Wednesday, 26 March 2014

रपट : 23 मार्च शहादत दिवस

लोक शिक्षक मंच ने संत नगर में 23 मार्च की शाम सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह की शहादत दिवस पर एक सभा का आयोजन किया । सभा में मंच के सदस्यों के अतिरिक्त कुछ शिक्षकों व विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। सभा की शुरुआत पंजाब के जनकवि पाश की, जिनकी शहादत भी इसी तारीख को हुई थी, दो कविताओं के पाठ और भगत सिंह के दिए गए इन्क़लाबी नारे से की गई। इसके बाद एक मिनट का मौन रखकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। सभा के दौरान मंच के कुछ साथियों ने भगत सिंह की प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे, जिनमें गहन अध्ययन का महत्व, तार्किकता, साम्राज्यवाद सहित हर तरह के शोषण के खिलाफ संघर्ष आदि शामिल थे।
 आज के समय में समाज में, विशेषकर शिक्षा जगत के संदर्भ में, उपरोक्त सभी चिंताओं का बने रहना भगत सिंह सहित उन सभी क्रांतिकारियों के विचारों की प्रासंगिकता को बढ़ा देता है जिन्होंने आज़ादी का अर्थ व मेल एक समतामूलक और न्यायप्रिय सामाजिक व्यवस्था से लगाने का आह्वान किया था। साथियों द्वारा समूह में क्रांतिकारी गीतों से सभी उपस्थित लोगों की हिस्सेदारी और हौसला-अफ़ज़ाई की गई। राजेश्वर प्रसाद (निगम शिक्षक व कवि) ने शहीदों को समर्पित एक स्व-रचित गीत प्रस्तुत करके शहीदों के बलिदान व विरासत को याद किया। उपस्थित विद्यार्थियों ने भगत सिंह द्वारा अपने जीवन के विभिन्न मोड़ों पर लिखे गए खतों को पढ़कर भगत सिंह की मानवीय व राजनैतिक प्रतिबद्धताओं को सभा के समक्ष साझा किया।
  
डॉ. विकास गुप्ता (प्रोफेसर इतिहास विभाग दिल्ली विश्व विद्यालय व सदस्य अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच ) ने इस अवसर पर राष्ट्रवाद की ऐतिहासिकता, उसकी व्याख्या व प्रकार को लेकर समाज-विज्ञान में चली आ रही बहस व अतीत-आधुनिकता के सरलीकृत द्वंद्व पर एक इतिहासकार की नज़र डालते हुए सभा का ध्यान आकर्षित किया। आज़ादी के संघर्ष के दौरान राष्ट्रवाद व आज़ादी के मायने को लेकर चली बहसों पर रौशनी डालते हुए उन्होंने भगत सिंह की ऐसे सभी सवालों पर तीखी और साफ़ वैचारिकता को रेखांकित किया तथा एक जनपक्षधर, इंसाफ व बराबरी पर टिके समाज के आदर्श के पहलू को ही उनके लगातार प्रासंगिक बने रहने का एक महत्वपूर्ण कारण बताया। सभा का अंत साथी कमलेश के समापन वक्तव्य व इन्क़लाबी नारे से संघर्ष के संकल्प को ताज़ा करने से हुआ।
   

Saturday, 22 March 2014

पर्चा : भगतसिंह-राजगुरू-सुखदेव की शहादत को आज याद करने की जरूरत क्यों है?


