Monday, 27 October 2014

पर्चा : बुराड़ी स्कूल भवन को असुरक्षित घोषित करके विद्यार्थियों को कहीं और भेजने के विरोध में

दिल्ली के सम्मानित नागरिकों !

हम आपके सामने बुराड़ी विद्यालय के माध्यम से उभरी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आई हमारी शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई लेकर आये हैं। बुराड़ी स्कूल भवन को, जिसमें कि हमारे क्षेत्र के अधिकांश बच्चे पढ़ते हैं, अचानक इस सत्र के बीच में जबकि परीक्षाएँ होने वाली थीं, यह कहकर बंद कर दिया गया कि अब यह भवन बच्चों के पढ़ने के लिए सुरक्षित नहीं है। सुनने में आ रहा है कि अब इतने बच्चों को कहीं और भेजा जाएगा जो कि आस-पास तो कतई नहीं होगा। इस संदर्भ में हम आपसे कुछ सवाल साझा करना चाहते हैं-
प्रश्न: क्या स्कूल की इमारत अचानक खतरनाक घोषित हो गई ?
हमारा मानना है कि ऐसा नहीं है। यह इमारत अचानक खतरनाक घोषित नहीं हुई है बल्कि यह मरम्मत के अभाव में इस हालत में पहुँच गयी है। यदि इसका रखरखाव ठीक ढंग से किया जाता तो यह इस हालत में नहीं होती। इसके अलावा यह ठेकेदार द्वारा भवन बनाने में घटिया सामान लगाने की तरफ भी इशारा करता है।

प्रश्न: बुराड़ी के इस स्कूल में इतने अधिक बच्चे (लगभग सात हजार ) क्यों पढ़ते हैं ? 
हमारा क्षेत्र अभी नव-विकसित होता हुआ क्षेत्र है। हमारे इस इलाके में नए बसे हुए परिवारों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हमारे इस इलाके की जरूरत के अनुसार सही संख्या में स्कूल नहीं खोले गए और इसी कारण से एक ही विद्यालय में हमारे क्षेत्र के इतने बच्चे पढ़ने को मजबूर हैं।

प्रश्न: क्या बच्चों को सप्ताह में केवल तीन-तीन दिन स्कूल बुलाकर पढ़ाना ठीक है ?
हमारा मानना है कि यह बच्चों के साथ सरासर धोखा है। साथ ही, यह शिक्षा अधिकार कानून का भी खुला उल्लंघन है, जिसमें 6 से 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने की सरकार ने गारंटी दी है।

प्रश्न: क्या इस स्थिति को किसी भी तरह टाला नहीं जा सकता था? क्या सत्र के बीच में बच्चों की पढ़ाई में आई रुकावट को रोका नहीं जा सकता?
हमें लगता है कि अगर समय रहते, छुट्टियों में मरम्मत कराके, इलाके में प्राइवेट स्कूलों के दोपहर बाद खाली पड़े भवनों को सरकार के आदेश से बुराड़ी स्कूल की नई इमारत बनने तक स्कूल चलाने का इंतजाम कराके, क्षेत्र में सरकारी जमीनों पर समय रहते कक्ष बनाकर और निजी जमीनों को अधिग्रहित करके उन पर स्कूल बनाकर और सबसे बढ़कर पूर्व-नियोजित तरीके से समय रहते ही नए स्कूल खोलकर इस स्थिति से निबटा जा सकता था। मामला इच्छाशक्ति का भी है।
       
प्रश्नः क्या स्थानांतरण पर सभी बच्चे दूर के स्कूलों में जा पाएँगे?
हमें लगता है कि कई परिवार अपने बच्चों को दूर भेजकर नहीं पढ़ा पाएँगे। इस तरह सैकड़ों बच्चों की पढ़ाई छूट जाएगी। इसकी मार लड़कियों पर अधिक पड़ेगी। दूरी की वजह से स्कूल में बच्चों की हाजिरी भी कम हो सकती है। कुछ परिवार अपने दूसरे जरूरी खर्च कम करके अपने बच्चों की पढ़ाई और अपनी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को प्राइवेट स्कूलों के बाजार की भेंट चढ़ाने को मजबूर हो जाएँगे। जो बच्चे दूर के स्कूलों में स्थानांतरण ले भी लेंगे उन्हें अतिरिक्त वक्त, थकान, मारामारी और खर्चा वहन करना होगा। इस इलाकेे में ही नहीं बल्कि पूरी दिल्ली की परिवहन व्यवस्था की नाकामी से हम सब वाकिफ हैं - स्टूडेंट बस पास बनाए नहीं जा रहे, बसें हैं नहीं, हैं तो भरी रहती हैं, बच्चों के लिए रुकती नहीं या वो चढ़ नहीं पाते और दूसरी तरफ प्राइवेट स्कूलों के लिए धड़ल्ले से डी टी सी की बसें लगी हुई हैं।  

प्रश्नः ठेके पर काम करने वाले शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों का क्या होगा?
हमारा मानना है कि आज के दौर में जब सरकारें खुलकर निजीकरण को बढ़ावा दे रही हैं, पक्की नौकरियाँ खत्म करके सामाजिक असुरक्षा फैला रही हैं, मेहनतकश वर्गों के बरसों की लड़ाइयों से जीते गए हक छीन रही हैं और देशी-विदेशी कम्पनियों को जल-जंगल-जमीन व जनता के अन्य संसाधन सौंप रही हैं, स्कूल स्थानांतरित होने की गाज ठेके पर नियुक्त सफाई कर्मचारियों से लेकर शिक्षकों तक सभी पर गिरेगी।

