Wednesday, 28 September 2016

निगम विद्यालयों में काम करने वाले एनजीओ टीच फॉर इंडिया (TFI) की शिकायत

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Øe lañ 01/ लोशिमं/ सितम्बर / 2016                                        fnukad%19 सितम्बर,2016                                                                                                                                    

प्रति,
अध्यक्ष, शिक्षा समिति
उत्तरी दिल्ली नगर निगम,
दिल्ली
विषय : निगम विद्यालयों में काम करने वाले एनजीओ टीच फॉर इंडिया (TFI) की शिकायत I

महोदय/महोदया, 

लोक शिक्षक मंच शिक्षकों, विद्यार्थियों और शिक्षा के क्षेत्र में सोचने-विचारने/काम करने वाले कार्यकर्ताओं का एक समूह है जो कि सार्वजानिक शिक्षा व्यवस्था के मजबूतीकरण के लिए प्रतिबद्ध हैI हम लोक शिक्षक मंच की ओर से आपके समक्ष निगम स्कूलों में काम कर रहे एक एनजीओ टीच फॉर इंडिया (TFI) के बारे में कुछ शिकायतें रखना चाहते हैंI इन शिकायतों का आधार निगम में पढ़ा रहे शिक्षकों के प्रत्यक्ष अनुभव हैंI

1 ऐसा देखने में आया है कि TFI के वालंटियर्स स्कूलों में बिना निगम की अनुमति के भी हस्तक्षेप करते रहते हैंI कई बार बीते सत्र के अनुमति पत्र की बुनियाद पर ही वे अगले सत्र में भी अपनी दखलंदाज़ी जारी रखते हैंI यह बर्ताव निगम व हमारे स्कूलों की प्रतिष्ठा को धूमिल करता हैI

2 TFI की तरफ़ से स्कूलों में न केवल तयशुदा वालंटियर्स भेजे जाते हैं, बल्कि अक्सर इनके साथ कई अनाधिकृत व्यक्ति भी स्कूलों में आकर दखल देते हैं जिससे स्कूलों की व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ता हैI इस आवाजाही से स्कूलों का माहौल असुरक्षित हो जाता है तथा निगम स्कूलों की ‘चलताऊ’ छवि प्रेषित होती हैI

3 TFI के वालंटियर्स को निगम के नियमित शिक्षकों के सहायक के रूप में भेजा जाता है, जबकि अक्सर वो विद्यार्थियों व कक्षा का मनमाना फेरबदल करने तथा पूरी कक्षा का ही संचालन अपने हाथों में लेने का दबाव डालते हैं जिससे कि वे अपने दानदाताओं के समक्ष कार्यक्रम की सफलता प्रदर्शित कर सकेंI इससे एक तरफ़ प्रभावित कक्षाओं में निगम की अधिकृत पाठ्यचर्या के साथ न्याय नहीं हो पाता तो दूसरी तरफ़ नियमित शिक्षक की अस्मिता पर कुठाराघात भी होता हैI
TFI के इस स्वार्थपूर्ण हस्तक्षेप से विद्यार्थियों को अप्रशिक्षित व्यक्तियों से पढ़ना पड़ रहा (जोकि शिक्षा अधिकार कानून, 2009 का उल्लंघन है), उनका कोर्स पूरा नहीं हो रहा है और निगम के नियमित-प्रशिक्षित शिक्षकों का मनोबल भी टूट रहा हैI

हम आपसे अपील करते हैं कि

·         TFI को निगम शिक्षा विभाग से ब्लैकलिस्ट किया जाए I
·         सभी एनजीओ को निगम के स्कूलों से बाहर रखा जाए I


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लोक शिक्षक मंच                लोक शिक्षक मंच                        लोक शिक्षक मंच




प्रतिलिपि :

अध्यक्ष, नगर निगम शिक्षक संघ

अध्यक्ष, अखिल दिल्ली प्राथमिक शिक्षक संघ 

Friday, 9 September 2016

संघर्ष और निर्माण की प्रक्रिया में लगा शिक्षक

 यह अनुभव निगम विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षक ने अपने साथ पढ़ाने वाले शिक्षक साथी के बारे में साझा किया। यह अनुभव हमें कुछ समय पहले प्राप्त हुआ पर हम इसे पाठकों के साथ किन्हीं कारणों से साझा नहीं कर पाए। इस बीच व्यवस्था के साथ विरोध के कारण इन शिक्षक साथी ने मिड-डे-मील का कार्य छोड़ दिया है पर इनका संघर्ष और निर्माण लगातार जारी है। हम अपने इस प्रेरणादायक शिक्षक साथी के संघर्ष और निर्माण को अपना सलाम पेश करते हैं। 

