थाएँ लगातार सरकारों पर यह दबाव बना रही हैं कि वो शिक्षा को जनाधिकार व समानता के हक़ का मुद्दा नहीं बल्कि अपने क़ानूनों में उनके मनमाफिक फेरबदल करके व्यापार में मुनाफा कमाने के लिए वैधानिक रूप से उपलब्ध कराएँ, शिक्षकों को सामूहिक रूप से समाज के प्रति अपनी ऐतिहासिक प्रतिबद्धता दिखानी होगी। शिक्षक संघों को गणतांत्रिक, जनवादी संगठनों की भूमिका निभाते हुए शिक्षक साथियों को भी व्यापक रूप से इस खतरे के बारे में जागरूक करना चाहिए। असल में सभी नवउदारवादी हमले सीधे तौर पर अंजाम नहीं दिए जाते और इसलिए अक्सर इन्हें पहचानने में हम ग़च्चा खा जाते हैं। निजी मुनाफे और पूँजीवादी बाजार की कुछ चालें तो इतनी लुभावनी लग सकती हैं कि हमें वो नेक, सुधारवादी हस्तक्षेप की तरह प्रतीत होती हैं। जबकि इतिहास गवाह है कि दुनियाभर में एक भी देश ऐसा नहीं है जहाँ मज़बूत, बढ़िया व बराबरी की सार्वभौमिक शिक्षा व्यवस्था को खड़ा करने में राज्य की केंद्रीय भूमिका न रही हो और ऐसा भी कोई देश नहीं है जहाँ निजी ताक़तों के सहारे यह काम अंजाम दिया गया हो। साथ ही इन निजी मुनाफे की शक्तियों के चरित्र और हितों की माँग ही यह है कि वो शिक्षा को गणतांत्रिक और वैज्ञानिक-तार्किक उसूलों पर निर्मित नहीं कर सकतीं। वो 'शिक्षा' को आकर्षक पैकिंग में परोसते ही इसलिए हैं कि उसके जनविरोधी चरित्र से हमारा ध्यान हटा रहे और समाज में निज-स्वार्थ व अलगाव के मूल्य मज़बूत होते रहे जिससे कि संसाधनों के स्वामित्व पर न सवाल उठें और न ही उनकी सत्ता के खिलाफ व सामूहिक स्वामित्व के लिए लोग एकजुट हों। 
 हमारी लड़ाई अपने वर्गीय स्वार्थ के लिए नहीं है बल्कि एक समतामूलक, न्यायसम्मत, सुंदर और प्रबुद्ध समाज के निर्माण के लिए है। अपने विद्यार्थियों के अधिकारों की रक्षा करना हमारा फ़र्ज़ है और उनके साथ खड़े होना हमारे काम का हिस्सा है। जब समाज के अन्य मेहनतकश वर्गों के साथियों को यह भरोसा होगा कि शिक्षकों और उनके संघर्ष की ज़मीन, उनके मूल्य और उद्देश्य एक ही हैं तभी सिर्फ हमारी अलग-थलग पड़ने वाली लड़ाइयाँ साझे आंदोलनों में तब्दील होकर मज़बूती प्राप्त करेंगी। क्या पूरे सत्र छात्राओं का वज़ीफ़ा न आना, वर्दी न बँटना, सर्दियाँ बीत जाने के बाद जर्सी के पैसों का बँटना आदि शिक्षकों के सामने सवाल नहीं खड़ा करता है? अगर मिड-डे-मील के तहत बच्चों का हक़ मारा जाता है, जनता के पैसों को झूठे रिकॉर्ड बनाकर हड़प लिया जाता है, सप्लायर की सहूलियत के हिसाब से न कि शिक्षकों-समुदायों की ज़रूरतों के अनुसार RH (रेस्ट्रिक्टेड हॉलिडे) की तारीख तय की जाती हैं, और इन सभी मक्कारियों के एवज़ में शिक्षकों को बलि का बकरा बनाया जाता है तो क्या यह शिक्षक संगठनों के सामूहिक शोध और रोष का विषय नहीं है? अगर सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों व क़ानून के विरुद्ध जाकर बच्चों व अभिभावकों पर आधार कार्ड जैसे ग़ैर-ज़रूरी दस्तावेज़ों के लिए ऐसे दबाव बनाए जाते हैं जोकि उन्हें परेशान भी करते हैं और शिक्षा से वंचित भी कर सकते हैं तथा साथ ही शिक्षकों के समय व ऊर्जा को भटकाकर शिक्षण से बाधित भी करते हैं तो क्या यह बुद्धिजीवी वर्ग की ज़िम्मेदारी नहीं है कि इनका विरोध करे? क्या सरकारी स्कूलों के भवनों के निर्माण से लेकर उनके रख-रखाव