प्रश्नः आज कितने विद्यालयों की इमारतें खतरनाक घोषित हो चुकी हैं? इनके बंद होने से फायदा किसे होगा ?
हमारे इसी इलाके में काली बिल्डिंग के नाम से मशहूर निगम के बुराड़ी बाल विद्यालय का भवन भी पिछले दो साल से खतरनाक घोषित होकर बंद है। उसमें पढ़ने वाले जो सैकड़ों विद्यार्थी पहले सुबह स्कूल जाते थे वो अब बगल के स्कूल में दोपहर बाद एक अन्य स्कूल के पहले से पढ़ रहे सैकड़ों बच्चों के साथ किसी तरह पढ़ने को मजबूर हैं। कइयों ने प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश ले लिया है। इसके बावजूद, नया भवन बनाना तो दूर, प्रशासन ने अबतक उस पुराने भवन को गिराने का काम भी शुरु नहीं किया है! दिल्ली के सौ से ज्यादा स्कूलों के भवन खतरनाक घोषित हो चुके हैं। जाहिर है, इस स्थिति से सीधा फायदा भवन निर्माण में लगे ठेकेदारों को और शिक्षा को बाजार में बेचने वाली चीज बनाकर मुनाफा कमाने के लिए निजी स्कूल खोलने व चलाने वालों को ही होगा।
             उपर्युक्त प्रश्नों के माध्यम से कुछ बातों पर रोशनी डाली गई हैं। शिक्षा का वही अधिकार मतलब रखता है जो बराबरी पर टिका हो। शिक्षा का अधिकार कोई सरकारी या प्राइवेट संस्था का अहसान या खैरात नहीं है। यह लोगों द्वारा लड़कर जीता गया हक है जिसका वादा संविधान भी करता है। स्कूलों में एक-एक दिन छोड़कर कक्षाएँ चलने लगें तो हम यह सोचकर संतुष्ट नहीं हो सकते कि चलो काम तो चल रहा है। विद्यार्थियों के लिए मुफ्त परिवहन की माँग उठाना भी बच्चों की शिक्षा के समान हक और राज्य सरकार की जवाबदेही का मसला है। सत्र के बीच में भी जब हजारों-लाखों बच्चे शिक्षकों का इंतजार कर रहे हैं तब हम यह हिसाब लगाकर संतुष्ट नहीं हो सकते कि चलो इतने शिक्षक तो हैं कि स्कूल लग रहा है। सब बच्चों के लिए उम्दा और बराबरी की शिक्षा के लिए लड़ने से ज्यादा गाइड, किताबों से परीक्षाएँ पास कराने को ही स्कूलों की जिम्मेदारी मानना खतरनाक है। जब 2009 में 6-14 साल के ही बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून संसद में पास हुआ तो उसके दायरे से 3-6 और 14-18 साल तक के बच्चे बाहर कर दिए गए। आज जब आठवीं कक्षा के बाद एक तरफ तो कानून बच्चों को शिक्षा का कोई अधिकार नहीं देकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देता है और दूसरी तरफ स्कूल के बाद की पढ़ाई के बिना अपनी पसंद की तो दूर कोई भी नौकरी मिलना नामुमकिन है, हम समझ सकते हैं कि शिक्षा की यह भेदभाव व ऊँच-नीच की व्यवस्था हमारे साथ एक धोखा है।

आइए हम सरकार से अपने बच्चों के लिए निम्न मांगे करें -

हमारे बच्चों के ळिए हमारे इलाके में ही स्कूल की व्यवस्था की जाए। 
सभी बच्चों के लिए स्कूल आने जाने के लिए मुफ्त परिवहन की सुविधा दी जाए। 
हमारे क्षेत्र के हिसाब से उचित संख्या में स्कूल खोले जाएँ। 
देश के सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था की जाए। 
देश में पड़ोस पर आधारित समान स्कूल व्यवस्था लागू की जाए।