....... संपादक

उनसे पहला परिचय तब हुआ था जब उन्होंने एक अन्य साथी शिक्षक के साथ दूसरे स्कूल में आयोजित केंद्रीकृत परीक्षा के बिगड़े स्वरूप के प्रति अपना विरोध दर्ज किया था। उन्होंने वहाँ परम्परा के तहत अधिकार पा चुकीं विकृतियों को बर्दाश्त नहीं किया और छोटे-बड़े, नए-पुराने, अपने-बाहरी व कनिष्ठ-वरिष्ठ जैसे संकोचों के सुसंकृत-शालीन दबावों को खारिज करके एक 'हंगामा' खड़ा कर दिया था। यह घटना उन दोनों शिक्षकों की नौकरी के पहले ही वर्ष में घटी थी। उनके वो साथी तो नौकरी मिलने पर अपने राज्य लौट गए और वो आज भी, उस घटना के 6 साल बादउसी स्कूल में उसी शिद्द्त से संघर्ष और निर्माण की प्रक्रिया में लगे हुए हैं। जब उनसे मित्रता बढ़ी तो उन्होंने मिलकर क्लास/स्कूल के लिए एक पुराना टी. वी. खरीदने का प्रस्ताव रखा। जब प्रशासन से कक्षा में शैक्षिक उद्देश्य से फिल्में आदि दिखाने की अनुमति की अर्ज़ी का कोई जवाब नहीं आया तो उन्होंने कक्षा में सप्ताह में एक दिन फिल्में दिखाना शुरु कर दिया। फिल्मों का चयन वो मुख्यतः CFSI के केंद्र व उनकी सूची से करते हैं। आज स्कूल की अन्य कक्षाएँ व विद्यार्थी भी उनकी इस पहलक़दमी का लाभ उठा रहे हैं। हालाँकि यह स्थिति उत्साहवर्धक नहीं है कि उनकी अर्ज़ी का जवाब नहीं आया और एक सार्वजनिक स्कूल में इस तरह के जायज़ प्रयास के लिए न तो कोई सार्वजनिक व्यवस्था है और न ही सार्वजनिक वित्त उपलब्ध कराया जाता है। यह बात भले ही महत्वपूर्ण न हो कि वो अनिवार्य रूप से स्कूल सबसे पहले पहुँचते हैं - तब भी जब वो हफ्ते में दो दिन हरियाणा में स्थित अपने पारिवारिक घर से तीन-चार घंटे का सफर करके आते हैं - मगर यह ज़रूर रेखांकित करने योग्य है कि वो जल्दी पहुँचकर अपनी कक्षा की सफाई करते हैं (झाड़ू लगाते हैं), टाट पट्टियाँ बिछाते हैं और विद्यार्थियों को खेल का सामान देते हैं। यह भी मानना होगा कि ऐसी स्थिति स्कूलों के दो पालियों में चलने और नियमानुसार भी पर्याप्त संख्या में सफाई कर्मियों के नियुक्त न होने के कारण भी उत्पन्न हुई है। यह भी दर्ज किया जाना चाहिए कि ऐसा वो स्वच्छ-भारत अभियान के पहले से, उसकी शपथ से अप्रभावित होकर भी, करते आ रहे हैं और इस देशव्यापी अभियान ने अभी स्कूलों में वो न्यूनतम संसाधन भी उपलब्ध नहीं कराए हैं जो उन्हें इस काम से मुक्त करने में सहायक हों। कक्षा की व्यवस्था करने के बाद वो एक बाल्टी में पानी भरते हैं जिसे उनके विद्यार्थी मिड-डे-मील लेने से पहले हाथ धोने के काम में लाते हैं। उनके पास मिड-डे-मील के एक हिस्से की ज़िम्मेदारी भी है और अपनी कक्षा के अलावा पूरे स्कूल के लिए उन्होंने इस संदर्भ में तरल साबुन का बंदोबस्त किया है जिसका खर्चा वो स्कूल के कोष से पूरा करते आए हैं। (हालाँकि, यहाँ भी परिस्थितिवश खीझकर पिछले कुछ समय से वो खुद ही खर्च वहन कर रहे हैं और इससे हम व्यवस्था की अहमियत के साथ-साथ ऐसे एकाकी जीवट प्रयासों की सीमा से भी परिचित होते हैं।) टिफिन नहीं लाने वाले विद्यार्थियों के लिए उन्होंने स्कूल के फंड से आई उन प्लेटों को निकलवाया जो अल्मारियों में बंद पड़ी थीं। ज़ाहिर है कि अपने इस दायित्व को निभाने में, जिसमें (लगभग 150) प्लेटों को रोज़ गिनकर निकालना, उन्हें धोने के लिए साबुन की व्यवस्था करना, सभी बच्चों (अधिकतम 