में बरती जाने अनियमितताओं के कारण विद्यार्थियों की शिक्षा में पड़ने वाली क्रूर रुकावटों को समस्या बनाकर कार्रवाई की माँग करना शिक्षक संगठनों का काम नहीं होना चाहिए? अगर इस तरह का भ्रष्टाचार शिक्षक संगठनों की लड़ाई का मुद्दा नहीं बनेगा तो सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी या तो खतरनाक घोषित भवनों में हफ्ते में तीन-तीन दिन पढ़ने को मजबूर होते रहेंगे या फिर उन्हें अन्य स्कूलों में ग़ैर-मुनासिब समय व माहौल में 'एडजस्ट' होना पड़ेगा, विद्यार्थियों की संख्या और उनके परीक्षा-परिणामों में गिरावट आती रहेगी, शिक्षक-अभिभावक अविश्वास बढ़ता रहेगा, खुद शिक्षक प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करने को विवश होते रहेंगे और इतने पर भी व्यवस्था की नाकामी (असल में अन्याय) का पूरा दोष शिक्षकों को नाकारा बताकर और शिक्षकों व अभिभावकों को आपस में लड़ाकर छुपाया जाता रहेगा। 
किसी भी प्रगतिशील, लोकतान्त्रिक संगठन को दो अन्य मौलिक ज़िम्मेदारियाँ भी उठानी पड़ती हैं। एक तो यह कि उसके अंदरूनी ढाँचे का समय-समय पर ईमानदारी से विश्लेषण करके यह परखा जाए कि उसमें समाज के सभी वर्गों की न्यायसम्मत भागीदारी है कि नहीं और वो भागीदारी सहज-स्वाभाविक है या महज़ चुनावी इस्तेमाल के लिए या वर्चस्वप्राप्त-सम्पन्न वर्गों की अनुकम्पा के रूप में है। अगर प्रतिनिधित्व में हिस्सेदारी समाज की विविधता के समानुपातिक नहीं है तो फिर अपने को प्रगतिशील-लोकतान्त्रिक कहने वाला कोई भी संगठन यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता है कि ऐतिहासिक रूप से वंचित-शोषित तबकों के सदस्य आगे आकर ज़िम्मेदारी नहीं उठाना चाहते हैं - उसे अपने भीतर झाँककर अपने वर्गीय-वर्णीय-लैंगिक चरित्र पर सवाल भी खड़े करने होंगे और सक्रिय होकर उसे बदलना भी होगा, चाहे इसके लिए उसे पेशे के औपचारिक क्षेत्र से बाहर जाकर समाज व संस्कृति में ही हस्तक्षेप क्यों न करना पड़े। वैसे भी, सामाजिक-   
सांस्कृतिक परिवर्तन शिक्षा का मौलिक क्षेत्र है, कोई 'बाहर' का काम नहीं। दूसरे, यह कभी नहीं भूला जा सकता कि शिक्षकों की अपने पेशे के प्रति एक बौद्धिक ज़िम्मेदारी है। उदाहरण के तौर पर अभी कुछ दिन पहले हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ ने SCERT निदेशक से मिलकर छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों के संदर्भ में परीक्षा पत्र की लम्बाई व समय की प्रतिकूलता पर अपना विरोध दर्ज किया जिसके परिणामस्वरूप प्रशासन ने शिक्षाशास्त्र के सिद्धांतों के अनुकूल यह फैसला लिया कि भविष्य में पहली व दूसरी की मौखिक परीक्षाएँ ही होंगी। इसी तर्ज पर क्या इस विसंगति को चुनौती नहीं देनी चाहिए कि प्रथम दो कक्षाओं में विज्ञान और सामाजिक अध्ययन को दो अलग विषयों के रूप में रिज़ल्ट रजिस्टर में दर्ज कराया जाता है जबकि इनका समेकित रूप एक विषय 'परिवेश अध्ययन' का है? बल्कि अब तो पाँचवीं तक 'विज्ञान' नाम का कोई विषय है ही नहीं - पर्यावरण अध्ययन है - और सामाजिक अध्ययन को भी NCF 2005 की संकल्पना के विरुद्ध जाकर अनुचित रूप से पढ़ाया जा रहा है। या RTE Act के बाद रिज़ल्ट अप्रूवल जैसी अफसरशाही परम्परा का औचित्य ही क्या है जबकि इससे सिवाय कर्मकांड और ढकोसले के कोई मूल्य बल नहीं पाते? 
