Sunday, 1 April 2018

अनुवादित लेख: अंडमान का आश्रम


                                                                                                                                  अजय सैनी 


आज, सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ जिसमें SC/ST एक्ट को कमज़ोर करने वाले निर्देश दिए गए हैं कई दलित-आदिवासी व सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे संगठनों ने भारत बंद का आह्वान किया है I हम अपनी एकजुटता जताते हुए इस मौके पर एक अखबारी लेख का अनुवाद पेश कर रहे हैं जोकि न केवल हाशियाकृत वर्गों के प्रति हिंसा को दर्ज करता है, बल्कि संस्थाई क्रूरता के उदाहरण के तौर पर हमारे स्कूलों और शिक्षा से भी कई सवाल पूछता है..  
संपादक 

                                                                      

(अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की 25 मार्च की संडे मैगज़ीन में छपे लेख, The ashram in the Andamans, का अनुवाद)

आश्रम में शाम की पूजा के लिए सबकुछ तैयार है। लड़के पंक्तिबद्ध खड़े हैं, देखरेख करने वाले ने उनके धोती-कुर्तों की जाँच कर ली है और अब वो धैर्यपूर्वक पुजारी के, जोकि फ़ोन पर बात कर रहा है, निर्देशों का इंतज़ार कर रहे हैं। 
मैं आश्रम के मुख्य द्वार पर खड़ा सोच रहा हूँ कि पुजारी मुझे अंदर आने देगा या नहीं। मैं सकुचाते हुए प्रवेश करता हूँ मगर वो अपनेपन से मुस्कुराता है और एक ख़ाली कुर्सी की तरफ़ इशारा करता है। आश्रम दक्षिण अंडमान द्वीप पर स्थित है। 6 से 16 साल तक के तक़रीबन 80 'बेसहारा' या अनाथ लड़के यहाँ रहते हैं। यहाँ वो मुफ़्त आश्रय, भोजन, कपड़े, शिक्षा एवं धार्मिक अथवा आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं।  
कुछ वर्ष पूर्व द्वीप के प्रशासन ने दो छोटे लड़के आश्रम को सौंपे थे। ये बच्चे अंडमानी जनजाति से थे जोकि अंडमान द्वीप समूह का एक ऐतिहासिक रूप से अलग-थलग समुदाय रहा है और 2013 में जिसकी कुल आबादी मात्र 57 थी। 
जल्दी-ही आश्रम ने लड़कों को वापस भेजने का फ़ैसला किया। "वो बाक़ी बच्चों से पूरी तरह अलग थे। हमने पाया कि उन्हें संभालना व अनुशासित करना बेहद मुश्किल था", पुजारी ने मुझे बताया। एक दिन ये बच्चे आश्रम के छात्रावास से नादारद मिले। आख़िरकार वो एक तालाब के किनारे मिले जहाँ वो बिना पकी मछली का मज़ा ले रहे थे। पुजारी ने ठाना कि वो ख़ुद ऐसे व्यवहार को 'सुधारेगा', मगर सब व्यर्थ था। 
उसने उनसे हिंदी में जवाबतलब किया, "कच्ची मछली भी कोई खाने की चीज़ है? क्या तुमने आश्रम के किसी भी लड़के को मछली को कच्चा खाते हुए देखा है?" बड़े लड़के ने प्रतिरोध के स्वर में जवाब दिया कि जब उन्हें पता चलेगा कि कच्ची मछली का स्वाद कितना अच्छा होता है तो सभी मछली को बिना पकाये ही खाने लगेंगे। 
छोटा अंडमानी लड़का महज़ 7 या 8 साल का था। आश्रम के खाने से उसका हाज़मा ख़राब हो जाता था। वो अक़सर दिन में अपनी पैंट गंदी कर देता था और रात में अपना बिस्तर गीला कर देता था। बाक़ी निवासी चिढ़ गए थे और आश्रम ने फ़ैसला किया कि वक़्त आ गया था कि द्वीप प्रशासन उन्हें वापस ले जाये। 