1400) के लिए हाथ धोने के साबुन की व्यवस्था करना, हर कक्षा (35 कक्ष) में एक बार जाकर शिक्षकों को खाना आने की सूचना देना - ताकि वो उसे चख लें - और फिर दोबारा जाकर विद्यार्थियों को खाने के लिए बुलाने से लेकर प्लेटों को गिनकर और ढूँढकर रखना शामिल है, उनकी अपनी कक्षा का कुछ शिक्षण समय ज़ाया होता है। यह भी कोई आदर्श व्यवस्था की निशानी नहीं है। अक़्सर चार-पाँच विद्यार्थी खाने के बाद अपनी जूठी प्लेट इधर-उधर छोड़ देते हैं। ऐसे में वो उन प्लेट्स को ढूँढकर धोते हैं। कुछ साथियों ने कई बार उन्हें समझाने की कोशिश की कि वो प्लेट्स वितरित न करें बल्कि बाक़ी विद्यार्थियों पर भी दबाव डालें कि वो घर से टिफिन लेकर आएँ पर उनका कहना है कि एक तो दो-चार बच्चों की ग़ल्ती/लापरवाही के चलते पूरी व्यवस्था को ही अनुदार बनाकर सबको प्रताड़ित करना अनुचित होगा और दूसरे उन्हें लगता है कि जो बच्चे प्लेट जूठी छोड़ते भी हैं वो ऐसा किसी मजबूरी या कारणवश ही करते हैं - जैसे, प्लेट धोने की लाइन लम्बी होना, घंटी बज जाना, भूल जाना आदि। खासतौर से इस संदर्भ में जब राजसत्ता व समाज के प्रभुत्वशाली वर्ग न्याय के इन बुनियादी उसूलों को ही बेशर्मी से पलट रहे हैं कि एक के कर्म की सज़ा दूसरे को नहीं दी जा सकती, कि सामूहिक सज़ा अमानवीय है और चाहे सौ अपराधी छूट जाएँ, एक बेक़सूर को सज़ा नहीं होनी चाहिए, एक शिक्षक की इन्साफपसंदगी हौसला बनाए रखती है। मिड-डे-मील के संदर्भ में उनकी कोशिश रहती है कि सभी शिक्षक साथी उसे अपनी-अपनी कक्षा के समक्ष ग्रहण करें ताकि उसकी सम्पूर्ण जाँच भी हो जाए व भोजन के बारे में बच्चों को आश्वासन/प्रेरणा भी मिले। अगर कभी खाना कम पड़ जाता है तो वो वितरक पर दबाव बनाकर सुनिश्चित करते हैं कि रह गए बच्चों के खाने की व्यवस्था कराई जाए। हालाँकि अधिकतर होता यही है कि जो खाना बचता है - याद रखिये, 1400 बच्चों का नामांकन है - उसे वो कक्षा-कक्षा घूमकर खुद बाँटते हैं ताकि खाना बचे भी नहीं और वितरक को अगले दिन कम खाना भेजने का बहाना भी न मिले। अपने इस काम में उन्होंने कुछ गीत व नारे भी तैयार किये हैं जिन्हें वो खाना बँटवाते/बाँटते समय गा-गाकर बच्चों को आकर्षित व आनंदित करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। फिर भी इसे नज़रंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए कि इस ज़िम्मेदारी के बोझ में वो खुद भी महसूस करते हैं कि कभी-कभार उन्हें किसी बच्चे पर अनावश्यक ग़ुस्सा भी आ जाता है। तब उन्हें लगता है कि उन्हें इस चुनौतीपूर्ण व बेमेल व्यवस्था में इस असम्भव दायित्व को उठाने की ज़िम्मेदारी छोड़ देनी चाहिए क्योंकि यह (सेहत के अलावा, अतिरिक्त भागदौड़ के चलते जिसमें आ रही गिरावट के बारे में उन्हें यक़ीन है) उनकी इंसानियत को भी क्षति पहुँचा रहा है। इस मायने में उनके उदाहरण को किसी अनुकरणीय मिसाल की तरह नहीं बल्कि चुनौतीपूर्ण व विषम परिस्थितियों के बयान के रूप में लिया जाना चाहिए। 