अगर अफसरशाही के अनुचित दबाव व माहौल में काम करते-करते हम इस स्थिति में पहुँचा दिए गए हैं कि सच्चाई के विरुद्ध जाकर, दिखावे के लिए अंकों-उपस्थितियों में फेरबदल करें (जोकि इसलिए और भी त्रासद है क्योंकि RTE Act के तहत अगली कक्षा में प्रोन्नति के लिए तो विद्यार्थियों को हमारी इस 'अनुकम्पा' की ज़रूरत ही नहीं है!) और बच्चों के दाखिले के लिए क़ानून, न्याय, समाज व स्वयं अपने हितों के विरुद्ध जाकर अभिभावकों से तरह-तरह के दस्तावेज़ों की माँग करें तो फिर मानना पड़ेगा कि इस व्यवस्था पर काबिज़ शक्तियों ने या तो हमारी रीढ़ छीन ली है या हमने सत्ता के चरित्र को खुद आत्मसात कर लिया है। अपनी रीढ़ वापस छीनकर खड़े होना और अपने चरित्र को उत्पीड़कों के पक्ष का नहीं बल्कि उनके खिलाफ, उत्पीड़ितों का पक्षधर बनाना हमारी गरिमा की माँग है। और यह लड़ाई हमें अकेले नहीं बल्कि सामूहिक रूप से संगठित होकर ही लड़नी होगी। अन्यथा शिक्षक संघ का औचित्य ही क्या है?    

Wednesday, 1 April 2015

शिक्षक डायरी : विद्यार्थियों की लापरवाही के लिए जिम्मेदार कौन ?

एक निगम शिक्षक का लिखी हुई इस टिप्पिणी से हम सहमत असहमत हो सकते हैं पर यह टिप्पिणी एक  सार्थक बहस के लिए आपसे साझा की जा रही है। लोक शिक्षक मंच ने इस शिक्षक के द्वारा भेजी गयी इस टिप्पिणी में किसी भी तरह का फेरबदल नही किया है ....... संपादक।  

मैं  एक सह शिक्षा विध्यालय में अध्यापक हूँ। हमारे देश में शिक्षा का अधिकार कानून आया सरकार ने बहुत जोर शोर से इसका प्रचार किया। आमजन को भी लगने लगा कि  अब सबको मुफ्त व् अनिवार्य शिक्षा मिलेगी। इस एक्ट ने अधिकतर जिम्मेदारी शिक्षकों पर डाली पर अभिभावकों को भी जिम्मेदारी से मुक्त नही छोडा। खैर सब कुछ सामान्य तरीके से चल रहा था हालाकि कुछ अध्यापको ने सबको परीक्षा में पास करने का विरोध जरूर किया था। अभी कुछ दिनों पहले ही मेरे विद्यालय में परीक्षाए ख़त्म हुई है इस बार अपने विद्यार्थियों के साथ परीक्षा का अनुभव कुछ चिंतित करने वाला रहा है।
मेरी कक्षा में कुल 37 छात्र है हर साल मेरी कक्षा में पुरे छात्र परीक्षा देने आते थे लेकिन इन बार छात्रों का रुझान अलग रहा।एक छात्र तो दिल्ली में रहने के बावजूद परीक्षा देने नही आया। एक छात्र ने कुल दो पेपर दिए तथा बाकि पपरो में आने से मना कर दिया मे्रे पूछने पर उसने कारण बताया की उसको परिवार के साथ वैष्णो देवी जाना है। मैंने उसके माता पिता  को बुलाया और कहा की कुछ दिनों के लिए आप अपना वैष्णो देवी जाने  का कार्यक्रम शिफ्ट कर लो पर उनका जवाब सुनकर मुझे थोडा दुःख हुआ उनका कहना था की सर बच्चे को फ़ैल तो होना नही है फिर क्या करेगा परीक्षा देकर पेपर देने से अच्छा है माता रानी के दर्शन कर लेगा। मैंने उनको समझाया लेकिन वो लोग चले गये। एक अन्य बात मै साझा करना चाहूँगा इस बार मेरे विद्यालय में छात्रों को निर्देश दिया गया की छात्र स्वय उत्तर पुस्तिका लायेंगे। अधिकतर छात्र उत्तर पुस्तिका अपने घर से नही लाते थे पूछने पर उनका उत्तर होता था सर भूल गये। अब छात्रों में परिक्षाओ को लेकर तनाव नही रहा ये बात काफी हद तक सही है लेकिन वो साथ साथ लापरवाह भी होते जा रहे है जो कि  एक चिंता का विषय है। यह भी हो सकता है इन छात्रों की लापरवाही के पिछे मै जिम्मेदार हूँ या वर्तमान शिक्षा का अधिकार कानून। इसका जवाब शायद मेरे पास नही है पर यह सवाल मुझे चिंतित बहुत कर रहा है।


Sunday, 22 March 2015

“सयानों की दुनिया बड़ी अजीब है”

 फ्रेंच लेखक सैन्तैकजुपेरी की यह बात आज के समय में काफी सच बैठती है जहाँ सयाने यानि कि वयस्क/बड़े बहुत अजीब बातें करते हैं| वे सच को सच और झूठ को झूठ नहीं बोलते; जैसे मुनाफा कमाने को कभी ‘विकास’ कहते हैं तो कभी ‘समाज-सेवा’|