राष्ट्रपति हो या मजदूर की संतान सबको शिक्षा एक समान

Thursday, 2 October 2014

शिक्षक डायरी : हमारे स्कूलों की बाल सभाएं

                                                                                      फ़िरोज़ अहमद



हमारे स्कूल में कई दफ़ा शनिवार को दैनिक सभा के बाद कुछ देर की बाल-सभा होती है। इसका स्वरूप पारम्परिक ही होता है - यानी कुछ छात्राएँ एक-एक करके कोई कविता, गीत आदि सुनाती हैं। मुझे नहीं पता कि अन्य स्कूलों में बाल-सभाओं का चरित्र कैसा है पर अपने स्कूल की 'मंचनवादी' सभाओं को देखते हुए ( और आयोजित करते हुए भी ) मुझे अपने बी एड के उन शिक्षक की आलोचनात्मक टिप्पणी याद आ जाती है कि मंच पर तथाकथित सांस्कृतिक प्रदर्शन करना मात्र स्कूल की सभाओं का मक़सद नहीं होना चाहिए। ( शायद वो यह कहना चाहते थे कि सभाओं का औचित्य विमर्श व संवाद को सार्वजनिक जीवन की लोकतान्त्रिक आदत बनाना है - अन्यथा तो वे कला को समाज के सरोकारों से काटकर अकादमिक-बौद्धिक संसार को ख़तरनाक रूप से अराजनैतिक बनाने का काम ही करेंगी। स्कूल की श्रेष्ठ संकल्पना में विद्यार्थी सभाओं में क़िस्से-कहानी तो सुनाएँगे ही मगर साथ ही इनका स्वरूप ऐसी बैठकों का होगा जिनमें वो स्कूली व व्यापक मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रखेंगे और स्वस्थ बहस करने की आदत डालेंगे। ) क्योंकि विद्यार्थियों की संख्या बड़ी है इसलिए ऐसी सभा के लिए उपयुक्त मौसम के अलावा माइक का सही होना भी अनिवार्य शर्त है। अधिकतर छात्राएँ जोड़ी में या तीन-चार तक के समूह में प्रस्तुति देती हैं। ( इस स्कूल में केवल छात्राएँ पढ़ती हैं। ) यह रोचक है कि अधिकतर छात्राओं की प्रस्तुति में स्कूल का प्रत्यक्ष योगदान नहीं के बराबर होता है फिर भी किताबों की कविताएँ काफ़ी लोकप्रिय मालूम पड़ती हैं। ख़ासतौर से ऐसी कविताएँ जिनके बारे में एक वर्ग में यह आलोचना व्यक्त की जाती है कि इनमें नैतिकतावादी मूल्य नहीं हैं। दूसरा बड़ा हिस्सा ( अगर पहला नहीं तो ) 'देशभक्ति/देशप्रेम' से जुड़े गीतों का होता है। स्कूलों में स्वतंत्रता व गणतंत्र दिवसों पर होने वाले आयोजनों में विद्यार्थियों की नियमित शिरकत की वजह से ऐसा होना स्वाभाविक भी है। बल्कि सच तो यह है कि चाहे राष्ट्रीय त्योहार हों या स्कूलों की आबादी के हिसाब से लोकप्रिय धार्मिक/स्थानीय/अन्य उत्सव हों, इन सभी में वयस्क कर्मचारियों से ज़्यादा उत्साह बच्चों में दिख रहा होता है। इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि हमारे स्कूलों में पढ़ने वाले मज़दूर वर्ग के बहुत से बच्चे ख़ासतौर से राष्ट्रीय त्योहारों पर अपने 'बेहतरीन' कपड़ों में स्कूल आते हैं। तीसरा नंबर धार्मिक आस्था से जुड़े गीतों का आता है। पहले मैं ऐसे सांस्कृतिक तत्वों को हतोत्साहित करता था - क्लास में शिद्द्त से और स्कूली स्तर पर कम-ज़्यादा - पर अब यह सोचकर इनसे समझौता कर लिया है कि प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की ये प्रस्तुतियाँ निश्छल होती हैं, उन्हें कम-से-कम अभिव्यक्ति के अभ्यास का मौक़ा देती हैं और अंततः स्कूलों के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को क़ायम रखने की वैधानिक ज़िम्मेदारी राज्य के कर्मचारी होने के नाते शिक्षकों की है, विद्यार्थियों की नहीं। फिर धार्मिक विश्वास के ये गीत/प्रार्थनाएँ स्कूल की दिनचर्या का औपचारिक हिस्सा नहीं हैं, केवल किसी विद्यार्थी की, किसी अवसर पर, कोई तात्कालिक प्रस्तुति हैं जिनमें हिस्सा लेना, जिन्हें सराहना किसी के लिए अनिवार्य नहीं है। ( पर क्या ऐसे मासूम कार्यक्रम दूसरों में धीरे-धीरे एक अलगाव की भावना नहीं पनपाएँगें? क्या इनसे एक ख़ास क़िस्म का माहौल नहीं बनेगा जोकि सांस्कृतिक रूप से स्कूलों की एकतरफ़ा छवि बरक़रार रखेगा? विशेषकर तब जब इन मासूम प्रस्तुतियों के ख़तरनाक पाठों पर शिक्षकों द्वारा भी स्वीकृति की एक मासूम चुप्पी बरती जाएगी। ) 
उस दिन भी जब मैंने माइक पर विद्यार्थियों को कुछ सुनाने के लिए आमंत्रित किया तो हमेशा की तरह कुछ क्षणों के प्रारम्भिक संकोच/आपसी फ़ैसले के बाद मंच पर एक लम्बी लाइन लग गई। ऐसे में अक़सर हमें लाइन में लगे अंतिम कुछ विद्यार्थियों और बाद में मंच पर आना चाह रही छात्राओं को 'अगली बार' का दिलासा देकर वापस भेजना पड़ता है। वैसे स्कूल में विद्यार्थियों की कुल संख्या के हिसाब से हम ईमानदारी से लाइन के लम्बे होने की ख़ुशफ़हमी नहीं पाल सकते - पाँच प्रतिशत विद्यार्थी ही तो मंच पर आते हैं और उनमें से भी अधिकतर चौथी-पाँचवीं के ही होते हैं। हाँ, एक चीज़ है जिसका श्रेय हम ले सकते हैं और वो यह है कि हमारी निरंतर ऐलानिया कोशिश रहती है कि वे अपनी-अपनी भाषा में कुछ प्रस्तुत करें। इसे मजबूरी को भुनाना भी कहा जा सकता है क्योंकि, जैसाकि मैंने ऊपर बताया, हमारी तरफ़ से उनको तैयार करने में कोई उल्लेखनीय योगदान वैसे भी नहीं होता है! जब चौथी कक्षा के विद्यार्थियों को आमंत्रित किया गया तो उनमें से मंच पर आई एक छात्रा ने वैष्णों देवी को सम्बोधित एक गीत सुनाया जिसमें बहन भाई पाने की प्रार्थना करती है। भजन के भाव से मैं तो विचलित हो ही रहा था पर उस दिन सुखद यह रहा कि मंच पर साथ खड़े एक साथी भी मेरे प्रतिक्रिया देने से पहले ही उस दौरान मुझसे बोले कि ऐसी चीज़ों से ही विस्फोट हो जाता है। कई कारणों से मुझे लगा कि वो धर्मनिरपेक्षता की मेरी समझ जानते हुए गीत के आस्था-विशेष से जुड़े होने की बात कर रहे थे। इस तात्कालिक अनुमान में मैं ग़लत भी हो सकता हूँ। मैंने गीत के लैंगिक विमर्श पर ही उनकी बात में बात जोड़ी और फिर गीत के ख़त्म होने पर माइक लेकर छात्रा की तारीफ़ करते हुए प्रार्थना के भाव पर एक आलोचनात्मक टिप्पणी कर दी। हमेशा की तरह मैंने महसूस किया कि ऐसे मौक़ों पर जितना सटीक मुझे बोलना चाहिए था , फ़ौरी प्रतिक्रिया देने के उतावलेपन में और कुशलता की कमी के कारण मैं अपनी बात फ़ूहड़ ढंग से ही रख पाया।   