साथियों, 
आज हम ऐसे समय में हैं जब चारों ओर निराशा व असंतोष का माहौल व्याप्त है तथा समाज में बेरोजगारी, भुखमरी, भ्रष्टाचार व हिंसा लगातार बढ़ रही है। पूंजीवादी ताकतें अपने स्वार्थों को साधने के लिए उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे रही हैं। इसके लिए वे लोकप्रिय सांस्कृतिक माध्यमों के जरिये खासतौर से नौजवानों को आत्मकेन्द्रित बनाने की कोशिश कर रही हैं। औरतों, वंचित व कमजोर तबकों को लगातार हिंसा व शोषण का शिकार बनाया जा रहा है, जिसके फलस्वरूप उनके लिए आजादी केवल नाममात्र की है।
देश की आबादी के बहुसंख्यक लोग हाशिये पर जीवन जीने को मजबूर हैं  और देश के तमाम आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संसाधनों पर कुछ मुट्ठी भर लोगों का कब्जा है। देश की शिक्षा व्यवस्था की स्थिति भी इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था से अछूती नहीं हैं बल्कि इसे और पुष्ट करने का ही काम कर रही है। धार्मिक रीति-रिवाजों व अंधविश्वासों का सबसे अधिक खामियाजा औरतों व वंचित वर्गाें को उठाना पड़ता है और संस्कृति के नाम पर उन्हें अपनी शोषण की स्थिति को आत्मसात् करने को मजबूर किया जाता है। देखा जाए तो शिक्षा का सही अर्थ विद्यार्थियों को तार्किक, चेतनशील तथा देश-समाज के प्रति जागरूक बनाना है ताकि वे अपने व सभी कमजोर वर्गों के विरूद्ध होने वाले शोषण को पहचानंे और उसके खिलाफ संगठित होकर संघर्ष करें। शहीद भगत सिंह का मानना था कि जो शिक्षा हमें अतार्किक, अवैज्ञानिक और भाग्यवादी बनाती है वह सही मायने में शिक्षा नहीं है। उन्होंने अपने लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?‘ में स्पष्ट किया है कि मनुष्य को भाग्यवादी नहीं होना चाहिए अपितु तार्किक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। बहुत से लोग शिक्षा व नैतिकता का अभिप्राय ईश्वर में आस्था से लगाते हैं। जबकि हमें याद रखने की जरूरत है कि भारत में ही नास्तिकता की एक समृद्ध, विचारशील व मानवता के प्रति समर्पित परम्परा रही है जिसकी एक महत्वपूर्ण कड़ी शहीद-ए-आजम भगतसिंह भी थे। हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था से ऐसी नौजवान पीढ़ी तैयार करनी चाहिए जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस हो। आज भी समाज में तरह-तरह के अवैज्ञानिक दृष्टिकोण, नियतिवाद, अंधविश्वास आदि प्रतिगामी विचार व्याप्त हैं जिनका खात्मा हम तार्किक एवं वैज्ञानिक शिक्षा व्यवस्था से ही कर सकते हैं, और यह सिर्फ राज्य द्वारा पोषित समान स्कूल व्यवस्था के जरिये ही संभव है। परन्तु शिक्षा पर निजीकरण के बढ़ते हमले से समतावादी व वैज्ञानिक चेतना की शिक्षा की परिस्थितियों व सम्भावनाओं को खत्म किया जा रहा है। शिक्षा को विद्यार्थियों को विवकेशील बनाना चाहिए ताकि वे हर रूढि़वादी विचार की आलोचना कर सकें, उसे संदेह के दायरे में रखकर जांच-पड़ताल कर उसे चुनौती दे सकें। भगत सिंह के ही शब्दों में- विवेक एक ध्रुव तारा है जो सही रास्ता बनाकर चमकता रहता है, मगर कोरा विश्वास और अंधविश्वास खतरनाक होता हैै क्योंकि वह दिमाग को कुंद करता है और आदमी को प्रतिक्रियावादी बना देता है।

लोक शिक्षक मंच आपको  भगतसिंह, राजगुरू व सुखदेव की शहादत को याद करके उन्हें श्रद्धान्जली देने के लिए 23 मार्च, शाम 4 बजे संत नगर, बुराड़ी में आयोजित सभा में आमंत्रित करता है।


                           भगतसिंह को जानें......

क्रांतिकारियों का विश्वास है कि देश को क्रांति से ही स्वतन्त्रता मिलेगी। वे जिस क्रांति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रांति का रूप सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जायें। क्रांति पूँजीवाद, वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली प्रणाली का अंत कर देगी। यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी उससे नवीन राष्ट्र और नये समाज का जन्म होगा। क्रांति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामाजिक अवांक्षित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनैतिक शक्ति को हथियाये बैठे हैं। (’बम का दर्शन’ नामक लेख से जिसे गांधी जी के लेख ’बम की पूजा’ के जवाब में लिखा गया।)


सबसे पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इंसान समान हैं तथा न तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य-विभाजन से। अर्थात क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन-भर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं। इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कहकर दुत्कार दिया एवं निम्नकोटि के कार्य करवाने लगे। साथ ही यह भी चिंता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें, तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों का फल है। अब क्या हो सकता है? चुपचाप दिन गुजाारो! इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शांत करा गए। लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया। मानव के भीतर की मानवता को समाप्त कर दिया। आत्मविश्वास एवं स्वावलंबन की भावनाओं को समाप्त कर दिया। बहुत दमन और अन्याय किया गया। आज उस सबके प्रायश्चित का वक्त है। (जून 1928 के ’किरती’ में छपे ’अछूत का सवाल’ नामक लेख से)

भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। ऐसी स्थिति में हिंदुस्तान का भविष्य बहुत अंधकारमय नजर आता है। इन धर्मों ने हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं। (’साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ नामक लेख जून 1928 के ’किरती’ में छपा था)                                                          
हमारा यह भी विश्वास है कि साम्राज्यवाद एक बड़ी डाकेजनी की साजिश के अलावा कुछ नहीं। साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथों मनुष्य के और राष्ट्र के हाथों राष्ट्र के शोषण का चरम है। साम्राज्यवादी अपने हितों और लूटने की योजनाओं को पूरा करने के लिए न सिर्फ न्यायालयों एवं कानून का कत्ल करते हैं बल्कि भयंकर हत्याकांड भी आयोजित करते हैं। अपने शोषण को पूरा करने के लिए जंग जैसे खौफनाक अपराध भी करते हैं।.............शांति व्यवस्था की आड़ में वे शांति व्यवस्था को भंग करते हैं। (5 मई 1930 को लाहौर साजिश केस की सुनवाई के दौरान लिखे गए पत्र ’अदालत एक ढकोसला है’ से)                                                                          
हमारी शिक्षा निकम्मी होती है और फिजूल होती है। और विद्यार्थी-युवा-जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता। उन्हें इस संबंध में कोई भी ज्ञान नहीं होता। जब वे पढ़कर निकलते हैं तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफ़सोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता। जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज ही अकल के अंधे बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाए। (जुलाई 1928 के ’किरती’ में छपे लेख से)

प्रगति के समर्थक प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह पुराने विश्वास से संबंधित हर बात की आलोचना करे, उसमें अविश्वास करे और उसे चुनौती दे। प्रचलित विश्वास की एक-एक बात के हर कोने-अंतरे की विवेकपूर्ण जांच-पड़ताल उसे करनी होगी। यदि कोई विवेकपूर्ण ढंग से पर्याप्त सोच विचार के बाद किसी सिद्धांत या दर्शन में विश्वास करता है तो उसके विश्वास का स्वागत है।...........मगर कोरा विश्वास और अन्धविश्वास खतरनाक होता है। क्योंकि वह दिमाग को कुंद करता है और आदमी को प्रतिक्रियावादी बना देता है। (27 सितंबर 1931 के ’द पीपुल’ में छपे ’मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ नामक लेख से)  

Monday, 3 March 2014

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा आयोजित अधिवेशन पर शिक्षकों के अनुभव

यह लेख कुछ शिक्षक  साथियों ने तालीम की लड़ाई के लिए लिखा है इसलिए इसे हम तालीम की लड़ाई से साभार दे रहे हैं। ……… संपादक मंडल 