उसे जाना ही था  

अपने मोबाइल पर लड़के की एकमात्र फ़ोटो दिखाते हुए पुजारी उत्तेजना में कहता है, "देखो, यह रहा वो, अपने बर्थडे केक के साथ फ़ोटो के लिए पोज़ देते हुए। हम उसे प्यार करते थे, पर दुर्गंध असहनीय थी।" अपने छोटे साथी के जाने के बाद बड़ा लड़का अकेला और उदास रहने लगा। उसने रात में आश्रम से भागने के कई प्रयास किये और अंततः द्वीप प्रशासन उसे वापस ले गया। अचानक, हमारी बातचीत को किसी घटना से व्यवधान पहुँचता है। मैं मुड़ता हूँ और पाता हूँ कि देखरेख करने वाले ने अभी-अभी एक छोटे लड़के को मारा है। ऐसा प्रतीत होता है कि लड़के ने अपनी धोती ठीक से नहीं बाँधी थी। वो अब अपनी धोती सही करता है और दोबारा पंक्ति में लग जाता है।  
"इन्हें बहुत अनुशासन की ज़रूरत है", पुजारी शांत स्वर में कहता है। 
मैं स्कूल में लड़कों की शैक्षिक प्रगति के बारे  पूछता हूँ। वो बताता है, "इनमें से अधिकतर को पढ़ाया नहीं जा सकता है।"
मैं बहस करने की कोशिश करता हूँ। पुजारी पूछता है, "क्या आप जानते हैं कि ये लड़के कौन हैं? अंग्रेज़ों ने दो तरह के लोगों को काला पानी का निर्वास दिया था - स्वतंत्रता सेनानी और छँटे-हुए अपराधी। इनमें से अधिकांश लड़के इन अपराधियों के ही वंशज हैं। आख़िर हम ऐसे समूह से उम्मीद भी क्या कर सकते हैं?"
इतना कहने के बाद पुजारी लड़कों को आगे बढ़ने का इशारा करता है। बाल-प्रमुख दल को मंदिर तक ले जाता है जहाँ सभी दो आयु-वर्गों में क़ालीन पर बैठ जाते हैं। उनके बीच में कुछ पुजारी बैठते हैं, मगर विशेष प्रकार की पूजा चटाइयों पर। एक लड़का हारमोनियम और एक पुजारी तबला बजाता है। प्रमुख-पुजारी आरती प्रारंभ करता है और सभी उसमें शामिल हो जाते हैं। 
आरती ख़त्म होने के बाद प्रमुख-पुजारी प्रवचन शुरु करता है। छोटे लड़कों का ध्यान जल्दी-ही भंग हो जाता है। वो एक-दूसरे को छेड़ते हैं, अपना सर या काँख खुजाते हैं, नाक में उँगली डालते हैं, दाँतों से नाख़ून कुतरते हैं....

इनके भाग्य में श्रम करना ही बदा है 

जब पुजारी मुझे मंदिर के द्वार तक छोड़ने आता है तब मैं उससे इन लड़कों के भविष्य के बारे में पूछता हूँ। वो जवाब देता है, "16 की उम्र के बाद, ये घर जायेंगे और अपने परिवारों को आर्थिक सहयोग देना शुरु करेंगे। इनमें से सभी की क़िस्मत में दिहाड़ी मज़दूर बनना लिखा है। हमारी आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा से ये कम-से-कम अच्छे और ईमानदार मज़दूर तो बन पायेंगे।"
एक छोटा लड़का, जिसने हमारी बातचीत सुन ली है, संकोचवश सामने आता है और मुझे बताशे के दो टुकड़े देता है। वो पीछे क़दम हटाकर स्थिर खड़ा हो जाता है, मुझसे नज़रें चुराता हुआ। लड़का मेरे बचपन की एक याद ताज़ा कर देता है: एक गणित के अध्यापक ने मेरे पिता को सुझाव दिया था कि स्कूल में वक़्त 'बर्बाद' करने के बदले मैं खेत में काम करूँ। उस बोझिल संवाद का एक-एक पल मुझे अनंत काल का लगा था। 
मैं पुजारी को बताना चाहता हूँ कि अगर वो अपने पूर्वाग्रहों और अज्ञान को त्याग देगा तो ये लड़के 'ईमानदार मज़दूरों' के अलावा बहुत-कुछ बन सकते हैं। मगर मुझसे इतना ही हो पाता है कि एक अटपटी ख़ामोशी से अपनी बातचीत समाप्त कर दूँ।     

(लेखक टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं।) 
(द हिन्दू से साभार) 

Wednesday, 28 March 2018

स्कूलों में सीसीटीवी लगाने और बायोमेट्रिक हाज़िरी लागू करने के विरोध में हस्ताक्षर अभियान

लोक शिक्षक मंच द्वारा दिल्ली सरकार व  दिल्ली नगर निगम  स्कूलों में सीसीटीवी लगाने और आधार युक्त बायोमेट्रिक हाज़िरी लागू  करने के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चलाया  जा रहा है,  अभियान के पहले पड़ाव को मंच  के साथियों ने उप-राज्यपाल महोदय तथा सम्बन्धित जनप्रतिनिधियों को दिया।  