इस पर्चे के माध्यम से हम एक ऐसी ही विडम्बना के बारे में बात करने जा रहे हैं| हर दौर में कुछ ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने अपना जीवन सामाजिक गैरबराबरी या कुरीतियों के खिलाफ काम करने में लगा दिया, जैसे बुद्ध, कबीर, सावित्रीबाई फूले आदि| किन्तु आज जो लोग समाज के लिए कुछ करने चाहते हैं वो अक्सर NGOs का रास्ता अपनाते दिखते हैं| NGOs वो गैर सरकारी संस्थाएं हैं जो समाज सेवा का काम भी काफी पेशेवर और व्यावसायिक ढंग से करती हैं| भारत में इस बदलाव की ड़ें कुछ 30-40 साल पुरानी हैं| माना जाता है कि आज भारत में लगभग हर 400 लोगों पर एक NGO है| पिछले 3 दशकों में NGOs का जाल जिस तेज़ी से फैला है उसके कारण समझने ज़रूरी हैं| यह न तो अचानक हुआ और न ही अपने आप|
1990 के दशक में नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के साथ सरकार का जन-कल्याण कार्यों पर होने वाले खर्च से अपने हाथ खींचना शुरु हुआ| सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया भर की सरकारों के ऊपर यह दबाव बनाया गया कि वे नागरिकों के शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ़ पानी, रोज़गार जैसे बुनियादी हकों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी कम करें| साफ़ बात थी कि जब सरकारों ने अपने हाथ इनसे खींचे तो ये क्षेत्र निजी हाथों में चले गए; अब ये जन कल्याणकारी न रहकर मुनाफाखोरी के बाज़ार में बदल दिये गए।


अंग्रेजों की जड़े हिल चुकी हैं। वे 15 सालों में चले जायेंगे, समझौता हो जायेगा, पर इससे जनता को कोई लाभ नहीं होगा। हमारे देश के नेता जो शासन पर बैठेंगे, वे विदेशी पूँजी को अधिकाधिक प्रवेश देंगे और पूंजीपतियों को अपनी तरफ मिलाएँगे| पूंजीवादी साम्राज्यवाद नए नए रूप धारण कर निर्बल का शोषण करता रहेगा|
                                            भगत सिंह

इस प्रक्रिया को राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हुए बदलावों से समझा जा सकता है| 1986 की शिक्षा नीति के अंतर्गत Program of Action लागू किया गया| इसमें लिखा गया था किसरकार और NGOs के गठबंधन को प्रोत्साहित किया जाएगा| सरकार NGOs को वो सभी सुविधाएँ और आर्थिक सहायता प्रदान करेगी जिससे वे मौलिक साक्षरता, वयस्क शिक्षा के कार्यक्रम ले सकें”| हम देखते हैं कि जो बात प्रोत्साहन से शुरू हुई वो 2009 के शिक्षा अधिकार कानून तक आते-आते NGOs और उनके दाताओं के प्रति समर्पण मेँ बदल गयी| 12वी पंचवर्षीय योजना में साफ़ तौर पर लिखा है कि “शिक्षा में सार्वजनिक और निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल को बढ़ावा दिया जाना चाहिए”| अर्थात अब ऐसे निजी स्कूलों की संख्या तेज़ी से बढ़ेगी जिनमें सरकार का नियंत्रण न के बराबर होगा|
इसका मतलब एक तरफ सरकार ने शिक्षा के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से हाथ खींचे और दूसरी तरफ NGOs/निजी खिलाड़ियों की भूमिका मज़बूत की| इसे कैसे समझें?  

हक को खैरात में बदलने की साज़िश
जब सरकार की जगह NGOs नागरिक अधिकार क्षेत्रों मेँ सक्रिय होने लगते हैं तो वो लोगों के हक़ का प्रश्न नहीं रह जाता बल्कि NGOs की दया का प्रश्न बन जाता है| अच्छी शिक्षा तो हर बच्चे का मौलिक अधिकार है इसलिए NGOs कुछ गरीब बच्चों को पढ़ाकर उन पर एहसान नहीं कर रहे होते| बल्कि NGOs तो फण्ड या प्रोजेक्ट ख़त्म होने पर अपना बोरिया-बिस्तरा समेट कर गायब हो जाते हैं क्योंकि उनकी जवाबदेही जनता के प्रति नहीं होती| उनकी जवाबदेही तो उन संस्थाओं के प्रति होती है जिनसे उन्हें लाखो-करोड़ों का फण्ड मिलता है| NGOs को ज़्यादातर पैसा सरकार, निजी कंपनियों, कॉर्पोरेट घरानों, विश्व बैंक, धन्ना-सेठों आदि से मिलता है| आइए देखते हैं ये कंपनियां NGOs को पैसा क्यों देती हैं?