मैंने महसूस किया कि मेरे उस छोटे-से कथन के बाद पास खड़े हुए उन्हीं साथी ने जो ताली बजाई वो सिर्फ़ उस छात्रा के गीत के लिए नहीं थी। ऐसा मुझे इसलिए भी लगा क्योंकि उसके गीत के दौरान या शायद उसके बाद उन्होंने हाल ही में राजस्थान में घटी उस घटना का ज़िक्र भी चिंतित स्वर में किया जिसके बारे में खबरों में यह बताया गया कि एक दो साल की बच्ची को दफ़नाने के बाद उसकी क़ब्र को समाधि रूपी दैवी स्थल की पहचान दे दी गई। मेरे लिए यह अप्रत्याशित इसलिए भी था क्योंकि इन्हीं साथी से मैं 'लाडली' योजना के बारे में यह सुन चुका था कि इसका उद्देश्य लड़कियों की शादी के लिए पैसे उपलब्ध कराना है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि उनके बारे में मेरे विचारों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन आ गया है बल्कि मुझे लगातार यह लग रहा है कि व्यक्तियों, वर्गों और समाजों में उथल-पुथल चल रही होती है और इस दौरान हमारे विचार-समूह कई बार असंतुलित, अव्यवस्थित होते हैं जिनसे किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव नहीं भी होता है। 
ख़ैर! मुझे माइक पर दो शब्द बोलकर ही संतोष नहीं हुआ और मैंने अपनी क्लास में पहुँचकर चर्चा आगे बढ़ाई। ( जिसेकि भाषण पिलाना भी कह सकते हैं। ) बात करने में मुझे इस बात से मदद मिली कि उस छात्रा की बहन मेरी क्लास में पढ़ती है। ( यह जानना भजन के बोलों और भाव को एक और संदर्भ दे गया कि वो तीन बहनें हैं और उनका कोई भाई नहीं है। तीसरी भी हमारे ही स्कूल की दूसरी कक्षा में पढ़ती है। ) मेरे सवालों की दिशा और निशाना भाँपते हुए मेरी क्लास की छात्रा का बचाव की भावना में कहना था कि उसकी बहन को उक्त भजन उसके मम्मी-पापा ने नहीं सिखाया है बल्कि वो उसने 'आंटी के फ़ोन' से सीखा है। अपनी क्लास से वक़्त निकालकर मैं उस छात्रा की क्लास में भी गया। इस तरह के 'बातचीत' के अवसर आने पर हमेशा की तरह मैंने सोचा था कि उक्त क्लास की शिक्षिका से अपनी चिंता ज़ाहिर करके उन्हें अपने स्तर पर इसे कक्षा व विद्यार्थी के समक्ष उठाने के लिए छोड़ दूँगा। मगर फिर हमेशा की तरह वही हुआ कि उक्त कक्षा अध्यापिका ने मुझसे ही 'समझाने' के लिए कहा और मैं भी हमेशा की तरह अपने को रोक नहीं पाया। रोचक यह था कि उन्हें मामले की जानकारी इसलिए नहीं थी क्योंकि स्वास्थ्य कारणों से वो सभा में उपस्थित नहीं रह पा रही हैं और जैसे ही उन्होंने यह सुना कि मैं उनकी कक्षा की छात्रा द्वारा सुनाए गए गीत पर कुछ बोलना चाहता हूँ तो उनको फ़ौरन यह लगा की ज़रूर यह गीत के धार्मिक विश्वास के संदर्भ में होगा! मैंने जल्दी से उन्हें बताया कि मेरी आपत्ति प्रार्थना द्वारा लैंगिक असमानता को पुनर्बलित करने को लेकर है। लेकिन इस बीच वो ( शायद मेरी छवि के कारण गीत के धार्मिक स्वभाव को लेकर ) और मैं ( अपनी उसी छवि को 'संतुलित' बनाने के चक्कर में भावना आहत न करने की हड़बड़ी में ) यह बोल चुके थे कि ऐसे गीत घर में गाए जा सकते हैं, मगर स्कूल में नहीं! स्कूल में अक़्सर ऐसे मौक़े आते हैं जब हमें गर्म लोहे पर चोट करनी होती है और हम चूक ही नहीं जाते बल्कि अपने औज़ारों को बोथरा कर देते हैं। फिर हम इन चुनौतियों से हमेशा एक क़दम पीछे चल रहे होते हैं - अगली चुनौती फिर हमें ग़ैरहाज़िर पाती है। उनकी कक्षा से भी मैं घिसे-पिटे संवाद बोलकर निकल गया। जब अपनी कक्षा में वापस आकर सवाल-जवाब का सिलसिला आगे बढ़ाया तो समय की अधिक उपलब्धता के कारण भी कुछ इत्मीनान से प्रक्रिया को अंजाम देने की स्थिति में था। 

वैसे ख़ासतौर से प्राथमिक स्कूल के विद्यार्थियों के संदर्भ में एक चिंता यह भी रहती है कि सही राजनैतिक चेतना व अभिव्यक्ति को बढ़ाने के प्रयास में हम उनके बालपन के सहज उत्साह को निष्ठुरता से कुचल न दें। शायद धार्मिक भावना के विरुद्ध बोलने के डर के अलावा सभा और उसकी कक्षा दोनों जगह आलोचना से पहले छात्रा/गीत की तारीफ़ करने का एक कारण यह भी था। साथ ही दूसरी कक्षा में जाकर उसके विद्यार्थी को उसके शिक्षक के सामने कुछ 'समझाने' में एक सत्ता के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का संकोच भी काम करता है। आख़िर कल आपकी बारी भी आ सकती है। मैंने देखा भी कि जब मैं उस छात्रा की कक्षा में अपनी बात कह रहा था तो वह सर नीचे करके बैठी थी। ( इस कारण भी कि मेरे उन तीनों बहनों के साथ दोस्ताना संबंध हैं और वो भी मेरे साथ खुलकर बोलती-चालती हैं व सहज विश्वास जताती हैं, उसकी उस 'आपराधिक' मुद्रा ने मुझे और ग्लानियुक्त दुविधा में डाल दिया। )
अपनी कक्षा में छात्राओं के साथ 'संवेदनशील' मुद्दों पर बात करते रहने की आदत के कारण और 'अपने इलाक़े' में सहज शिक्षकीय दादागीरी बरतने के अधिकार से लैस होने के एहसास की वजह से भी कक्षा में इस विषय पर विस्तार से पूछताछ करना सम्भव था। अन्य सवालों व बातचीत के बीच मैंने उनसे पूछा कि अगर कोई भजन में व्यक्त भाव के अनुसार बेटे की चाह रखे और फिर बेटी पैदा हो जाए तो उसका ( परिवार का ) रवैया क्या होगा। मैं चर्चा को लड़कियों को परिवार में उपेक्षित महसूस कराने वाले अनुभवों की ओर ले जाना चाह रहा था। एक-एक करके कई जवाब आते गए - 'मार देते हैं', 'अस्पताल में गिरा देते हैं', 'नदी में बहा/डुबो देते हैं', 'फेंक देते हैं', 'छोड़ आते हैं', 'बेच देते हैं', 'रिश्तेदार को गोद दे देते हैं' आदि। क्योंकि अर्जुन की तरह मेरा निशाना सिर्फ़ अपनी अपेक्षित, सूक्ष्म बात पर लगा हुआ था इसलिए इन जीने-मरने के मोटे उदाहरणों को मैं यह कहकर ख़ारिज करता गया कि ऐसा बहुत कम होता है। आख़िरकार मेरे कुछ और इशारा करने पर एक छात्रा ने यह कहकर मुझे संतुष्ट कर ही दिया कि अनचाही होने पर बेटी के साथ जो व्यवहार परिवार में होगा उसमें निहित उपेक्षा उसकी हिम्मत तोड़ देगी। मुझे नहीं मालूम कि जो संभावित प्रतिक्रियाएँ छात्राओं ने गिनाईं उनका स्रोत क्या था - फ़िल्में-धारावाहिक, समाचार, सरकारी प्रचार या अपने अनुभव। ये छात्राएँ 7-9 साल की हैं।