Saturday, 3 March 2018

सैलरी संकट के दौर में अवार्ड की ख़ुशी


दिल्ली के तीन निगमों में से दो में कर्मचारियों को महीनों से देरी से वेतन दिया जा रहा हैI इन विकट आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में निगम प्रशासन व राज्य सरकार के ख़िलाफ़ निगम कर्मचारी लगातार आंदोलनरत हैं – कभी धरना प्रदर्शन करके तो कभी रैली निकालकरI ये सिलसिला पिछले कई वर्षों से जारी है और मामला अदालत में भी ले जाया गया है जहाँ निगम को कड़ी फटकार लगाई गई हैI लेकिन निगम व राज्य सरकार में शासन कर रहे दलों की आपसी खींचातानी के चलते कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकल रहा हैI इस बीच सफ़ाई कर्मचारी समय-समय पर हड़ताल पर जा चुके हैं, जिसके दबाव में उन्हें तत्काल राहत भी मिली हैI शिक्षकों की ओर से अभी निगम के विभिन्न कार्यक्रमों/आयोजनों का बहिष्कार व हड़ताल का कोई फ़ैसला नहीं किया गया हैI ऐसे में जबकि निगम के सभी कर्मचारियों के बीच एकजुटता और समन्वय की ज़रूरत है, हम एक शिक्षक साथी द्वारा दर्ज एक हालिया अनुभव साझा कर रहे हैंI                  

                                                                 .............. सम्पादक



अंकल आज बहुत खुश हैंI आज ही उन्हें ऑफिस से पत्र मिला है जिसमें लिखा है कि कल उन्हें उनके काम के लिए जोनल अवार्ड दिया जायेगाI खुश हों भी क्यों न, पूरे जोन से साल में सिर्फ एक सफाईकर्मी को यह अवार्ड दिया जाता हैI अंकल बहुत ही मेहनती हैं, पूरे दिन झाड़ू उनके हाथ से छूटती नहीं हैI छूटे भी कैसे, स्कूल इतना बड़ा जो है और निगम की ओर से वो स्कूल में अकेले सफाईकर्मी हैंI आज जैसे ही उनको अवार्ड मिलने की खबर पता चली, उन्होंने स्कूल के सभी लोगों से अवार्ड फंक्शन में चलने का अनुरोध कियाI पर इस ख़ुशी के पीछे वो थोड़ा परेशान भी दिखे,  हालाँकि उन्होंने खुद कोई बात नहीं बताईI मेरे साथ ही वो अक्सर छुट्टी के समय स्कूल से मेन रोड तक आते हैंI आज उनके चेहरे का रंग उतरा हुआ देखकर मैंने ही बात शुरु कीI मैं बोला, “आज तो आप बहुत खुश होंगे, कल आपको अवार्ड मिलेगा”I इसपर वो बोले, “सर! ख़ुशी तो हो रही हैI आपके काम की लोग तारीफ करते हैं तो अच्छा तो लगता हैI” अचानक उन्होंने बीच में ही रुकने को कहाI मैंने पूछा, “क्या हुआ अंकल, आज रास्ते में ही उतर रहे हैंI” इसके जबाव में उन्होंने जो कहा वो मुझे अन्दर तक हिला गयाI वो बोले, “सर! कल अवार्ड मिलेगा, इसलिए मैं उधार लेने जा रहा हूँI वहां स्कूल का स्टाफ भी होगा और मेरे अन्य साथी भी होंगेI उनके लिए कम-से-कम मिठाई का इंतजाम तो करना पड़ेगाI तनख्वाह तीन महीने से नहीं आयी हैI घर पर तो कोई भी देखने नहीं आता है पर वहां तो खाली हाथ नहीं जा सकते नI हम लोग तो कोई और काम भी नहीं कर सकते, इस सैलरी पर ही पूरी तरह निर्भर हैंI एमसीडी के दूसरे सफाई वाले तो आन्दोलन करके सैलरी जबरदस्ती ले लेते हैं पर हम स्कूल वालों को देखने वाला कोई भी नहीं हैI” मैं सोचता रहा कि दिल्ली की राजनीति किस स्तर पर पहुँच गयी है, जहाँ आपके कर्मचारी की परेशानियाँ आपकी चिंता के केंद्र में नहीं हैं मगर एक-दूसरे को नीचा दिखाने में आप किसी भी हद तक गिर सकते हैंI ऐसी परिस्थितियों में क्या पुरस्कार देने का कोई औचित्य है?



Wednesday, 28 February 2018

स्कूलों में शिक्षकों के लिए बायोमेट्रिक हाज़िरी व कक्षाओं में सीसीटीवी लगाने के अपमानजनक फरमानों के विरोध में


क्रम सं. लो.शि.मं./01/फ़रवरी/2018                                दिनांक: 27 फ़रवरी, 2018

प्रति
शिक्षा मंत्री,
दिल्ली सरकार
दिल्ली I

विषय: स्कूलों में शिक्षकों के लिए बायोमेट्रिक हाज़िरी व कक्षाओं में सीसीटीवी लगाने के अपमानजनक फरमानों के विरोध मेंI