14 व 15 जनवरी 2014 को दिल्ली में क्रमशः अशोक होटल और विज्ञान भवन में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने शिक्षा अधिकार कानून के तीन साल पूरे होने पर एक राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित किया था। इस अधिवेशन के घोषित उद्देश्य निम्नलिखित थे- 2010 से 2013 तक कानून लागू होने से हुई प्रगति का आंकलन करना; चुनौतियों पर नजर डालना और श्रेष्ठ उदाहरणों से सीख लेना तथा; ऐसे सुझाव देना जिससे कि विशेषकर सबसे वंचित तबकों के बच्चों के लिये शिक्षा का मुफ्त व अनिवार्य अधिकार समयबद्ध रूप से हासिल हो जाये। अधिवेशन को आयोग ने युनिसेफ के साथ मिलकर/आर्थिक सहयोग से आयोजित किया था। हालांकि, इस रपट में हम अपने उन अनुभवों व अवलोकनों को साझा करेंगे जिनसे हमें भाजपा-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बताये जा रहे व गुजरात के वर्तमान मुख्यमंत्री के नेतृत्व की शिक्षा-विरोधी समझ का परिचय मिला। मगर अधिवेशन पर भी कुछ साफ टिप्पणी करना जरूरी है। आयोजन स्थल अपने आप में आयोग की जन-प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिये मजबूर करता है। क्या आमजन से इस कदर कटे हुए ही नहीं, बल्कि उनको अपमानित-शोषित करने में सहायक स्थलों पर जनता की मेहनत के पैसों की फिजूलखर्ची और अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियों की पूंजी से परोसे गये पांचसितारा भोजन- पहले दिन का डिनर स्पष्टतः युनिसेफ द्वारा प्रयोजित था- के सहारे भारत के लोगों के हकों पर कोई ईमानदाराना चर्चा की जा सकती है? यह रोचक और महत्वपूर्ण है कि अशोक होटल के माहौल के मुकाबले विज्ञान भवन में प्रतिभागी शिक्षकों व अन्य लोगों की भागीदारी व हस्तक्षेप न सिर्फ कहीं अधिक रहा, बल्कि उसमें एक रवानी, आत्मविश्वास व जनपक्षधरता भी दिखी। इसी के साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रथम और सेंटर फाॅर सिविल सोसाइटी जैसे नवउदारवादी नीतियों के पैरवीकार एन.जी.ओ. के वक्ता व मुख्य प्रतिभागी दूसरे दिन नदारद रहे जबकि उनका नाम परिचर्चा के प्रतिभागियों की सूची में था। हो सकता है कि इसके पीछे का कारण उनके द्वारा मंच से रखे गये विचारों-प्रस्तावों को मिला तीखा विरोध हो, या यह भी हो सकता है कि जब उनकी पहुंच सीधी योजना-आयोग और वित्त तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालयों तक हो तो निष्प्रभावी, दिखावटी व भ्रमित करने वाले ऐसे आयोगों के समक्ष अपनी बात रखना उनके लिये शायद वक्त की बरबादी हो।
एक अन्य सवाल प्रतिभागियों को बुलाने की प्रक्रिया को लेकर उठाया जाना चाहिए। अधिवेशन में विभिन्न राज्यों से सरकारी स्कूलों के शिक्षकों, स्कूल प्रबंधन समिति व पंचायत के प्रतिनिधियों को बुलाया गया था पर इनके चयन का तरीका लोकतांत्रिक नहीं था। उचित यह होता कि पर्याप्त समय पूर्व सार्वजनिक प्रचारों के माध्यम से इनकी व अन्य लोगों- अभिभावकों सहित- की सहभागिता आमंत्रित की गई होती। कुल मिलाकर चर्चा खुली हुई जिसका प्रमाण यह है कि रह-रहकर श्रोताओं-प्रतिभागियों,विशेषकर शिक्षकों ने समान स्कूल व्यवस्था की जरूरत बताई। इसका असर यह हुआ कि मंच से भी कुछ वक्ताओं और संचालकों ने इस विचार का समर्थन किया, भले ही वो सुव्याख्यायित न रहा हो।
आयोग की अध्यक्षा ने अपने समापन वक्तव्य में पूर्व-प्राथमिक से 18 साल तक की उम्र के लिये शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की स्पष्ट वकालत की और साफ शब्दों में कहा कि अयोग इसे अपनी रपट में प्रस्तावित करेगा। अधिवेशन को चार चर्चा समूहों में बांटा गया था और हमारी शिरकत ‘लर्निंग प्रोसेसेस ऐंड आउटकम्स (सीखने की प्रक्रियायें और परिणाम)  में रही क्योंकि विभिन्न नवउदारवादी ताकतों द्वारा इस विषय पर गलत व खतरनाक समझ परोसकर सार्वजनिक शिक्षातंत्र को नेस्तनाबूत करने की नीतियों की जमीन तैयार की जा रही है और उन्हें राज्य के स्तर पर तेजी से प्रश्रय भी मिल रहा है।