हालाँकि उनके जवाब सुनते हुए भी मैं भौंचक था पर सुकरातीय संवाद की धुन में मगन होने के कारण उस वक़्त मैं पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष की ओर बढ़ता गया। बाद में उन हैरान-परेशान कर देने वाले जवाबों को जब फिर याद किया तो परिस्थिति की गंभीरता समझ आई। इतनी कम उम्र में ही मेरी छात्राओं को अपने लैंगिक अस्तित्व से जुड़ी उन सामाजिक परिघटनाओं के बारे में बख़ूबी पता है जिनके हिंसक तत्व के सामने मेरा शिक्षण केवल सतही 'जागरूकता' तक सिमट जाता है। मुझे अपनी उन दोस्तों की याद आ गई जिन्होंने इस बात से साफ़ इंकार किया कि उनके साथ जातिगत भेदभाव हुआ है और फिर उसी साँस में ऐसे कई वाक़ये भी गिना दिए जब अड़ोसी-पड़ोसी से लेकर दोस्तों और कार्यस्थल के साथियों तक ने उनके मुँह पर अपमानजनक जातिगत टिप्पणियाँ की थीं! सच कहूँ तो मेरे लिए यह कोई नया सबक़ नहीं था बल्कि जबसे स्कूल में पढ़ा रहा हूँ तभी से यह देखता आ रहा हूँ कि पहली कक्षा में दाख़िल हुए बच्चे भी लैंगिक सामाजीकरण की एक मुकम्मल प्रक्रिया के प्रभाव से तैयार होकर ही आते हैं। हाँ, सबूतों की श्रृंखला में एक और कड़ी जुड़ गई। इन छात्राओं - लड़कियाँ कहने में एक अकादमिक/राजनैतिक संकोच होता है - के लिए उपेक्षा, तिरस्कार, परायापन आदि की दैनिक हिंसा जीवन का सामान्य हिस्सा है। सम्भवतः यहाँ भी यह विश्वास हो कि प्रत्यक्ष/प्रकट हिंसा वो है जो औरों के साथ घटती है। इसके बावजूद यह भी स्वीकारना होगा कि, शायद निजता के प्रति संभ्रांत वर्गों से अलग अनुभव-समझ रखने के कारण और कुछ हमारी कक्षा के माहौल के कारण भी, काफ़ी छात्राएँ ऐसी घटनाओं की जानकारी को साझा करती रहती हैं जिनसे पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की जा सकती है। मगर क्योंकि मैं जानता हूँ कि इनको परिवार में सहज प्यार भी मिलता है ( और लैंगिक हिंसा किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है ) इसलिए साधारण ज़िंदगी में छुपी कुरूपता को पहचानना, उसे नाम देना और फिर ललकारना एक चुनौतीपूर्ण काम लगता है। क्या सिर्फ़ यही काफ़ी नहीं था कि दुश्मन कहीं ताक़तवर, कहीं संगठित है कि अब हमें बताया जाता है कि वो अपनों में भी छुपा है? और तो और, अपने मायाजाल से एक प्रेतात्मा की तरह हमारे अंतस तक में प्रवेश करके वो हमें ही हमारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहा है!   

Thursday, 4 September 2014

Towards A More Democratic Teachers’ Day


Friends,
Like every year, 5th September 2014 will also be celebrated as Teachers’ Day in our schools. This day is celebrated not in memory of any teacher who had fought for social equality or any movement for equality of rights or in remembrance of any revolutionary turn in history. Rather it was chosen to celebrate the birth date of a person who has made no remarkable contribution to the universalisation of education. Instead dates associated with struggles of teachers like Jyotiba Phule, Pandita Ramabai, Savitribai Phule, Gijubhai Badheka, who have made exceptional contribution in education, look more appropriate for Teachers’ Day. In a system rooted in inequality, the role of education and teachers is to prepare the way for a more egalitarian and just society. This can happen when knowledge of history is embedded in an understanding of struggles. Programs based on administrative commands and formal traditions can only obtuse the intellect of teachers.
This year’s Teachers’ Day celebration shall further crystallize such formal traditions. As per the government directive, all schools are required to show Teachers’ Day address of the Prime Minister to their students between 3:00-4:45 pm. To enforce implementation of this directive officials are required to ensure that the ‘directions are being complied in letter and spirit’. It is further communicated to schools through a circular that ‘any laxity in the arrangements shall be viewed seriously’. It’s an exercise to hurt the self-respect of teachers and ‘show’ them their position in educational hierarchy.  It might be happening for the first time on Teachers’ Day that teachers have been given a present of threats wrapped in an administrative fashion. This year’s design of a centralized program takes away from schools and students freedom to celebrate or not celebrate this day in their own ways. Even if it’s seen positively by some as an interaction between the Prime Minister and students, is it not an example of dictatorial intervention in the functioning of autonomous institutions like schools?
Another piece of irony is that thousands of teaching posts are lying vacant in schools of Delhi government. In the absence of teachers some subjects were either not taught to students or teachers of other subjects were made to undertake this task. The guest teachers who were finally appointed in the last week of August were asked to complete syllabus in a short period of 20-25 days so that students can anyhow sit for first term examinations. The slogan of ‘quality education’ remains nothing but a hollow phrase in such a system. De-regularization of teachers is not a technical or financial issue but a result of neoliberal policies whereby labour power in each sector is being increasingly used at low wages on a contractual and informal basis. What kind of social values can grow in a system where teachers are ill-paid, fragmented and insecure about their jobs all the time? It would be a challenge in such a situation for teachers to inculcate an understanding and strength to build a democratic and egalitarian society among students.
Friends, we appeal to you to protest against this atmosphere of tyranny and systemic inequality and join the struggle for democratic, equitable and universal education.


’शिक्षक दिवस’ को जनतांत्रिक बनाओ!