वो अक्सर अखबारों में आई शिक्षा से जुड़ी (व अन्य) खबरों की कतरनें काटकर साथियों से साझा करते हैं। मुझे तो क़रीब-क़रीब रोज़ ही कई कतरनें पकड़ा देते हैं जिन्हें मैं गृहकार्य मानने लगा हूँ! यह महत्वपूर्ण है कि उनके द्वारा थमाई गई अधिकतर कतरनें या तो शिक्षा पर हो रहे निजीकरण-व्यावसायीकरण के नीतिगत हमलों के बारे में होती हैं या फिर शिक्षक संगठनों व समाज के अन्य वर्गों द्वारा सार्वजनिक व्यवस्था के पक्ष में हो रहे संघर्षों की। अक्सर इन खबरों में उनके राज्यहरियाणा, के स्कूल शिक्षकों के सांगठनिक संघर्षों के जो उदाहरण होते हैं उन्हें वो कम-से-कम दिल्ली की तुलना में एक बेहतर मिसाल मानते हैं। 
चूँकि शिक्षक एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी है इसलिए उसका अपने विद्यार्थियों से रिश्ता स्कूल के काल और प्रांगण तक ही सीमित नहीं है, इस समझ को उनके उन प्रयासों में प्रकट होते देखा जा सकता है जो वे व्यवस्था की अन्य इकाइयों के साथ पत्र-व्यवहार के माध्यम से भी करते रहते हैं। इनमें, उदाहरण के लिएपाठ्यपुस्तक ब्यूरो को किताबों में ग़लत जानकारी व खराब छपाई को लेकर शिकायत करना तथा सड़क पर स्पीड-ब्रेकर के न होने और बसों में विद्यार्थियों - जोकि उनके स्कूल के नहीं हैं - को नहीं चढ़ने देने से होने वाली परेशानियों के संबंध में कार्रवाई की माँग करना भी शामिलरहा है। यह उनकी निरंतर पैनी होती राजनैतिक चेतना को दर्शाता है कि वो सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के स्कूल आने-जाने में परिवहन की समस्या को एक तरफ शिक्षा-अधिकार से जोड़कर देखते हैं और दूसरी तरफ निजी स्कूलों को सार्वजनिक परिवहन की बसें मुहैया कराने की ग़लत नीति के प्रकाश में। इसी कड़ी में उन्होंने लगातार पत्र-व्यवहार करके न सिर्फ मिड-डे-मील के मानकों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश की है, बल्कि खाना बाँटने वाली कर्मियों के मेहनताने से जुड़ी जानकारी प्राप्त करके उनके पक्ष में दबाव बनाने की कोशिश भी की है। इसी चेतना के परिणामस्वरूप वो सेमीनार में या अन्य स्कूलों में जाने पर वहाँ भी सार्वजनिक व्यवस्था के हितों के विरुद्ध काम कर रहे पूर्वाग्रहों, NGOs, निजी संस्थाओं आदि के संबंध में बात रखते हैं, सामग्री साझा करते हैं और लिखते हैं।     
उनके कक्षाई शिक्षण के बारे में कुछ भी कहना इसलिए भी अनुचित होगा क्योंकि उसका कोई प्रत्यक्ष सबूत या मापदंड प्रस्तुत करने की स्थिति नहीं है, मगर विद्यार्थियों के साथ उनके रिश्तों में स्नेह, संवेदनशीलता व प्रतिबद्धता लगातार बढ़ती गई है। अनुभव के साथ समाज के शोषित, मेहनतकश व हाशिये पर धकेल दिए गए वर्गों से आने वाले बच्चों के प्रति उनकी संवेदनशीलता गहरी होती गई है और इसका एक उदाहरण उनकी कक्षा में उन बच्चों की सहज उपस्थिति व भागीदारी है जिन्हें CWSN के रूप में चिन्हित किया जाता है। उनके विद्यार्थियों को यह भरोसा है कि वो 'सर' के साथ मज़ाक ही नहीं कर सकते बल्कि उन्हें छेड़ भी सकते हैं और उनसे उनकी शिकायत भी कर सकते हैं। शायद यही कारण है कि जब छुट्टी के बाद वो कक्षा छोड़ते हैं और सामान समेटते हैं तो कुछ विद्यार्थी स्वयं भी रुककर उनका साथ देते हैं, उनके साथ चलते हैं । ऐसे में जबकि ग़ुज़रते वक़्त के साथ एक तरफ बच्चों के साथ उनका जुड़ाव और प्रगाढ़ होता गया है, उनके व्यवहार में बच्चों के प्रति कोमलता बढ़ती गई है और दूसरी तरफ राज्य व व्यवस्था के चरित्र को लेकर उनका विश्वास कम होता गया है व सवाल बढ़ते गए हैं, हमें भी यह सोचना चाहिए कि क्या इन दोनों बदलावों के बीच कोई सहज-सीधा संबंध तो नहीं है।    