महोदय,
लोक शिक्षक मंच, जोकि शिक्षकों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों का संगठन है, आपके समक्ष दिल्ली सरकार के स्कूलों से जुड़े दो हालिया फ़ैसलों का विरोध दर्ज करता हैI सर्वप्रथम, शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी एक ताज़ा आदेश के अनुसार सभी स्कूलों को एक माह के अंदर शिक्षकों की हाज़िरी दर्ज करने के लिए ‘आधार’-आधारित बायोमेट्रिक उपकरण लगाने को कहा गया हैI ऐसे में जबकि सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ‘आधार’ की वैधानिकता पर ही सुनवाई कर रही है, आपका यह आदेश कहीं से भी उचित नहीं हैI इस तरह के आदेश से यह स्पष्ट है कि सरकार का प्रधानाचार्यों व शिक्षकों पर भरोसा नहीं हैI क्या शिक्षकों व प्रधानाचार्यों पर अविश्वास और उन्हें दरकिनार करके शिक्षा में किसी ‘क्रांति’ की कल्पना की जा सकती है? बायोमेट्रिक हाज़िरी की प्रक्रिया न सिर्फ़ निजता का उल्लंघन है, बल्कि अपमानजनक भी हैI साथ ही, ‘आधार’ को लागू करने से सरकार को यूआईडीएआई को भुगतान करना पड़ेगा जोकि जनता के धन का अपव्यय होगाI
दूसरी ओर, सुरक्षा व शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के नाम पर कक्षाओं में सीसीटीवी लगाने की घोषणा की गई हैI हमारा मानना है कि ऐसा करने से न सिर्फ सुरक्षा व शिक्षा को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है, बल्कि सीसीटीवी लगाकर इन अहम मुद्दों की भ्रमित करने वाली व्याख्या को ही मज़बूती मिलेगीI इस संदर्भ में यह भी कहा गया है कि कक्षा की लाइव फ़ीड विद्यार्थियों के अभिभावकों के पास उपलब्ध होगीI ऐसा करने से बच्चों पर पढ़ाई के साथ-साथ उनके आपसी व्यवहार को लेकर भी बहुधा संकुचित सोच रखने वाले परिवारों का अनुचित दबाव बढ़ेगाI क्या इस फ़ीड के दुरुपयोग की संभावना से भी इंकार किया जा सकता है? विद्यार्थियों से यह पूछने की ज़हमत नहीं उठाई गई है कि वो इस बारे में क्या सोचते/सोचती हैंI उनकी गतिविधियों, सचेत-अचेतन पलों को रिकॉर्ड करना और फिर उन्हीं की सुरक्षा व शिक्षा के नाम पर सार्वजनिक कर देना कहीं से भी न्यायोचित नहीं हैI यह बच्चों के निजता के अधिकार का हनन है, जबकि विद्यार्थियों के सभी अधिकारों की हिफ़ाज़त करना सरकार की ज़िम्मेदारी हैI दूसरी तरफ़, कक्षाओं में सीसीटीवी लगाने का साफ अर्थ शिक्षकों पर अविश्वास करके हम शिक्षकों पर चौकीदार बिठाना हैI ऐसा निगरानी भरा माहौल शिक्षण के लिए कदापि अनुकूल नहीं हो सकता हैI हाँ, चारों ओर सीसीटीवी लगाने से निजी सुरक्षा की कंपनियों के बाज़ार का विस्तार ज़रूर होगाI
हमारा मानना है कि उपरोक्त दोनों फ़ैसले स्कूलों में यांत्रिकता को बढ़ावा देकर शिक्षा के मूल चरित्र को गंभीर नुकसान पहुँचायेंगेI शिक्षा एक सजीव व मानवीय संबंधों पर आधारित प्रक्रिया है, जबकि आपके फ़ैसले इसे एक मशीनी-निर्जीव प्रक्रिया में बदलने को उतारू हैंI इन आदेशों को थोपने का मतलब स्कूलों को पुलिसिया निगरानी, जासूसी और जेलनुमा माहौल के हवाले करना होगाI साथ ही, ये निर्णय सार्वजनिक धन के ग़ैर-ज़िम्मेदार व्यय को दर्शाते हैंI अंततः बायोमेट्रिक हाज़िरी लागू करने व कक्षाओं में सीसीटीवी लगाने से न केवल स्कूलों के लोकतान्त्रिक व आकादमिक चरित्र को आघात पहुँचेगा, बल्कि यह शिक्षकों की गरिमा व आत्म-सम्मान पर सीधा हमला हैI
लोक शिक्षक मंच इन फ़ैसलों का कड़ा विरोध करते हुए इन्हें तत्काल वापस लेने की माँग करता हैI
सधन्यवाद  

सदस्य, संयोजक समिति            सदस्य, संयोजक समिति              सदस्य, संयोजक समिति
लोक शिक्षक मंच                   लोक शिक्षक मंच                   लोक शिक्षक मंच           

प्रतिलिपि:
उपराज्यपाल, दिल्ली          

Wednesday, 21 February 2018

ईमानदार सरकार से सवाल

दिल्ली सरकार के स्कूल में पढ़ाने वाली एक शिक्षिका साथी द्वारा शिक्षा विभाग से लगातार शिक्षकों को करण बताओ  नोटिस आने पर यह खुला पत्र दिल्ली के मुख्यमंत्री को लिखा है, यह पत्र उनकी अनुमति से यहाँ सांझा कर रहे हैंI

Good afternoon.