साथियों,
हर बार की तरह इस साल भी हमारे स्कूलों में 5 सितंबर शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। यह तारीख शिक्षा में सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़े किसी स्कूली शिक्षक या बराबरी के हक के लिए लड़े गए किसी आंदोलन या किसी परिवर्तनकामी मोड़ की याद में नहीं चुनी गई है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के जन्मदिन पर चुनी गई है जिसका शिक्षा के सार्वभौमिकरण में कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं रहा है। इसके बनिस्बत शिक्षा में अतुलनीय योगदान देने के लिए ज्योतिबा फुले, पंडिता रमाबाई, सावित्रीबाई फुले, गिजुभाई बधेका जैसे शिक्षकों के संघर्षों से जुड़ी तिथियाँ शिक्षक दिवस के लिए अधिक उपयुक्त लगती हैं। गैर-बराबरी पर टिकी व्यवस्था में शिक्षा और शिक्षक का काम समता व इंसाफ की राह तैयार करना है। जाहिर है कि यह काम संघर्ष के लिए प्रेरित करने वाले इतिहास बोध से ही हो सकता है। प्रशासनिक आदेशों और औपचारिक परंपराएं निभाने वाले कार्यक्रमों से तो शिक्षकों की बौद्धिकता के कुंद होने की ही संभावना अधिक है। 
                  इस बार का शिक्षक दिवस समारोह इस औपचारिकता को और जटिल बनाएगा। सरकारी आदेश के अनुसार 5 सितम्बर को दोपहर 2ः30-4ः45 बजे के बीच हर विद्यालय में प्रधानमंत्री के भाषण का सीधा प्रसारण बच्चों को दिखाया जाना है। इस आदेश के कार्यान्वयन के लिए कहा गया है कि अधिकारी वर्ग स्कूलों में जाकर यह देखे कि आदेशों का पालन सख्ती से हो रहा है कि नहीं। जारी किए गए आदेश के अनुसार, इंतजामात में किसी भी तरह की कमी को गंभीरता से लिया जाएगा। यह शिक्षकों के आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचाकर उन्हें उनकी औकात याद दिलाने की ऐतिहासिक कवायद है। शायद ऐसा पहली दफा हुआ है कि शिक्षक दिवस के मौके पर शिक्षकों को प्रशासनिक तौर-तरीके से धमकी का तोहफा दिया गया है। इस बार के केन्द्रीकृत आयोजन ने स्कूलों और बच्चों के शिक्षक दिवस अपने-अपने ढंग से मनाने या नहीं मनाने की आजादी को भी छीन लिया है।  भले ही इसे प्रधानमंत्री के सीधे बच्चों से बातचीत के सकारात्मक रूप में भी देखा जा रहा हो, पर क्या यह स्कूल जैसी स्वायत्त संस्था में तानाशाही हस्तक्षेप का नमूना नहीं है?                                         
                 एक और विडंबना यह है कि दिल्ली सरकार के स्कूलों में हजारों शिक्षकों के पद खाली हैं। इसका मतलब है कि शिक्षकों की अनुपस्थिति में कुछ विषय या तो बच्चों को पढ़ाए ही नहीं गए या मजबूरन किसी अन्य विषय के शिक्षक द्वारा पढ़वाए गए। अगस्त के अंत में जो गेस्ट अध्यापक नियुक्त भी हुए, उन्हें 20-25 दिनों में ही पाठ्यचर्या पूरी कराने की जिम्मेदारी दी गयी ताकि बच्चे जैसे-तैसे पहले सत्र की परीक्षाएं दे सकें। ऐसे ढाँचे में ‘गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा’ का नारा महज एक खोखला मुहावरा बनकर रह जाता है। शिक्षकों का अनियमन कोई तकनीकी या वित्तीय समस्या नहीं है बल्कि यह नवउदारवादी हमले के तहत अपनाई जा रहीं नीतियों का परिणाम है। हर क्षेत्र में श्रम शक्ति का ठेकाकरण और अस्थायीकरण हो रहा है ताकि काम करने के लिए सस्ता श्रम उपलब्ध हो सके। जिस शिक्षा व्यवस्था में अध्यापक हर समय अपनी नौकरी के लिए असुरक्षित है, उस व्यवस्था में कौन से सामाजिक मूल्य पल सकते हैं? ऐसे माहौल में शिक्षकों का अपने विद्यार्थियों में लोकतान्त्रिक और समतावादी समाज बनाने की समझ और हिम्मत पैदा करना एक चुनौती है। 
            साथियों, हम आपसे अपील करते हैं कि इस गैर-बराबरी पर टिकी व्यवस्था और तानाशाही के माहौल का विरोध करें और जनतांत्रिक, समतामूलक, सार्वभौमिक शिक्षा की स्थापना के लिए मिलजुलकर संघर्ष करें। 

Monday, 25 August 2014

मेरिट की हिस्ट्री भी तो देखो

                                                                                                                          चन्द्रभान प्रसाद 
                                                                                              दलित विचारक और स्तंभकार