Sunday, 28 August 2016

शिक्षक डायरी: हमारे स्कूलों के पास फ़ंड क्यों नहीं है?

विद्यालय की निजता को ध्यान में रखते हुए, इस आपबीती लिखने वाले शिक्षक साथी के नाम को नहीं दिया जा रहा है.......       संपादक 

मैं निगम के जिस स्कूल में पढ़ाता हूँ पिछले कुछ दिनों के उसके एक घटनाक्रम को साझा करना चाहता हूँ। पिछले कई वर्षों का अनुभव है कि, चाहे वो किसी भी दल के रहे हों, हमारे स्कूल में निगम पार्षद कभी भी विद्यार्थियों या शिक्षकों की ख़ैर-ख़बर लेने नहीं आते हैं। हाँ, किसी बड़े समारोह में ईद के चाँद की तरह कभी-कभार दर्शन दे देते हैं। वैसे यह तथ्य भी शायद अन्य साथियों से छुपा नहीं होगा कि जब हमारे जन-प्रतिनिधि (या अधिकारी-गण भी) हमारे स्कूलों में, अपने लाव-लश्कर के साथ तशरीफ़ लाते हैं तो तन-मन-धन के साथ स्कूल उनकी सेवा में लग जाता है। तन बच्चों की मेहनत का भी हो सकता है, मन शायद ही किसी का होता हो और धन पर मैं कुछ नहीं कह सकता कि वो कहाँ से आता है और कहाँ को जाता है। तो ऐसे ही किसी मौक़े पर जब निगम पार्षद के समक्ष स्कूल की एक-आध समस्या रखी गई - जिसमें कर्मचारी की कमी के कारण सफ़ाई व्यवस्था मुख्य थी - तो उन्होंने बड़ी-ही उत्साहित करने वाली सलाह दी कि अन्य सभी समस्याओं का भी ब्यौरा बनाकर उन्हें लिखित में दे दिया जाये। ज़ाहिर है कि समस्याओं की एक लंबी सूची तैयार करके बहुत उम्मीद के साथ उनको पेश कर दी गई। हालाँकि परिणाम वही ढाक के तीन पात रहा लेकिन इसके कुछ समय बाद विभाग से निरीक्षण का एक सबक़ ज़रूर प्राप्त हुआ। वैसे इतने सालों में स्कूल में अकादमिक निरीक्षण का अनुभव एक-दो बार ही हुआ है। इस बार दफ़्तर से जो अधिकारी निरीक्षण के बहाने आये थे उन्होंने सभी शिक्षकों को दफ़्तर में बुलाया और बताया कि पार्षद महोदय की ओर से विभाग को स्कूल की शिकायत मिली है जिसे उन्होंने, अगले साल आ रहे चुनावों के मद्देनज़र, व्यक्तिगत रूप से अपने ख़िलाफ़ विभाग की ग़लत मंशा के रूप में लिया है। बीते समय में ख़ुद शिक्षक रहे होने का उदाहरण-सहित हवाला देते हुए उक्त अधिकारी ने स्टाफ़ को नेक सलाह दी कि क्योंकि विभाग के पास वैसे भी फ़ंड नहीं है तो सभी शिक्षक अपनी-अपनी जेब से 50-100 रुपये देकर दो दिन के अंदर वॉटर-कूलर ठीक करा लें। 

(यह समझना मुश्किल है कि वॉटर कूलर को ही क्यों चुना गया जबकि एक तो वो समस्याओं की सूची में बहुत नीचे थे और दूसरे न तो वो आजतक चले हैं और न ही ठीक होने पर दो वॉटर कूलरों से दोनों पालियों के लगभग 2500 विद्यार्थियों का कोई भला होने वाला है। एक साथी ने याद दिलाया कि कुछ साल पहले ये वॉटर कूलर किसी निजी संस्था (NGO) से उपलब्ध कराये गए थे। उसके बाद से न तो उक्त संस्था ने रखरखाव की कोई ज़िम्मेदारी निभाई है और लगता है कि विभाग की तरफ़ से भी उसपर कोई दबाव नहीं डाला गया है। वैसे भी RO व कूलर जैसी 'विकासवादी' मशीनें न सिर्फ़ आपराधिक मात्रा में बिजली-पानी बर्बाद करती हैं, बल्कि सार्वजनिक जल सप्लाई के प्रति समाज में एक ग़लत सन्देश प्रेषित करके उसके मानकों पर सन्देह पैदा करती हैं व इन मानकों को उच्च-स्तर पर लागू रखने का जन-दबाव कम करती हैं। हाँ, इनसे पानी का निजीकरण ज़रूर होता है, विलासी व मेहनतकश वर्गों के बीच में पीने वाले पानी तक को लेकर बेहूदा खाई और गहरी होती है तथा इन मशीनों की कम्पनियों का बाज़ार फलता-फूलता है। अव्वल तो शैक्षिक संस्थानों सहित किसी भी सरकारी स्थल पर इन मशीनों को लगाने की इजाज़त ही नहीं होनी चाहिए। हमारे स्कूल में इनसे सिर्फ़ जगह घिरी है और आये दिन पानी के अनियंत्रित बहाव व सफ़ाई की समस्या ही पैदा हुई है। निःसन्देह स्कूल के लिए तो ये सफ़ेद हाथी साबित हुए हैं।)
 