अब आते हैं गुजरात से आये प्रतिनिधिमंडल के व्यवहार व तैयारी पर। यह उल्लेखनीय था कि पहले दिन, सुबह की चाय के समय, गुजरात की स्कूली शिक्षा पर एक छः पृष्ठों की रंग-बिरंगी, आंकड़ों व फोटोयुक्त (जिसमें मुख्यमंत्री की 5 फोटो थी)  पुस्तिका सब कुर्सियों पर रख दी गई। फिर, उसी दिन आउटकम्स वाले समूह की चर्चा की शुरूआत उसी राज्य की पॉवर प्वाइन्ट प्रस्तुति से शुरू हुई। अन्य कोई राज्य इस तरह की प्रचारी तैयारी से नहीं आया था। इस तैयारी को खतरे का संकेत मानते हुये भी, क्यों छटपटाहट व उतावलेपन के रूप में देखना उचित होगा, यह जाहिर हो गया। गुजरात राज्य की प्रस्तुति में एक जगह कुछ विद्यार्थियों के नामों के साथ उनके अंकों की तालिका दर्शाई गई थी। इसे लेकर सवाल उठाना स्वाभाविक था और ऐसा ही हुआ भी। अन्यों के अलावा चर्चा में संचालक ने ही प्रस्तुति के फौरन बाद इसे निजता का उल्लंघन का उदाहरण बताकर प्रस्तुतिकर्ता को आरोपित किया। यह रेखांकित करने की जरूरत है कि प्रस्तुतिकर्ता और कोई नहीं गुजरात के प्राथमिक शिक्षा के प्रधान सचिव थे जिन्हें उस आलोचना के बाद भी बात समझ नहीं आ रही थी! प्रस्तुति में एक और जगह ‘प्रार्थना’ को विद्यार्थियों के सतत् व समग्र मूल्यांकन का अंग दिखाया गया था। इसको लेकर जब सवाल खड़ा किया गया कि प्रार्थना जैसी चीज को विद्यार्थियों के आंकलन का आधार नहीं होना चाहिए क्योंकि यह अंतःकरण का दायरा है, तो इसको भी गुजरात से आये प्रतिभागियों को समझाने में निराशा ही हाथ लगी। चर्चा के बीच में अवकाश के समय में गुजरात से आये कुछ शिक्षकों के साथ बातचीत के दौरान एक का कथन हैरान-परेशान करने वाला था। उन्होंने अपनी बाजू दिखाते हुए कहा, ‘‘यहां से काटूंगा तो मोदी निकलेगा।’’ यानी वो कहना चाह रहे थे कि उनकी रग-रग में मुख्यमंत्री समाये हैं और वो उनके प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं। जिस राज्य व्यवस्था में सरकारी शिक्षकों का मानस इस तरह अधिनायकवाद-व्यक्तिवाद की चपेट में आ जायेगा, वहां हमें आलोचनात्मक शिक्षा की उम्मीद छोड़नी पड़ेगी। यह शिक्षा के लिय बेहद चिंताजनक है कि शिक्षकों की विचारशीलता, गरिमा, स्वतंत्रत चिंतन को इस कदर गिरवी रख दिया जाये। शिक्षण बौद्धिक कर्म है और इसे किसी व्यक्ति के प्रति मानसिक गुलामी करके अंजाम देना असंभव है। यह समझ में आ गया था कि अन्य राज्यों के बनिस्बत गुजरात के प्रतिनिधिमंडल को एक अलग ही ढंग से चुनकर भेजा गया था। वो आये नहीं, भेजे गये थे और उनका व्यवहार उसी परिपाटी में था। इस माहौल में गुजरात के बच्चों की शिक्षा का किन अंधेरों में दम घोंटा जा रहा है, यह शोचनीय है। प्रतिनिधिमंडल ने अपनी प्रस्तुति में बहुत गर्व से कहा कि उन्होंने अपने स्कूलों के लिये पचास लाख से अधिक रुपए एकत्रित किये हैं। पूछने पर उन्होंने बताया कि यह रकम राज्य ने नहीं दी है बल्कि ‘उन्होंने’ कुछ रईसों-सेठों से दान-चंदे में जमा की है। इसके अच्छे परिणाम एवं सबूत के तौर पर उन्होंने अपने फोन पर एक फोटो दिखाते हुये कहा कि उनके स्कूल में प्रत्येक बच्चे के पास टैबलेट है। इस परिघटना को हमने उस पुस्तिका से समझा जिसमें जगह-जगह तालिकायें ये जश्न मना रहीं थीं कि गुजरात में स्व-निर्भर विद्यालयों की श्रेणी तेजी से बढ़ रही है। जाहिर है कि जब स्थानीय सामंतों या पूंजीपतियों का धन दान-चंदे के रूप में स्कूलों को दिया जायेगा तो उसकी शैक्षिक-राजनैतिक कीमत भी वसूली जायेगी। स्कूलों का स्वरूप सार्वजनिक नहीं रहेगा, वे अनुग्रहीत रहेंगे, उनके मैदानों, हाॅलों का नामकरण शोषकों के नाम पर होगा और शिक्षकों-स्कूलों की स्वायत्तता खत्म करते हुये उन जनविरोधी ताकतों-वर्गों पर वहां कोई सवाल खड़े नहीं किये जा सकेंगे। यह अनायास नहीं था कि सेंटर फाॅर सिविल सोसाइटी के वक्ता पार्थ शाह ने अपने अभिभाषण में गुजरात सरकार की इस नीति की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी कि वहां निजी स्कूलों को कानून के फुजूल के मापदण्डों के आधार पर नहीं वरन् मुख्यत (85 प्रतिशत) विद्यार्थियों के परीक्षा-परिणामों के आधार पर ही मान्यता-स्वीकृति मिलती है! इस अनुभव ने हमें आगाह कर दिया है कि कम-से-कम शिक्षा को लेकर भावी प्रधानमंत्री बताये जा रहे व्यक्ति की नीतियों व उनके नेतृत्व की समझ कितनी खतरनाक है। इसमें निजता, आलोचनात्मक चिंतन व अंतःकरण की स्वतंत्रता का उल्लंघन, शिक्षकों की बौद्धिक स्वायत्तता पर हमले, स्कूलों की समग्र समझ तथा उसके भौतिक मापदण्डों को और कमजोर करना तथा राज्य द्वारा अपनी संवैधानिक व जनप्रतिबद्ध वित्तीय जिम्मेदारी से पलायन को तेज करना शामिल है।
उपरोक्त से यह भी समझ में आता है कि क्यों इस नेतृत्व को न सिर्फ धार्मिक उग्रता, घृणा, हिंसा की ताकतों से एक नैसर्गिक बल मिल रहा है, बल्कि क्यों राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शक्तियां बेसब्री से इसके अधिष्ठित होने का ढोल पीट रही हैं। लोकपक्षधर ही नहीं बल्कि शिक्षा मात्र से सरोकार रखने वाले सभी प्रगतिशील संगठनों व लोगों को इस खतरे का एकजुट होकर मुकाबला करना होगा।