कॉर्पोरेट कंपनियां CSR (corporate social responsibility) के नाम पर अपना व्यावसायिक प्रचार करती हैं, काली करतूतों पर पर्दा डालती हैं और इसमें भी मुनाफा कमाने के रास्ते खोज लेती हैं| उदाहरण के तौर पर पिछले 10 सालों से प्रथम नामक NGO द्वारा संचालित असर (Annual Status Of Education Report) का डाटा यह दिखाने की साज़िश कर रहा है कि सरकारी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता गिरती चली जा रही है| यह देखने वाली बात है कि इन आंकड़ों का सबसे ज्यादा फ़ायदा दूसरे बड़े NGOs उठाते हैं ताकि वे सरकारी स्कूलों के बने-बनाये ढाँचे और व्यवस्था में घुस सकें| मतलब जाँच भी इनकी और इलाज भी इन्हीं का|
क्या यह बात किसी खतरे का संकेत नहीं है कि मुंबई, हरियाणा से लेकर दिल्ली तक में कई NGOs ने सरकारी स्कूलों को अपने कब्जे मे लेना शुरू कर दिया है? इसके लिए वे झूठी रपटें बनाते हैं, झूठे इल्ज़ाम लगाते हैं, शिक्षकों व बच्चों की अपमानजनक छवियां बेचते हैं, शिक्षकों की गरिमा पर चोट करते हैं और इस भ्रम का प्रचार करते हैं कि सरकारी शिक्षा तंत्र पूरी तरह से विफल हो चुका है और इसे बचाने का एक ही रास्ता है ‘निजीकरण’| जबकि सच तो यह है कि प्राइवेट शिक्षा एक खरीद की वस्तु होती है – पैसा दो, शिक्षा लो|
इस तरह NGOs समाज कल्याण के नाम पर निजी पूँजी के लिए नए-नए बाज़ार खोलते चलते हैं| जब शिक्षा को इस तरह की निजी शक्तियाँ अपने हाथ मे लेंगी तो शिक्षा का चरित्र उनके हितों के प्रति गिरवी रहेगा, जो कि हमें किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है|

NGOs से समाज में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं होता
NGOs गैर बराबरी की व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाते बल्कि जो सवाल उठते हैं या उठने चाहिए उनको भी दबा देते हैं| जैसे आज भारत में जितने बच्चे कक्षा 1 में दाखिला लेते हैं, उसमें से मुट्ठीभर बच्चे ही 12वीं पूरी कर पाते हैं| ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह कमी इन हज़ारों-लाखों बच्चों की है या शिक्षा व्यवस्था की? अगर हर बच्चा 12वी पास कर भी जाए तो क्या उसके पढ़ने के लिए कॉलेजों में सीटें और रोज़गार के उचित अवसर हैं?
लेकिन आज बहस मूलभूत परिवर्तन की ना होकर मुट्ठीभर EWS यानि गरीब बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में दाखिले’ की बन गयी है| इसे छलावा नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे? बढ़ती गैरबराबरी के सन्दर्भ में तो समाज में सवाल और बेचैनी बढ़नी चाहिए लेकिन यहाँ भी NGOs एक अहम भूमिका निभाते हैं| वे लोगों के सवालों की धार को कम करने का काम करते हैं जिससे लोग बंटकर अपने निजी फायदों के बारे में ही सोचने और लड़ने तक सिमट जाते हैं। परिणामस्वरूप लोगों के एकजुट होकर पूरे समाज के बदलाव के लिए संघर्ष की संभावना कम हो जाती है|  
इस साज़िश का शिकार बनता है युवा तबके का एक बड़ा हिस्सा जो सामाजिक गैरबराबरी से परेशान तो होता है पर अपने सवालों के जवाब नहीं ढूंढ पाता| वो NGOs में अपनी उर्जा तो झोंक देता है पर समस्या की जड़ पर चोट नहीं कर पाता| दूसरी तरफ NGOs स्वयंसेवा के नाम पर इनकी मजदूरी और कौशल का सस्ते दाम पर इस्तेमाल करते हैं|