इसके साथ ही प्रधानाचार्या से यह लिखित आश्वासन लिया गया कि वो दो दिन के अंदर स्कूल की सभी समस्याओं का समाधान कर देंगी। कुछ शिक्षकों ने ज़रूर यह कहकर आपत्ति व्यक्त की कि यह विभाग की ज़िम्मेदारी है और इससे आगे के लिए एक ग़लत परंपरा का निर्माण होने का ख़तरा है मगर शायद प्रधानाचार्या की नाज़ुक स्थिति और शराफ़त को देखते हुए विरोध तीखा स्वर नहीं ले पाया। इस तरह के व्यवहार में निश्चित ही हमारे व्यक्तिगत दब्बूपने और रीढ़विहीन होने के अलावा शिक्षक संघ व उसके प्रतिनिधियों में हमारा अविश्वास भी झलकता है। यह अपने-आप में बच्चों, समाज और पाठ्यचर्या में नैतिकता की कमी का रोना रोने की हमारी समझ पर भी सवाल खड़े करता है। आख़िर बिना साहस के नैतिक कैसे हुआ जा सकता है? और जब हम ख़ुद ही, संख्याबल, शिक्षा व संगठन की ताक़त से लैस होने के बावजूद, नैतिक साहस प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं तो यह उम्मीद किस तरह कर सकते हैं कि हमारे हाथों से बच्चे नैतिकता का पाठ ग्रहण कर लेंगे? शायद नैतिकता से हमारा मतलब भीड़ के साथ चलना और ताक़तवर के प्रति समझौतावाद व समर्पण की भावना का विकास करना ही हो। वर्ना, ऐकला चलो के साहस व विवेक के बिना नैतिकता का नहीं, सिर्फ़ भेड़चाल व परंपरा के प्रति नतमस्तक होने का ही निर्वाह किया जा सकता है। ख़ैर, यह एक अलग मुद्दा है।
 
आपस में ज़रूर लगभग सभी शिक्षकों ने इस प्रस्ताव से अपनी सैद्धान्तिक असहमति व शिकायत जताई लेकिन उक्त अधिकारी की तरह ही हममें से कई लोगों ने ख़ुद को यह कहकर मना लिया कि ये पैसा तो बच्चों के भले के लिए ही इस्तेमाल होगा। यह विरोधाभास भी हममें से कइयों के दिमाग़ में उपजा होगा कि हम जो शिक्षण करते हैं वो भी बच्चों के भले के लिए होता है और उनके भले के लिए ही सार्वजनिक कोष से एक पूरा-का-पूरा अमला खड़ा किया गया हैं। अधिकारी की तरफ़ से यह चिर-परिचित तर्क भी दिया गया कि जब हम शिक्षक इतने-उतने हज़ार कमा रहे हैं तो फिर इस तरह के योगदान में कोई समस्या नहीं है। एक साथी ने इसका एक निजी जवाब भी इसी चिर-परिचित अंदाज़ में दिया कि अधिकारी तो हमसे भी ज़्यादा कमा रहे हैं तो फिर वो ही इस तरह के ख़र्चे क्यों नहीं वहन कर लेते। यह तर्क वैसे भी बेहूदा और सामंती है कि हम शिक्षकों को अपने विद्यार्थियों पर अपनी निजी कमाई ख़र्च करके अपनी भलमनसाहत सिद्ध करनी होगी। एक तो यह सोच विद्यार्थियों को राज्य के साधिकार, सम्मानित नागरिक मानने के बजाय उन्हें भलाई की भावना के सुपुर्द करके बेसहारा घोषित करती है, वहीं इसमें शिक्षकों की पेशागत भूमिका का भी अपमान है। पेशागत फ़र्ज़ व क़ानूनी ज़िम्मेदारी को ताक पर रखकर दान-पुण्य की बात करने का अर्थ है सार्वजनिक व्यवस्था को मजबूर, नाकाम व अविश्वसनीय बनाने की कोशिश करना। ताज्जुब है कि जो काम संवैधानिक ज़िम्मेदारी के तहत विभाग को करना है उसे कर्मचारियों की भलाई की भावना के सर मढ़ा जा रहा है। यह उदाहरण है कि नव-उदारवाद के तहत कैसे समाज में व्याप्त सामंती मूल्यों का 'नैतिक' सहारा लेकर विद्यार्थियों को राज्य द्वारा उनके इंसानी व तालीमी हुक़ूक़ बाइज़्ज़त उपलब्ध कराने के बजाय उन्हें दया के पात्र बनाकर कमज़ोर करने की कोशिश की जाती है। फिर आपस में यह बात भी उठी कि हममें से कई साथी न सिर्फ़ अपने शिक्षण के लिए बल्कि अपने विद्यार्थियों के प्रति एक स्नेह के नाते भी अपनी जेब से कुछ-न-कुछ ख़र्च करते रहते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वो ख़र्च स्वैच्छिक होता है और इसलिए स्वतन्त्रता का आभास देता है। उसमें हम ख़ुशी महसूस करते हैं और उसमें विद्यार्थियों के प्रति प्रेम की बराबरी व एक जीवंत रिश्ते का भाव होता है, सम्बंधों की ऊँच-नीच वाली विषमता का नहीं। (इस जबरिया दान से उपजी खीझ ने शायद यह समझ भी पैदा की हो कि कोई नारा या कर्म किसी की नज़र में कितना ही पावन या श्रेष्ठ क्यों न हो, दबाव व डर की ज़बरदस्ती न सिर्फ़ उसका नैतिक तत्व छीन लेती है बल्कि लोगों में उसके प्रति एक चिढ़ व विकर्षण भी पैदा करती है।)
 