Saturday, 1 March 2014

दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के 50 प्राथमिक स्कूलों को ‘गोद’ देने के प्रस्ताव के विरोध में


दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के 50 प्राथमिक स्कूलों को विभिन्न निजी संस्थाओं को सार्वजनिक-निजी साझेदारी PPP की नीति के अंतर्गत ‘गोद’ देने के प्रस्ताव के विरोध में।





Thursday, 27 February 2014

शिक्षक डायरी : मिड डे मील - कुछ अनुभव

लेखक शिक्षक साथी ने अपना नाम इस अनुभव के साथ न देने का अनुरोध लोक शिक्षक मंच से किया था जिसे हमने स्वीकार किया अतः हम इस अनुभव के साथ लेखक का नाम नही दे रहे हैं। ……संपादक

आज जब मुझे मिड डे मील पर कुछ लाइनें लिखने के लिए कहा गया तो मन में प्रथम प्रश्न यही था कि इस बारे में क्या लिखा जाए। वैसे तो बतौर मिड डे मील के द्वितीय इंचार्ज के रूप में मुझे mcd के एक स्कूल में दो साल से ऊपर हो गये हैं। अनुभव इतना है कि अगर मैं एक पेशेवर लेखक होता तो शायद एक किताब इस विषय पर लिखी जा सकती थी। ख़ैर, एक अध्यापक (वो भी सरकारी सामुदायिक संस्था का) होने के नाते मुझे समझ नहीं आ रहा है कि इस योजना के किस पहलू को उठाऊँ। किसी भी बड़ी योजना के नफ़ा व नुकसान दोनों पहलू होते हैं या कहें कि कुछ महत्ता व कुछ खामियाँ होती हैं। ख़ैर इन बातों को विराम देते हुए मैं आपके सामने इस योजना के फायदों को छोड़कर कुछ खामियों की चर्चा करना चाहूंगा। पिछले दो साल के दौरान मेरा अनुभव ये कहता है कि इस योजना से न केवल बच्चे (जिन्हें पोषणयुक्त भोजन मिलना चाहिए) बल्कि अध्यापक ,खाना सप्लाई करने के लिए ngo द्वारा प्रयुक्त गाड़ीवान ,खाना वितरण करने वाली /वाले
कर्मचारी भी प्रभावित होते हैं। सरसरी तौर पर मैं इस योजना की खामियों का ठीकरा सरकार पर फोड़ना चाहूंगा। सरकार पहले तो भ्रष्टपूर्ण तरीके से ngos का चयन करती है। ngos से, जिनको मिड डे मील पकाने व वितरण का जिम्मा सौंपा जाता है, सांठ-गांठ करते हुए शायद घूस तक भी ली जाती है। इसके अलावा ये बड़े ओहदे वाले अधिकारी इन ngos से मासिक /वार्षिक सांठ-गांठ भी रखते हैं।  मेरे यहाँ (स्कूल में) कई बार उपस्थित बच्चों की संख्या से कम बच्चों का खाना आया है जबकि खाना प्राप्त करने वाले बच्चे पूरे दिखाए जाते हैं। खाना कम होने की बात जब ngo प्रमुख के सामने रखी जाती है तो उसका जबाब होता है, "सर जी आज-आज काम चला लो, कल से बढ़ा कर भेजूंगा।" अगर  खाना थोड़ा (यानि 100 -150 बच्चों का) कम है तो काम चला भी लिया जाता है। मगर अंतर ज्यादा होने पर जब उसे और खाना उतारने के लिए मजबूर किया जाता है तब उसका जबाब "सर बिस्कुट बंटवा देना, मैं  पैसे भेज दूंगा" सुनना पड़ता है व ऐसा कई बार करना भी पड़ता है। मगर हद तब होती है जब पहले दिन ये बातें होने के बाद अगले दिन भी खाना उपस्थित बच्चों से कम का भेजता है। तो मजबूरन उससे तू-तू मैं-मैं करनी पड़ती है। ngo के संचालक का फिर यही जबाब होता है, "सर बिस्कुट बंटवा देना"। मगर अगर सख्ती की जाती है तथा गाड़ी वाले को पूरा खाना देने व उतारने के सम्बन्ध में