आज युवा वर्ग को सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह की विरासत से सीखने की ज़रूरत है| वो विरासत जो सच को सच और झूठ को झूठ देखना और बोलना सिखाती है| उनकी शहादत को विशेष रूप से याद करने की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि उन्होंने आज़ादी की लड़ाई को सिर्फ अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ाई न मानकर साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के खिलाफ संग्राम की तरह देखा था| आज भी तो हमारे सामने यही लड़ाई है|
आज साम्राज्यवाद अपने पुराने औपनिवेशिक रूप मे हमारे खिलाफ खड़ा नही दिखता है बल्कि इसने हमारी नीतियों को निर्धारित करके, CSR-NGOs के लुभावने तौर तरीकों से हमारी व्यवस्था के भीतर घुसपैठ कर दी है। सबसे खतरनाक तो यह है कि आज साम्राज्यवादी, पूंजीवादी धन्नासेठों/ कंपनियों ने सिर्फ व्यवस्था को ही अपने शिकंजे मे नहीं ले लिया है बल्कि समाज को भी भ्रमित कर दिया है।
शिक्षक होने के नाते हम भगत सिंह से बराबरी, इंसाफ और तर्कशीलता के साथ अपने समय और आसपास की परिस्थितियों व उनमें आ रहे बदलावों को समझने और संगठित होकर उनका मुकाबला करने की प्रेरणा भी पाते हैं। जब तक हम भगत सिंह के विचारों, उनके संघर्ष के क्रांतिकारी तत्वों को आज के संदर्भों में पहचान नहीं लेते तब तक उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि नहीं दी जा सकती।   


आज भगत सिंह तुझे याद करना


साम्राज्यवाद के NGOवादी हमलों, चालों व बहुरूपों के सामयिक संदर्भ में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शहादत दिवस पर हमारे लिए सोचने-विचारने (और करने) के लिए एक गंभीर चुनौती है। सबसे पहले तो हमें यह सवाल पूछने की ज़रूरत है कि क्या पूँजीवादी-ब्राह्मणवादी-पितृसत्तात्मक पाले में खड़े होकर इन शहीदों को श्रद्धाँजलि दी जा सकती है। असल में तो अगर हम इन विचार-व्यवस्थाओं के नुमाइंदे हैं और इन्हीं में हमारे प्राण व हित बस्ते हैं तो हम महज़ श्रद्धाँजलि का कर्मकांड निभा सकते हैं। इससे ज़्यादा न हम कर पाएँगे और न करना चाहेंगे। कर्मकांड रहित कार्यक्रम सादगी व जज़्बे से, वक्ता/प्रस्तुतकर्ता और श्रोताओं के बीच व्यवहार-इज़्ज़त की समानता से संचालित होंगे। उनमें एक क्या किसी के लिए भी कोल्ड-ड्रिंक्स, मालाएँ, सोफ़े, दीप-प्रज्वलन और वाहवाही या तारीफ के पुल नहीं होंगे। 
भगत सिंह और अन्य क्राँतिकारियों के तौर-तरीकों को अक्सर यह कहकर सही परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशिश की जाती है कि उनका उद्देश्य खून बहाना या निर्दोषों की जान लेना नहीं था। उन्हें अंग्रेज़ों से कोई नस्लवादी नफरत या दुश्मनी नहीं थी। इसे न सिर्फ एसेंबली में फेंके गए बमों के संदर्भ से साबित किया जाता है बल्कि यह बात खुद भगत सिंह के बयानों और लेखों की मार्फत भी स्पष्ट हो जाती है। फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि क्राँतिकारियों के लिए अहिंसा कोई नैतिकतावादी प्रश्न नहीं था। साथ ही, वो उस हद तक और उस कारण ही क्राँतिकारी थे जिस हद तक और जिस कारण वो मानवतावादी थे। भगत सिंह जैसे क्राँतिकारियों का प्रेरक मूल्य इंसानियत थी। रबिन्द्रनाथ ठाकुर से कई मायनों में विपरीत समझ रखते हुए भी उनमें एक समानता यह थी कि दोनों राष्ट्रभक्ति के वीभत्स व संकुचित रूपों से सावधान थे। भगत सिंह की राजनीति सुंदर समाज व देश ही नहीं बल्कि समानता व इन्साफ पर आधारित सुंदर संसार के निर्माण की थी। उन्हें देश की सीमाओं में बाँधकर, पहलवानी देशभक्ति का प्रतीक बनाकर सीमित कर देना उनके साथ धोखा है। असल में देशभक्ति से बेहतर शब्द देशप्रेम है। भक्ति से न सिर्फ कर्मकांड की बू आती है बल्कि यह उस तार्किकता व आलोचनात्मक, प्रश्नवाचक वैचारिकता के भी विपरीत जाती है जिसे भगत सिंह क्राँतिकारियों का अनिवार्य लक्षण मानते थे। दूसरी तरफ प्रेम एक नैसर्गिक अनुभूति है और एक से प्यार हमें अन्यों से प्यार करने से नहीं रोकता। भक्ति ईर्ष्यालु और संकुचित है, क्राँतिकारी प्रेम उदार और मानवता तक विस्तारित।