My query to the Aam Aadmi Party is regarding the show cause notices sent to many teachers from different government schools of Delhi.

1. Was a background check conducted regarding the credibility of the teacher before sending the notices?

2. Was a feedback taken from the students, HOS, TDCs, mentors, SMC members and other staff members about the performance of the concerned teacher?

3. Does poor assessment score mean poor teaching skills? Have we reflected on our assessment tools instead? Are they in coherence with the learning style of the learner?

4. Is this how an honest government rewards it's honest teachers, by entirely shattering their faith in the government they had so religiously believed in and promoted their cause for quality education?

5. Who would compensate for the stress and mental harassment caused to the individual by this act of our beloved government?

6. Did you ensure equal and just distribution of work to all teachers within a department in a school? And what about other duties assigned to the teachers that makes them miss their classes? How would you justify  loss of those learning hours to the students?

7. How do we expect short cuts in education? Is the reformation one day or one year thing? 


I seek reply to these queries of mine. I still want to continue believing in this government. 

Thank you .

Jai Hind.

पर्चा: आइए, एकजुट होकर वेतन व गरिमा की लड़ाई लड़ें!!



साथियों,


यह घोर विडंबना है कि एक महाशक्ति और विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर देश की राजधानी तक में हम शिक्षकों को महीनों से समय पर वेतन नहीं दिया जा रहा है और हम अपने वेतन की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं। इससे न सिर्फ़ हमारा मनोबल टूट रहा है, बल्कि हम क़र्ज़ा लेने व लोन की क़िस्तें न भर पाने की स्थिति में आ गए हैं। स्कूलों को दलगत व क्षुद्र राजनीति का अखाड़ा बनाकर टेस्ट परिणामों और दिखावे के दबाव में राज्य सरकार व निगम के बीच जो खींचातानी चल रही है, उसका खामियाजा हम शिक्षकों को भुगतना पड़ रहा है। 
एक तरफ़ दिल्ली सरकार अपने शिक्षकों को परिणामों व हाज़िरी के आधार पर मेमो पर मेमो दिये जा रही है, दूसरी तरफ़ निगम भी दिल्ली सरकार की शिक्षा व बाल-विरोधी नीति की नक़ल करते हुये विद्यार्थियों को टेस्ट के आधार पर विभाजित करने और स्कूलों को केवल साक्षरता-केंद्र तक सीमित करने की योजना बना रहा है। इन्हीं टेस्ट्स के बहाने एनजीओ के धंधे और स्कूलों में अप्रशिक्षित वॉलंटियर की भूमिका को और बढ़ाया जाएगा। यह सबकुछ हम शिक्षकों को नाकाम, नाकारा बतलाकर किया जा रहा है। हमारी एसीआर में भी विद्यार्थियों द्वारा स्कूल छोड़ने के लिए हमें ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि हम जानते हैं कि इसके पीछे स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं की कमी, बच्चों के परिवारों के आर्थिक व शैक्षिक हालात और (विशेषकर लड़कियों के मामले में) सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियाँ ज़िम्मेदार होती हैं।