कुछ दिनों तक तो इस दिशा में किसी प्रकार का पैसा इकट्ठा नहीं किया गया लेकिन प्रधानाचार्या को इस बाबत विभागीय दफ़्तर से लगातार फ़ोन आते रहे। आखिर एक दिन एक विद्यार्थी के हाथ एक काग़ज़ सभी कक्षाओं में घुमाया गया जिसपर वॉटर कूलर ठीक कराने के लिए शिक्षकों से 100 रुपये का सहयोग देने की अपील की गई थी और साथ में यह आश्वासन भी दिया गया था कि फ़ंड आने पर पैसे वापस कर दिए जायेंगे। जब काग़ज़ मेरे पास पहुँचा तो उसपर एक-दो कक्षाओं के शिक्षकों को छोड़कर - जो शायद उस दिन अनुपस्थित रहे हों - सभी क्लासों के शिक्षकों के योगदान के हस्ताक्षर दर्ज थे। मैंने भी भेड़चाल चली। मुझे नहीं पता कि फ़ंड कब आएगा और कैसे उसमें से हमारा भुगतान किया जायेगा। अनुभव बताता है कि अगर फ़ंड आएगा तो हमारा उधार चुकाने के लिए निश्चित ही कुछ फ़र्ज़ी बिल बनाने पड़ेंगे। अगर फ़ंड नहीं आएगा तो फिर उन तौर-तरीक़ों का ही सहारा बचता है जिन्हें स्कूल में 'ग़दर' फ़ंड का नाम देकर विद्रोह के उदात उद्देश्यों, कर्मों और भावना का मज़ाक उड़ाया जाता है। मेरे दिमाग़ में भी एक बार के लिए यह विचार आया कि अगर पैसा वापस नहीं होता है तो स्कूल द्वारा सत्र के अंत/आरंभ में विद्यार्थियों से पुस्तकें वापस लेकर उन्हें कबाड़ का काम करने वाले को बेचने की जो एक मजबूरी-भरी परंपरा है, अपनी कक्षा के स्तर पर उसे इस्तेमाल करके मैं अपनी भरपाई तो कर ही सकता हूँ। दोबारा इस विषय में सोचने पर शर्म भी आई और यह भी समझ आया कि अगर 'ऊपर' से इस तरह की दबंगई उगाही की जाती है तो 'नीचे' के अदना-से लोगों की नैतिक शक्ति भी क्षणभर में काफ़ूर हो सकती है।
 