द्विजों की मेरिट को बिना इतिहास में जाए नहीं समझा जा सकता। सन 1857 के आसपास द्विज समाज में मेरिट का हाल शर्मनाक था। इस बात की पुष्टि 'द इंडियन यूनिवर्सिटी कमीशन 1902' की रिपोर्ट करती है। रिपोर्ट के पेज नम्बर 12 पर सन 1901 के 10वीं कक्षा के रिजल्ट की समीक्षा करते हुए लिखा गया है कि ' हमें यह बताया गया कि अगर इंग्लिश में पास मार्क्स 33 के बजाय 40 परसेंट रहे होते, तो अकेले कलकत्ता में 1400 स्टूडेंट्स और फेल हो गए होते। '
          रिपोर्ट पर गौर किया जाए, तो उसमें दो बातों की ओर इशारा होता है। इसमें पहली है 10वीं कक्षा में पास परसेंटेज पर गहरी चिंता। इस चिंता को पेज 45 पर आंकड़ों के जरिए दर्शाया गया है। सन 1901 में हाई स्कूल में कूल 21750 स्टूडेंट्स ने एग्जाम दिया था, जिनमें महज 7953 यानि लगभग 36 परसेंट स्टूडेंट पास हो सके थे। दूसरी चिंता 40 परसेंट बनाम 33 परसेंट की है। रिपोर्ट से यह साफ़ हो जाता है कि सन 1901 से पहले इंग्लिश सब्जेक्ट के मिनिमम पास मार्क्स 40 पर्सेंट थे। सन 1901 में इसे घटाकर 33 पर्सेंट कर दिया गया था। अगर इस घटना की तह में जाएँ, तो द्विज समाज के मेरिट की पोल खुल जाती है। असल में जब 1854 के मशहूर वूड्स डिस्पैच के बाद ब्रिटिश शासन ने भारत में माडर्न एजुकेशन की शुरुआत की, तो सिर्फ फर्स्ट और सेकंड दो डिवीज़न होती थी। मिनिमम मार्क्स 40 पर्सेंट होते थे। तब न तो थर्ड डिवीज़न थी और न ही 33 परसेंट में पास कर लेने की सुविधा। ये दोनों ही बातें भारतीय एजुकेशन सिस्टम में कैसे जुड़ी, इसका किस्सा बेहद दिलचस्प है। हुआ यह कि जब 1857 के आसपास मद्रास में पहला डिग्री कॉलेज बना तो एक संकट खड़ा हो गया कि पढ़ाने के लिए पर्याप्त स्टूडेंट्स ही नहीं मिल पा रहे थे। मद्रास के ब्राह्मणों ने इस समस्या का एक हल ढूँढा। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से यह मांग कर डाली कि इंटरमीडिएट पास करने  एक नै थर्ड डिवीज़न शुरू की जाए और पास मार्क्स घटाकर 33 पर्सेंट कर दिया जाएं। तब से यह सिस्टम चला आ रहा है। 
थर्ड डिवीज़न की मांग करते हुए ब्राह्मण समाज का तर्क था कि ब्रिटिश एजुकेशन सिस्टम भारत के लिए एकदम नया है, इसलिए इसे अपनाने और समझने में कुछ वक़्त लगेगा। यह समय कितना लम्बा था, इसे 'प्रोग्रेस ऑफ़ एजुकेशन इन इंडिया 1927-1932' की रिपोर्ट पार्ट-टू से समझा जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1927-1932 के दौरान मेडिकल के फाइनल एग्जाम में 47 परसेंट स्टूडेंट फेल हो जाते थे। इंजीनियरिंग में फेल होने वालों का परसेंटेज 34 था। यानि की सिर्फ साढ़े सात दशक पहले द्विज समाज की मेरिट का हाल यह था। आज रिजर्वेशन के खिलाफ झंडा लेकर घूम रहे लोगों को अपने वर्ग का इतिहास देखना चाहिए। इसके उलट दलित आंदोलन ने कभी न तो फोर्थ डिवीज़न जोड़ने की मांग की और न ही पास मार्क्स घटाकर 20 या 25 परसेंट करने की। दलित केवल प्रवेश के समय रिजर्वेशन मांगते हैं और एग्जाम उसी स्टैण्डर्ड पर देते हैं, जिस पर द्विज। बाबजूद इसके दलित स्टूडेंट्स कुछ पीछे रह जाते हैं।  इसके तमाम कारन हो सकते हैं, पर क्या 1857 के द्विजों और 2006 के दलितों के बीच तुलना नही कर लेनी चाहिए ?
सन 1857 हो या 1927-1932, सभी द्विज एजुकेशन में नहीं कूद पड़े थे। द्विजों में संपन्न तबका शिक्षा में पहले आया। बाबजूद इसके उन्हें थर्ड डिवीज़न की लड़ाई लड़नी पड़ी, फिर भी मेडिकल में लगभग आधे स्टूडेंट्स फेल हो जाते थे। अब देखिए कि क्या सन 2006 का दलित 1857  के द्विजों जितना भी साधन सम्पन्न हो पाया है ? क्या सामाजिक दुराग्रह से उसे आज तक आज़ादी मिल पायी है ? क्या भारत के एक हज़ार बड़े उद्योगों में एक भी दलित स्वामित्व में है ? क्या एक भी दलित सीईओ है ? क्या भारत के कैपिटल मार्केट में दलितों का कोई रोल है ? क्या सरकारी नौकरियों में दलित बहुमत में है ? या दलित जमींदार है ? 
कुल मिलाकर लगभग 35 लाख दलित सरकारी नौकरियों में हैं। इनमें महज 51 हज़ार ग्रुप-ए और 29 हज़ार ग्रुप-बी सर्विसेज में हैं। क्या इनकी तुलना द्विज समाज से की जा सकती है, जिनकी तादाद करोड़ों में है ? अगर दलितों और द्विजों के बीच गैरबराबरी का कोई इंडेक्स बनाया जाए, तो एक सौ के पैमाने पर यह फर्क 90 बनाम 10 का होगा। ध्यान रहे, द्विज समाज ने मॉडर्न एजुकेशन में दस्तक 1854 में ही दे दी थी, जबकि दलित समाज 1950 के बाद तब इस ओर बढ़ा, जब रिजर्वेशन और स्कॉलरशिप का सिस्टम व्यापक पैमाने पर लागू हुआ। इस जबर्दस्त गैरबराबरी के बाबजूद दलित जेनरेशन नेक्स्ट ने महज आधी सदी में तीन हज़ार साल से बनाई गयी खाई को लगभग पात दिया है। अभी घोषित सीबीएसई रिजल्ट इस बात के गबाह हैं। 12वीं में दलित स्टूडेंट्स का पास प्रतिशत 77.57 रहा, जबकि जनरल केटेगरी का 80.26 पर्सेंट, यानि सिर्फ 2.69 परसेंटेज का फर्क है। 
यह एक बड़ा सामाजिक संकेत है। नई दलित पीढ़ी आ गयी है, जो मेरिट के नारे को खोखला बनाने के लिए बेक़रार है। ध्यान रहे, यह दलितों की सिर्फ दूसरी पीढ़ी है, जिसने एजुकेशन की दुनिया में कदम रखा है। तीन दशकों के भीतर दलितों की तीसरी पीढ़ी आ चुकी होगी, जिसकी कामयाबी हैरतअंगेज होगी। इसलिए यही बेहतर होगा कि दलितों को मेरिट के नाम पर अपमानित करना बंद किया जाए। 
दलित गणतंत्र, मीडिया स्टडीज ग्रुप,दिल्ली से साभार 