डिजिटलाइज़ेशन के तहत हम लगातार अपनी कक्षाओं, विद्यार्थियों को छोड़कर ऑनलाइन आँकड़े भेजने में लगे रहते हैं। चाहे वो वैसे ही नाममात्र के वज़ीफ़े हों, प्रवेश प्रक्रिया हो या व्यवस्था के ईमानदार, पारदर्शी व सुलभ हो जाने के दावे, हम सब जानते हैं कि ऑनलाइन की हक़ीक़त क्या है। बच्चे व अभिभावक बैंकों के चक्कर लगाने और कतारों में लगकर अपना वक़्त और दिहाड़ी गँवाने को मजबूर किए जा रहे हैं। सुविधाएँ लोगों की पहुँच से दूर व जटिल होती जा रही हैं। शिक्षा अधिकार क़ानून चाहे काग़ज़ों में हमारे लिए ग़ैर-शैक्षणिक काम को प्रतिबंधित करता हो, इस लंबी होती सूची के लिए कोई कर्मचारी नहीं है। हाँ, नित नए आदेश भेजने और तत्काल रपट माँगने के लिए ऑनलाइन व्यवस्था प्रशासन को ज़रूर जँचती है। 
सफ़ाई कर्मचारी पर्याप्त संख्या में नहीं हैं, मगर स्वच्छता का प्रदर्शन करने का इतना दबाव है कि हमने ख़ुद को ही नहीं बल्कि अपने विद्यार्थियों तक को उनकी पढ़ाई व स्वास्थ्य की क़ीमत पर झोंक दिया है। शौच जैसे निजी मामलों तक के लिए हमारे आत्म-सम्मान को कुचलकर हलफ़नामे भरवाये जा रहे हैं। हमारी तमाम निजी जानकारी को यू-डाइस पर भरवाया जा रहा है और हमारे निजता के अधिकार को कुचला जा रहा है। हमें इस लायक़ नहीं समझा जा रहा कि हम अपने प्रशिक्षण, पेशागत विवेक, अनुभव व अपनी योजना के हिसाब से शिक्षण और स्कूल की प्रक्रिया तय कर सकें। किस दिन विद्यार्थियों को कौन-सा भाषण जबरन पिलाना है, कौन-से दिन पढ़ाई नहीं करानी है, कौन-सा कार्यक्रम करना है, कौन-सी गतिविधि से कोई कार्यक्रम सम्पन्न करना है, यह सब हमें अनिवार्य आदेशों के तहत बताया जा रहा है। मानो स्कूलों व शिक्षकों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही न हो, हम महज़ एक मशीन के पुर्ज़े हों।
हम सब जानते हैं कि निगम से लेकर राज्य व केंद्र सरकार तक को शिक्षा में न तो आकादमिक गहराई की चिंता है और न ही सब बच्चों को समान अधिकार देने की। हाँ, अगर ऑनलाइन डाटा न भरा-भेजा जाये तो हम पर ज़रूर कार्रवाई होती है। शिक्षकों पर अपराधी की तरह नज़र रखने की दृष्टि से कक्षाओं में सीसीटीवी लगाने की घोषणा दिल्ली सरकार कर ही चुकी है, कई राज्यों में – दिल्ली के कुछ स्कूलों में भी – बायोमेट्रिक हाज़िरी से निगरानी रखी जाने लगी है। आज न सिर्फ़ बड़ी-बड़ी कंपनियाँ निजी डाटा का कारोबार करती हैं, बल्कि यह हमारी सरकारों के लिए नागरिकों की जासूसी करने व हमको क़ाबू में रखने का औज़ार भी है। इस क्रम में हम पूर्वी दिल्ली नगर निगम के साथियों द्वारा ऑनलाइन कार्य का बहिष्कार करने के फैसले का स्वागत करते हैं।
चाहे वो न्यूनतम वेतन हो या ठेके पर नियुक्तियाँ या यूनियन बनाने पर बढ़ती पाबन्दियाँ, साम्राज्यवादी-पूंजीवादी ताक़तों के ये हमले केवल शिक्षा पर नहीं हो रहे, बल्कि इनकी मार मज़दूरों, किसानों, आदिवासियों पर भी पड़ रही है और जनता के जल-जंगल-ज़मीन व संसाधनों को अपनी लालच की हवस का निशाना बना रही है। और ये हमले केवल भारत में ही नहीं,
बल्कि वैश्विक स्तर पर हो रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च-शिक्षा तक में जन-विरोधी और पूँजी को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ अपनाई जा रही हैं। सार्वजनिक यूनिवर्सिटी-कॉलेज को कहा जा रहा है कि वो फ़ीस बढ़ाकर और निजी कंपनियों से क़रार करके अपने ख़र्चे का एक बड़ा हिस्सा ख़ुद जुटाएँ। ज़ाहिर है कि एक तरफ़ इससे शिक्षा उन वर्गों से दूर होती जाएगी जिनकी पहुँच आज भी बेहद सीमित है, बल्कि जब निजी कंपनियों की जरूरतों के मुताबिक़ पढ़ाया जाएगा तो शिक्षा का चरित्र जनविरोधी और ज्ञानविरोधी भी होता जाएगा। अगर हमने आज कमर कसकर इन नीतियों का विरोध नहीं किया तो कल हमारे पास न सार्वजनिक स्कूल बचेंगे और न हमारे पेशे की गरिमा और आज़ादी|
हम माँग करते हैं कि
Ø  तुरंत प्रभाव से शिक्षकों के वेतन, एरियर्स व फंडस के नियमित भुगतान की व्यवस्था की जाए।
Ø  शिक्षकों की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले सीसीटीवी व बायोमेट्रिक हाज़िरी के फ़रमान को वापस लिया जाये।
Ø  स्कूलों में डाटा एंट्री ऑपरेटर की नियुक्ति की जाए और शिक्षकों से यह काम न लिया जाए।
Ø  टेस्ट परिणामों, एसीआर, मेमो, स्वच्छता अभियान का तानाशाही दबाव तुरंत हटाया जाए।
Ø  आउटसोर्सिंग, पीपीपी, एनजीओकरण आदि के ज़रिये निजीकरण करने की नीति को बंद किया जाए।
Ø  शिक्षा व्यवस्था को समानता व सामाजिक न्याय के संवैधानिक मूल्यों पर मज़बूती से खड़ा किया जाए।