              इसी तरह भगत सिंह के घर छोड़ने का कारण परिवारजनों द्वारा उनकी शादी तय कर दिया जाना बताया जाता है। इस निर्णय को वैवाहिक बंधन से बचकर क्राँतिकारी रास्ते पर चलने की शर्त के रूप में व्याख्यायित किया जाता है। यह कहना पड़ता है कि यहाँ भगत सिंह या तो ग़लत समझ रखते थे या फिर पारम्परिक-रूढ़िवादी वैवाहिक रिश्ते की आशंका के संदर्भ में ही उन्होंने उक्त निर्णय लिया होगा। पितृसत्ता के ढाँचे के तहत एक रूढ़िवादी विवाह सचमुच में बंधन होगा - जिसमें स्त्री की बेड़ियाँ कहीं मज़बूत होंगी मगर उसे उनका एहसास बनिस्बत कम हो सकता है। एक क्राँतिकारी का दूसरे क्राँतिकारी से विवाह अथवा उसके विवाह को क्राँतिकारी स्वरूप दे देने से विवाह बंधन नहीं बल्कि आज़ादी का संबंध हो जाएगा, क्राँति की कड़ी होगा। क्राँतिकारियों की युगजनित व व्यक्तिगत सीमाओं को पहचानकर और रेखांकित करके, हमें अपने विद्यार्थियों को आदमी-औरत के ऐसे रूढ़िवादी, स्त्री-विरोधी विमर्श के प्रति सचेत करके इसे खत्म करने की ज़रूरत है।
                भगत सिंह के मुक़दमे से लेकर उनकी फाँसी और अंतिम संस्कार तक में बरती गई सत्ता की डर भरी क्रूरता को भी बखूबी याद रखने की ज़रूरत है। अध्यादेश द्वारा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को ताक़ पर रखते हुए ट्रिब्यूनल का गठन करके उनपर मुक़दमा चलाया गया। इस ट्रिब्यूनल का मक़सद त्वरित कार्रवाई था और इसके ऊपर सुनवाई की गुंजाइश नहीं थी। इसी तरह तय तारीख से एक दिन पहले ही उन्हें फाँसी दे दी गई थी, वो भी सुबह की जगह शाम के वक़्त। उनके घरवालों को अंतिम मुलाक़ात का मौक़ा नहीं दिया गया और फिर रातों-रात जेल की पिछली दीवार तोड़कर उनके शवों को - कहते हैं कि टुकड़े-टुकड़े करके - चुपके से जलाकर हुसैनीवाला में सतलुज में फेंक दिया गया। यह बात विशेष महत्व की है कि अपने अंतिम समय में वो प्रार्थना नहीं कर रहे थे बल्कि लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। ज्ञान व समझ के प्रति ऐसी आस्था, ऐसा प्रेम-लगाव कि मरने से ठीक पहले पढ़ने की ललक हो एक अनोखी मनोदशा का परिचायक है। यह जानकर कि अब मरना ही है और न पुनर्जन्म में यक़ीन है और न ही ईश्वर में - तो फिर उसके रचे स्वर्ग-नर्क का तो कहना ही क्या - अगर कोई अधूरा पन्ना, अधूरा अध्याय पूरा करने की इच्छा जताता है तो यह केवल उसकी महत्ता नहीं है बल्कि एक झलकी है इंसान होने की संभावना की। मन्मथनाथ गुप्त लिखते हैं कि नेश्नल कॉलेज में जयचंद्र विद्यालंकार नाम के एक शिक्षक के प्रभाव से भगत सिंह और उनकी मित्र-मंडली का प्रवेश क्राँतिकारी दल में हो गया। वो आगे लिखते हैं, 'गुरु गुड़ ही रह गए और चेले चीनी हो गए।' इन्हीं शिक्षक का एक प्रभाव वो भगत सिंह के विद्याप्रेमी होने का भी मानते हैं। आज भी अगर हम अपने विद्यार्थियों को करियर महत्वाकांक्षा की जगह शिक्षाप्रेम की प्रेरणा दें पाएँ तो भी क्राँति के काम में परोक्ष योगदान दे सकेंगे। 