चेतावनी दी जाती है तो मिड डे मील सप्लायर ngo के संचालक अगले दिन गाड़ीवान बदल देते हैं। नया गाड़ीवान नया होने की ताकीद देकर पल्ला झाड़ना शुरू करता है। जब तक उसकी समझ में सारा खेल आता है तब तक मिड डे मील ngo संचालक नया गाड़ीवान ढूंढ लेते हैं। खैर, ये तो खाना कम होने की बात है। अक्सर जो खाना आता है उसमें सब्जी में पिछले दिन दोपहर की पाली वाले स्कूल की मीनू की सब्जी मिक्स होती है। उदाहरण के लिए, अगर मेरे स्कूल में सुबह के समय मीनू में पूरी व आलू की सब्ज़ी है तथा पिछले दिन दोपहर की पाली के मेनू में दाल-चावल है, तो बची हुई दाल आलू की  सब्ज़ी में मिक्स होती है। हालाँकि खाने के स्वाद में कोई फर्क नहीं होता। पूड़ी के आइटम में अक्सर पूरी सख्त होती है। शिकायत पर जबाब मिलता है कि पूड़ी तो मशीन बनाती है या आगे से शिकायत का मौक़ा नहीं आएगा परन्तु समस्या जस-की-तस रहती है। मेरे स्कूल में कुछ समय से अध्यापक /अध्यापिकाएं भी mcd के आदेश के बाद से खाना चख रहे हैं और पूड़ियों के सन्दर्भ में उनकी राय भी यही है कि वे सख्त होती हैं। मगर समस्या का इलाज शायद मुश्किल है क्योंकि जिस ngo, सूर्या चेरिटेबल, से मेरे स्कूल में खाना आता है वह 1,46,100 बच्चों का मिड डे मील बनाता है। जाहिर है, इतने बच्चों का खाना बनाने में कम-से-कम 8 से 10 घंटे तो लगते ही होंगे। तो पूड़ियाँ 8 -10 घंटों के बाद सख्त होंगी ही, चाहे वो कितनी ही बढियां क्यों न बनी हों। आगे चलें तो इस योजना की अतार्किकता का शिकार खाना वितरण करने वाले कर्मचारी भी हैं। मेरे स्कूल में 4 महिलाएं खाना बांटती हैं, जबकि मेरे ही विद्यालय भवन में कुछ समय से अस्थायी तौर पर चल रहे एक अन्य mcd स्कूल में 2  खाना बाँटने वाली कर्मचारी हैं। दोनों ही स्कूलों में खाना बाँटने वाली कर्मचारियों को अलग-अलग मेहनताना दिया जाता है। सरकार द्वारा कोई दिशा-निर्देश न देने के कारण सप्लायर ngo संचालक अपनी मर्जी से भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हैं। मेरे स्कूल में खाना बाँटने वाली महिला को 466 रूपये मिलते हैं जबकि दूसरे स्कूल की महिला को 500 रूपये मिलते हैं। शिकायत करने पर ngo मालिक कहता है, "जी दूसरे स्कूल से ज्यादा हाजिरी आती है,आपके से कम आती है।" जब कठोरता से कुछ समय पहले ये बात मैंने ngo संचालक के सामने उठाई तो उनका जबाब था कि अब तो दीवाली से सरकार ही इनके पैसे बढ़ाने वाली है। वैसे तो मैंने हर प्रमुख बात रखने की कोशिश की है, फिर भी जल्दबाज़ी में कोई तथ्य /खामी छूट गई हो तो मैं खेद प्रकट करता हूँ। साथ ही, मैं ये भी कहना चाहता हूँ कि यदि विद्यालय प्रशासन तथा अभिभावक एकता का परिचय देते हुए इस योजना की खामियों को दूर करने की ठान लें तो शायद ही इसमें कोई खामी रहे। अंत में मैं ये स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैंने उपर्युक्त तथ्यों में अपने सहयोगियों के असहयोगात्मक रवैये, मिड डे मील की ज़िम्मेदारी सम्भालने के कारण मुझ पर पड़ती निजी वित्तीय परेशानियों तथा कुछ अपनी खामियों के बारे में नहीं लिखा है।           