Thursday, 8 February 2018

दिल्ली सरकार के नाम विरोध पत्र


लोक शिक्षक मंच, जोकि शिक्षकों, विद्यार्थियों और शिक्षा के शोधार्थियों का संगठन है, दिल्ली सरकार द्वारा स्कूलों के सभी कमरों में सीसीटीवी लगाने की घोषणा की कड़ी शब्दों में निंदा करता है। साल के शुरु होते ही दिल्ली सरकार द्वारा घोषणा की गयी कि स्कूलों के सभी कमरों में सीसीटीवी कैमरे लगाये जायेंगे। मुख्यमंत्री ने बयान दिया कि इससे बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और अभिभावकों को कक्षाओं का सीधा प्रसारण उपलब्ध होगा जिससे वो पढ़ाई पर भी नज़र रख पायेंगे।   
यह योजना न सिर्फ़ शिक्षक-विरोधी है बल्कि मूलतः शिक्षा व स्कूलों की ग़लत समझ पर भी आधारित है। स्कूल आकादमिक स्थल हैं जिनमें शिक्षक एक बौद्धिक-नैतिक ज़िम्मेदारी के साथ काम करते हैं और बच्चे एक खुले माहौल में सीखते हैं। चाहे यह शिक्षकों पर नज़र रखने के लिए हो या बच्चों पर, कक्षा में कैमरे लगाने का मतलब शिक्षकों व बच्चों पर अविश्वास करना और उन्हें अपमानित करना है। कैमरे की उपस्थिति प्रायः जो डर व दबाव पैदा करती है वो बेहतर शिक्षण-अधिगम के प्रतिकूल है। यह शिक्षा का मशीनीकरण करेगा और शिक्षण प्रक्रिया को प्रदर्शनमुख बनाएगा। हमारे स्कूलों में शारीरिक दंड का गिरता चलन और इसके प्रति बदला रवैया यह बताता है कि हिंसा के प्रश्न को पुलिसिया निगरानी से नहीं बल्कि सांस्कृतिक-राजनैतिक बदलाव से निपटना होगा। ऐसा भी नहीं है कि स्कूलों में बच्चों या शिक्षकों के बीच जो तरह-तरह की समस्याएँ आती हैं उनसे जूझने के लिए हमारे पास सिर्फ़ तथाकथित अपराधी की पहचान करने और उसे पकड़ने के ही विकल्प रहते हैं। स्कूलों में अगर समस्यायेँ हैं भी तो हम उनका अपराधिकरण करके उनसे पुलिस की तरह नहीं निपटते बल्कि अपने विवेक, मानवीकरण और संवाद का इस्तेमाल करते हैं। शिक्षक होने के नाते हमारे पास कई बारीक, शिक्षागत और परिपक्व तौर-तरीक़े होते हैं। केवल अपराधी को पकड़ने वाले उपायों पर ज़ोर देने से हम कभी भी यह पड़ताल नहीं कर पायेंगे कि आख़िर वो कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जिनसे कुछ किशोरों के व्यवहार में एक ख़ास संकट व्यक्त हो रहा है या इस संकट का चरित्र और मूल क्या है। फिर हर सीसीटीवी फ़ूटेज व्यापक संदर्भ से कटा होता है और क्षणभर या घटना विशेष के विडियो पर फ़ोकस करके उन परिस्थितियों को हमारी नज़रों से ओझल कर दिया जाता है जो उसके लिए ज़िम्मेदार हैं। एक तरफ़ हम शिक्षकों को सुरक्षा और जवाबदेही के नाम पर मकड़जाल में फंसाया जा रहा है, दूसरी तरफ़ जनता को सुधार के सब्ज़बाग़ दिखाये जा रहे हैं।     
क्या सरकार यह कहना चाहती है कि उसके स्कूलों के हर विद्यार्थी के अभिभावक के पास स्मार्ट-फ़ोन होना चाहिए? क्या कक्षा का लाइव-फ़ीड देने से इस संभावना को पूरी तरह नकारा जा सकता है कि छात्र-छात्राओं के उठने-बैठने तथा निजी व उन्मुक्त पलों के विडियो का दुरुपयोग नहीं होगा? क्या सरकार को यह अधिकार है कि वो उन बच्चे-बच्चियों की विडियो रिकॉर्डिंग करके उसे प्रसारित कर दे जो एक विश्वास के तहत उसके स्कूलों में आ रहे हैं? हमारे घर-परिवारों से भी हिंसक घटनाओं की खबरें आती रहती हैं, तो क्या कल हम सभी घरों में कैमरे लगाकर उनका लाइव फ़ूटेज सार्वजनिक करने का उपाय अपनाएँगे? ख़ुद विद्यार्थियों, विशेषकर छात्राओं द्वारा आपसी चर्चा में इसे बिग बॉस रूपी जासूसी की तरह देखा जा रहा है। जिस दमघोंटू सामाजिक माहौल से छात्राएँ आती हैं उस संदर्भ में उन्हें स्कूलों से विश्वास और सहयोग की ज़रूरत है न कि और अधिक निगरानी की। इसकी संभावना प्रबल है कि जब कक्षाओं में विद्यार्थियों की