पूँजीवादी-साम्राज्यवादी NGO का चरित्र ही इस शिक्षाप्रेम के विरुद्ध है। भले वो कहीं मुफ्त में बस्ते बाँटें या स्कूलों में पुस्तकालय, कम्प्यूटर दें या शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए प्रारूप तैयार करें, उनकी भूमिका उस काठ के घोड़े जैसी है जिसे दुश्मन तोहफे के रूप में छोड़ जाता है और जिसमें छुपे सैनिक अंदर से शहर का द्वार आक्रमणकारियों के लिए चुपके-से खोल देते हैं। भलाई के नाम पर कॉर्पोरेट घरानों और उनके NGOs के चलाए जा रहे कार्यक्रमों के चरित्र व उसके खतरे को कोई भी शिक्षाप्रेमी व्यक्ति, बिना अधिक बारीक राजनैतिक विश्लेषण में जाए भी, कुछ तुलनात्मक उदाहरणों से समझ सकता है। अगर किसी धारावाहिक को चेहरे की क्रीम बनाने वाली कम्पनी प्रायोजित कर रही है तो क्या उसमें बाजार, नस्ल और लिंग के रंगभेदी उपकरणों को पहचानकर उनपर सवाल उठाने और उन्हें ध्वस्त करने के संदेश देने की संभावना व्यक्त होने दी जाएगी? आखिर क्यों सरकारी कर्मचारियों पर तोहफे लेने पर कुछ विशेष रोक है? इसका औचित्य इतना गूढ़ नहीं है। आखिर क्यों यह कहा जाता है कि अगर शोध में निजी शक्तियाँ प्रायोजकों की भूमिका में हैं तो उनके परिणामों पर संदेह जायज़ है? असल में निजी पूँजी द्वारा प्रायोजित शोध, कला, शिक्षा आदि को अपनी सम्भवनाओं, गरिमा और स्वतंत्रता की कीमत चुकानी ही पड़ेगी या यूँ कहें कि उनसे वसूल ली जाएगी। 
वहीं दूसरी तरफ इसी भलाईवादी काम को निजी पूँजी अपने प्रचार के साथ-साथ अपनी छवि चमकाने, जनसंसाधन हथियाने और सस्ते-समर्पित कामगार तैयार करने में इस्तेमाल करती है। चाहे वो TFA (टीच फॉर अमेरिका) की तर्ज पर स्कूलों में काम कर रहा TFI (टीच फॉर इंडिया) हो या 'असर' (ASER) नाम से बच्चों की अकादमिक स्थिति की सालाना रपट निकालने वाला और स्कूलों में काम कर रहा 'प्रथम' हो या महिन्द्रा कम्पनी का 'नन्हीं कली' नाम से स्कूलों में चल रहा लड़कियों की शिक्षा को निशाना बनाता कार्यक्रम या Magic Bus के नाम से बच्चों के खेलकूद को लेकर काम कर रही संस्था, ये सभी अपने मालिकाना स्वरूप के अनुरूप इतना ही उद्देश्य रखते हैं कि बच्चे उतना पढ़-लिख लें कि इनके धंधे में कम पैसों मगर पूरे एहसान तले हाथ बँटा सकें। ग़ौर से देखने पर हम इन NGOs और उन कॉर्पोरेट-पूँजीवादी सेठों-विचारकों के संस्थानों के तार मिले पाते हैं जोकि खुलकर बोलते हैं कि सरकार को स्कूल नहीं चलाने चाहिए और शिक्षा को निजी हाथों में छोड़ देना चाहिए। कुछ छद्म-कल्याणकारी भाव दिखाते हुए CCS (सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी) जैसे इनके अगुवा संस्थान यह भी कहते हैं कि सरकार को अगर फंड देना ही है तो वह उसे वाउचर के माध्यम से बच्चों को दे और फिर यह उनके अभिभावकों पर छोड़ दे कि वो किस निजी स्कूल में दाखिला लें, न कि खुद, सीधे स्कूलों पर खर्च करे। ('फंड चिल्ड्रन, नॉट स्कूल्स') ज़ाहिर है कि ऐसे में न स्कूल स्कूल रहेंगे, न शिक्षक शिक्षक, न विद्यार्थी विद्यार्थी। फिर शिक्षा की बात कौन करे? स्कूल कम्पनियों की तरह दुकान लगाएँगे, स्पर्धा करेंगे, प्रतिद्वंद्वी होंगे, शिक्षक कॉर्पोरेट अस्पतालों के डॉक्टरों की तरह रीढ़हीन होकर पेशे को व्यापारिक कुनीति के दलदल में धकेलने के आरोपी होंगे और विद्यार्थी खरीदार, ग्राहक। हमें न ऐसे दलाल शिक्षक बनना है और न ही अपने विद्यार्थियों, स्कूलों और समाज को इस घटिया, क्रूर, शोषणकारी व्यवस्था के सुपुर्द करना है। यह हमारे अस्तित्व की लड़ाई तो है ही, हमारी अस्मिता की लड़ाई भी है। 
                           अगर आज भगत सिंह हमारे बीच होते तो क्या वो किसी NGO के सदस्य बन जाते या खुद कोई NGO खोल लेते या फिर जनसंगठन और जनांदोलन के रास्ते क्राँति के मार्ग पर चलते? क्या वो दफ्तर में होते या फिर बस्तर में होते? क्या वो बस्तर में हैं?