Wednesday, 12 February 2014

चर्चा : दिल्ली का वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य

दिल्ली के वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य को समझने के लिए लोक शिक्षक मंच द्वारा 25 जनवरी 2014 को दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय शिक्षा संस्थान में दोपहर 2 बजे एक सभा आयोजित की गई। इसमें मुख्य वक्ता के तौर पर श्री राम कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले साथी राकेश को आमंत्रित किया गया था। लोक शिक्षक मंच के सदस्यों के अतिरिक्त भी कुछ साथियों ने चर्चा में हिस्सा लिया। राकेश के प्रस्ताव पर चर्चा का स्वरूप मुख्य सम्बोधन का न होकर उपस्थित लोगों द्वारा विषय पर अपने-अपने विचार/प्रश्न रखना तय हुआ। कुछ साथियों ने इस नये राजनैतिक उभार के प्रति अपने संदेह व्यक्त किये जोकि जातीय विषमता, आरक्षण, आर्थिक नीति आदि विषयों पर इसकी समझ को लेकर थे। कुछ ने माना कि विचारधारा की कथित नामौजूदगी के बावजूद इसे समर्थन नहीं तो सहानुभूति प्राप्त हो रही है। यह बात भी सामने आई कि इस परिघटना से लोगों में एक स्तर पर राजनैतिक सक्रियता व हस्तक्षेप की लालसा और सम्भावना बढ़ रही है। इसे वर्तमान व्यवस्था की सीमाओं के अंदर एक बेहतर विकल्प तो माना जा सकता है पर क्योंकि इसने भ्रष्टाचार की एक सतही व्याख्या को जन-मुद्दा बनाने की कोशिश की है इसलिए यह व्यवस्थाजनक अन्याय को पहचानने से बचती है - जोकि वर्गीय शोषण और लोकहित के संदर्भ में ख़तरनाक है। इस विचार का ज़ोरदार खंडन किया गया कि समाज व राजनीति में ताक़तों का उठान व पतन किसी प्राकृतिक नियम की तरह होता है।  
कुल मिलाकर सभा इस नतीजे पर पहुँची कि इस प्रशासन व सरकार से इनकी ग़लत राजनीति की वजह से अधिक उम्मीद न रखते हुए, इसपर जनहित के व्यापक मुद्दों पर - सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन प्रणाली, मज़दूरों की कार्य परिस्थितियाँ आदि - निरंतर दबाव बनाए रखना चाहिए। इससे राजनैतिक उभार की वर्तमान परिस्थितियों को जनपक्षधरता की तरफ़ मोड़ने में कामयाबी हासिल हो सकती है और सत्ता की दोगली-जनविरोधी राजनीति लोगों के समक्ष बेनक़ाब भी हो सकती है। यह सब करते हुए भी हमें अपनी विचारधारात्मक रूप से पुख्ता ज़मीन पर ही लोगों के बीच सही राजनैतिक समझ बनाने हेतु काम करते रहना है, चाहे वो किसी भी स्तर पर हो।