गतिविधियाँ उनके अभिभावकों की नज़रों में रहेंगी तो वो अपने बच्चे-बच्चियों की पढ़ाई ही नहीं बल्कि दोस्ती, बातचीत, आपसी व्यवहार और मेल-मिलाप पर और भी प्रतिकूल दबाव डालने की स्थिति में होंगे। हमारे परिवारों का सामंती-पितृसत्तात्मक चरित्र कक्षा के सीसीटीवी फ़ूटेज से और मज़बूत होगा जोकि विशेषकर लड़कियों की आज़ादी और सीमित करेगा। स्कूलों में विद्यार्थियों को एक ऐसा सार्वजनिक स्थल मिलता है जहाँ वो जाति-धर्म की जकड़नों से परे जाकर आधुनिकता से प्रेरित मित्रता गढ़ सकते हैं। सीसीटीवी से स्कूलों की संस्कृति और भूमिका और अधिक प्रतिक्रियावादी तथा छात्र/छात्रा विरोधी हो जाएगी।     
कैमरों का इस्तेमाल जेलों में क़ैदियों की निगरानी रखने के लिए किया जाता है। यह इन्सानों की गरिमा पर एक निष्ठुर व निरंकुश सत्ता का हमला है जिसे हम शिक्षक स्वीकार नहीं कर सकते हैं। चाहे वो हिंसा का सवाल हो या शिक्षा के तथाकथित स्तर का, इनकी जड़ें समाज के अमानवीय ढाँचे और संस्कृति में हैं। निजी स्कूलों के अनुभव बताते हैं कि प्रशासन द्वारा कैमरे का इस्तेमाल स्कूलों में भी उसी तरह से होता है जिस तरह दुकानों व कारख़ानों में कर्मचारियों/मज़दूरों के शोषण के लिए होता है – कहीं कुर्सी पर बैठने पर रोक लगा दी जाती है, कहीं कपड़ों पर सवाल खड़े कर दिये जाते हैं। सीसीटीवी लगाने से यह सत्ता मज़बूत ही होगी। अगर सरकार को समाज के कमज़ोर-मेहनतकश वर्गों की सुरक्षा की इतनी ही चिंता होती तो वो उन कारख़ानों की अमानवीय व ग़ैर-कानूनी परिस्थितियों पर नज़र रखती जिनमें मज़दूरों का शोषण होता है। फिर शायद बवाना में उन दर्जनों महिलाओं व बच्चों की मौत नहीं हुई होती जो कारखाने की आग में जलकर राख हो गए। रहा स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा का सवाल तो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार, की एक रिपोर्ट के अनुसार स्कूल बच्चों के लिए आज भी सबसे सुरक्षित स्थल हैं।
ज़रूरत इस बात की है कि स्कूलों में सभी पदों पर नियमित नियुक्तियाँ की जाएँ, एक भय व शोषण मुक्त संस्कृति का निर्माण किया जाए और बच्चों व महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े क़ानूनों – POCSO (The Protection of Children from Sexual Offences Act), 2012 और POSH (Sexual Harassment of Women at Workplace Act), 2013 – को लागू करके उनके प्रावधानों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाये। शिक्षा विभाग के सभी स्तरों पर शोषण-विरोधी समितियों का गठन किया जाये। जहाँ सरकार जनता का इतना पैसा ऐसे उपकरण पर ख़र्च करके निजी कंपनियों को मुनाफ़ा दिलाने पर उतारू है वहाँ यह पूछने की भी जरूरत है कि वो कौन-से अन्य तरीक़े हो सकते हैं जिनसे स्कूलों में बेहतर ढंग से एक स्वस्थ माहौल बनाया जा सके। यह तो ऐसा है कि हम एक समस्या से जूझने के लिए उससे बड़ी एक अन्य समस्या खड़ी कर लें।      
सीसीटीवी का यह बेहूदा प्रस्ताव सरकार के इस दावे को भी ख़ारिज करता है कि उसका शिक्षा-दर्शन व नीति केंद्र सरकार से अलग या अधिक प्रगतिशील है। सच तो यह है कि चाहे वो स्कूलों की रैंकिंग करना हो या school of excellence के नाम से शिक्षा में ग़ैर-बराबरी की एक और परत बनाकर अपनी सार्वजनिक ज़िम्मेदारी से पलटना हो, दिल्ली सरकार की नीतियाँ कहीं से भी केंद्र सरकार की मंशाओं से जुदा नज़र नहीं आती हैं। ये सभी उदाहरण साबित करते हैं कि केंद्र सरकार की तरह ही दिल्ली सरकार की शिक्षा नीतियाँ भी नवउदारवाद की चाकरी कर रही हैं।           
लोक शिक्षक मंच आपसे अपील करता है कि दिल्ली सरकार की इन शिक्षा विरोधी नीतियों के खिलाफ लामबंद होकर पुरजोर विरोध करें।