Monday, 11 August 2014

पिटते बच्चे ,परेशान शिक्षक, हैरान माँ -बाप

                                                                                                          राजेश 

आज सुबह एक बच्चे की ह्रदयविदारक चीखों ने सुबह की शांति को तोड़ा। बच्चा जो कि लगभग 5 -6 वर्ष का होगा लगातार अपनी माँ से विद्यालय न जाने कि ज़िद कर रहा था और माँ थी कि उसे स्कूल भेजने कि जिद पर अड़ी हुई थी। यह बच्चा दिल्ली के एक साधारण से निजी स्कूल में पढता है , लगातार रोते हुए कह रहा था कि   मैं स्कूल नहीं जाउंगा मैडम मुझे मारती है। विद्यालयों में बच्चों को पीटा जाना कोई बहुत असाधारण घटना नही है , यह विद्यालयों में जाने अनजाने होती ही रहती है और यह भी लोगों का पूर्वाग्रह ही है कि यह केवल सरकारी स्कूलों की संस्कृति में पाया जाता है। इस पर पड़ताल करने कि जरूरत है कि लगातार अदालतों के फैसलों तथा कानूनों के बाबजूद बच्चों को सजाएँ देना क्यों बदस्तूर जारी है। शिक्षक साथियों से बातचीत में वे बच्चे को गीली मिटटी  और खुद को कुम्हार की उपमा देते हैं और बताते हैं कि जिस प्रकार कुम्हार सख्त हाथों से गीली मिटटी को सुन्दर बर्तनों में बदल देता है उसी तरह से वे शिक्षकों की भूमिका को भी देखते हैं और वर्तमान दौर में विद्यार्थियों के निम्न प्रदर्शन का कारण वे इस तरह के कानूनों को बताते हैं जिस कारण से अब वे सीखने पर ध्यान न देने वाले बच्चों पर किसी भी प्रकार की सख्ती नहीं कर पाते हैं।
शिक्षकों के एक संगठन की और से जारी कि गयी बुकलेट  शिक्षक, विद्यार्थी और ... (शारीरिक दंड पर एक रपट पुस्तिका)   के एक सर्वेक्षण के अनुसार 57 प्रतिशत शिक्षकों की राय में शिक्षण में विद्यार्थियों पर नियंत्रण आवश्यक है वहीँ अपनी कक्षा के कुछ अभिभावकों के बीच किए गए एक सर्वे में इसी सवाल के जवाब में 89 प्रतिशत अबिभावकों ने नियंत्रण को जरुरी बताया। इसी प्रकार कक्षा में विद्यार्थियों द्वारा अनुशासन भंग करने के फलस्वरूप 21 प्रतिशत शिक्षकों ने डांटकर समझाने को चुना और कक्षा में खड़ा करने को 9 प्रतिशत शिक्षकों ने चुना और सिर्फ 4 प्रतिशत शिक्षकों ने ही पीटने का चुनाव किया वहीँ अभिभावकों में से किसी ने भी पीटने को नही चुना हालांकि सबसे अधिक 83 प्रतिशत अभिभावकों ने भी डाँटकर समझाने को ही चुना। मार खाकर विद्यार्थियों की सीखने कि क्षमता और उनके व्यवहार में सुधार होता है के जवाब में 54 प्रतिशत शिक्षक इसका जवाब नहीं में देते हैं जबकि 25 प्रतिशत का जवाब कुछ हद तक है इसी सवाल के जवाब में 89 प्रतिशत माता पिता सुधार की बात से इंकार करते हैं। 66 प्रतिशत शिक्षक स्वीकार करते हैं कि शारीरिक दंड का इस्तेमाल कभी कभार और बहुत कम करते हैं , जबकि 78 प्रतिशत अभिभावकों का भी मत है कि शिक्षकों को इसका इस्तेमाल कभी कभार ही करना चाहिए। कानून द्वारा शारीरिक दंड को प्रतिबंधित करने के औचित्य को लेकर 56 प्रतिशत अभिभावक इसकी जरुरत को कुछ कुछ महसूस करते हैं जबकि 38 प्रतिशत शिक्षकों ने यही विकल्प चुना और इसके अलावा 57 प्रतिशत शिक्षक दण्डित करने या न करने का पैमाना खुद तय करना चाहते हैं।सर्वेक्षण में शामिल 40 प्रतिशत से अधिक अभिभावक अनपढ़ हैं जबकि अधिकतर शिक्षक और अभिभावकों ने एक मत से लगभग एक सामान राय ही व्यक्त किया है। अब सवाल उठता है कि बच्चों को पालने वाले माँ बाप और उनको पढ़ाने वाले शिक्षक जब एक ही तरीके से सोचते हैं तो क्यों कानून अवधारणा अलग है और यह जरुरत महसूस नही करता है कि इस तरह के अहम मसले पर उनकी भी राय को शामिल कर लिया जाए और क्या यह सरकार की जिम्मेदार नहीं बनती है कि किसी भी कानून को लागू करने से पहले उससे जुड़े हुए सभी लोगों की एक बेहतर समझदारी बनाई जाए और इसी क्रम में क्या देश भर में चल रहे शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्रों की जिम्मेदारी नही बनती है कि वो शिक्षकों को शारीरिक दंड के प्रति जागरूक करें और कक्षा को नवीन पद्धति और सृजनात्मकता के साथ बच्चों के साथ किस प्रकार काम किया जा सकता है बताए। सरकारों के लिए भी यह एक सबक हो सकती है कि केवल शिक्षा अधिकार का खोखला कानून बना देने से ही बच्चों को शिक्षा नही मिल जाएगी बल्कि यदि बच्चों को एक सम्मानजनक जीवन जीने की शिक्षा देनी है तो इस दिशा में काम किये जाने की जरुरत है।              
इन सब के अलावा एक और बात की भी पड़ताल करने की जरुरत है की वो कौन लोग और संस्थाएं हैं जो की इसके पैरवीकार हैं और वो क्या कारण हैं कि उनको इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी दिखाई नही पड़ती है उनको ये बहुपर्ती स्कूली व्यवस्था भी नही दिखती है, जहाँ खुलेआम शिक्षा बाजार में ख़रीदे बेचे जाने वाले सामान में बदली जा रही है और समाज के सबसे गरीब और उपेक्षित बच्चों के लिए सरकार ने सरकारी स्कूलों का जर्जर होता हुआ ढांचा रख छोड़ा है जहाँ स्कूल का मतलब एक सुविधा विहीन इमारत है। ऐसा नही है कि कुछ दशक पहले सुविधाएँ पूरी थी पर शिक्षा एक मानवीय क्रियाकलाप है और इसी के फलस्वरूप शिक्षक और विद्यार्थी के बीच एक सुदृढ़ मानवीय रिश्ते थे और इसी के फलस्वरूप सरकारी विद्यालयों के बच्चे भी कुछ संख्या में ही सही नौकरियों की लाइन में आ ही जाया करते थे। 
नवउदारवाद के दौर में जब विश्वबैंक ने सरकार की नीतियों को प्रभावित करना शुरू किया उसके फलस्वरूप भारत में यह जरुरी था कि जनता का जो भरोसा इन सरकारी विद्यालयों को प्राप्त है उसको नष्ट किया जाए इसके लिए उसने तरह तरह के समूहों के द्वारा शिक्षकों को नकारा साबित करने का अभियान चलवाया और इसी अभियान में से एक अभियान यह शारीरिक दंड को प्रतिबंधित करने की वकालत भी थी जिसमें यह साबित किया गया कि शिक्षक बर्बर और अमानवीय है और इस तरह के कानून से ही बच्चों को बचाया जा सकता है। इस प्रकार शिक्षक और विद्यार्थी के बीच के सहज मानवीय सम्बन्ध में एक दरार ला दी गयी है जिसका असर विद्यालयों में दिखाई भी दे जाता है और इसी का असर है कि शिक्षकों से बातचीत में वे काफी निराश दीखते हैं।  
  
अब सवाल उठता है कि क्या कारण है कि आज अदालतें एक पक्ष में हैं और अभिभावक और शिक्षक दूसरे पक्ष में। क्या कारण है कि शिक्षक अतीतजीवी होकर पिछले को ही बेहतर मान रहे हैं और नवाचारों को सिरे से ख़ारिज कर रहे हैं। इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण बात है कि किसी भी कानून को लागू करने से पहले जो सामाजिक तैयारी करने कि आवश्यकता होती है और वक्त के साथ जिन परिवर्तनों को स्वाभाविक तौर पर समाज का हिस्सा बन जाना चाहिए उनके बिना ही मूल्यों को कानून बना कर जल्दी पा लेने कि जल्दबाजी है। इस पूरी घटना पर शिक्षक रुष्ट है कि उनके अधिकार उनसे छीने जा रहे हैं चूँकि मिलाजुलाकर शिक्षा व्यवस्था में बच्चे ही उनकी पूँजी थे और अविभावक परेशान कि बिना सख्ती किए बच्चे पढ़ेंगे सीखेंगे कैसे ?