अपने स्कूल के बारे में मैं यह भी जानता हूँ कि फ़ंड की कमी के चलते स्कूल के/की प्रमुख अपनी जेब से ख़र्चा करते/करती रहे/रही हैं। इस बारे में मैं ठीक से नहीं कह सकता कि ऐसे में उन्हें कब और कितना ख़र्चा नियमानुसार वापस मिलता रहा है। फ़ंड की ख़स्ताहाली का ताज़ा और वीभत्स उदाहरण तो यह भी है कि पिछले हफ़्ते स्कूल में चॉक तक नहीं थी और वो भी एक-दो दिन पहले प्रधानाचार्या ने अपनी जेब से मंगाई है। इसके अतिरिक्त हममें से कुछ शिक्षक तो पहले-से ही अपने लिए डस्ट-फ़्री चॉक ख़रीदते रहे हैं क्योंकि शायद फ़ंड की कमी के चलते जो चॉक आती भी है वो लेखन के लिए ख़राब और सेहत के लिए ख़तरनाक होती है। शिक्षा के लिए फ़ंड की यह स्थिति दिल्ली में है। बाक़ी हम सोच सकते हैं। वैसे, ज़रूरी नहीं कि सभी राज्यों में स्थिति ख़राब ही हो। कहने वाले कहते रहे हैं कि यह देश रामभरोसे चल रहा है। मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया था कि इसमें स्कूल भी शामिल हैं। या शायद यह कहना ठीक होगा कि यह स्कूलों को रामभरोसे छोड़कर जनता की नज़रों में उन्हें नाकाम सिद्ध करने की, शिक्षकों का मनोबल तोड़ने की और अंततः स्कूलों को निजी हाथों में सौंप कर इस प्रक्रिया को अंजाम पर पहुँचाने की योजना है। जिसका कोई नहीं ख़ुदा उसका हो या न हो, लेकिन अगर उसके लिए नियमित व मज़बूत सार्वजनिक व्यवस्था नहीं की गई तो वो जल्दी-ही ख़ुदा को ज़रूर प्यारा हो जायेगा। अगर यूँ ही चलता रहा तो हमारे स्कूलों का भी यही हश्र होगा।
 
इस पूरे घटनाक्रम ने स्टाफ़ को झकझोर दिया है। फिलहाल स्टाफ़ में इन निष्कर्षों पर आम सहमति बनी दिखती है कि अब स्कूल की किसी भी समस्या के समाधान या सहायता के लिए किसी जनप्रतिनिधि से (जिनके लिए प्रचलित मगर भ्रामक शब्द 'राजनेता' ही इस्तेमाल किया गया) संपर्क न किया जाये और न ही उन्हें स्कूलों के किसी कार्यक्रम में अपनी तरफ़ से आमन्त्रित किया जाये।  

आजकल जब कभी बैंक जाता हूँ तो विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों की भीड़ देखकर उनपर भी अफ़सोस होता है और बैंक कर्मचारियों पर भी। स्कूलों पर अलग दबाव है कि सभी विद्यार्थियों के 'आधार-युक्त' खाते खुलवाए जायें। सभी बेहाल हैं। सरकारों की ओर से यह ढिंढोरा पीटना जारी है कि इससे भ्रष्टाचार में कमी आएगी क्योंकि एक तो विद्यार्थी व उनके अभिभावक धोखा देकर एक से ज़्यादा जगह से लाभ हासिल कर लेते हैं और दूसरे हम शिक्षक बीच में आकर उनका हक़ मार लेते हैं। अब DBT अपनाये जाने के बाद से तो सरकारी पैसे की इस लूट में काफ़ी कमी आई होगी। पिछले कई वर्षों से शिक्षा के नाम पर उपकर भी लागू है। इस महाशक्ति का जीडीपी तो वैसे भी उछाल पर रहता है। नियमित नियुक्तियाँ हो नहीं रही हैं। इतना सब होने पर भी हमारे स्कूलों के पास फ़ंड क्यों नहीं है? 

Monday, 8 August 2016

शिक्षा और शिक्षकों का अपमान करने वाली नई शिक्षा नीति के प्रारूप का विरोध करो!


 साथियों,
अपने स्कूलों में हो रहे बदलावों पर हम लगातार अपनी सहमति-असहमति व्यक्त करते रहे हैंI इनमें पाठ्यचर्या को हल्का करना, बच्चों का टेस्ट लेकर उन्हें अलग-अलग समूहों में बाँटना, केंद्र सरकार के निर्देशानुसार राष्ट्रीय कौशल अहर्ता फ्रेमवर्क (NSQF) के तहत अब निचली कक्षाओं से ही रिटेल, टूरिज्म, सिक्यूरिटी जैसे वोकेशनल कोर्स पढ़ाया जाना, शिक्षकों की जवाबदेही बढ़ाने के लिए CCTV, बायोमेट्रिक हाज़िरी और बच्चों के परिणामों को इस्तेमाल करना और  आधार कार्ड को स्कूलों में प्रत्येक चीज़ के लिए अनिवार्य किया जाना शामिल हैI इन प्रस्तावों को लागू करने में केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार की तत्परता और गति हम लोग भुगत ही रहे हैं| इसी सन्दर्भ में केंद्र सरकार की नयी शिक्षा नीति 2016ऐसे अनेक प्रस्तावों को और बढ़ावा देने जा रही है|
इस पर्चे के माध्यम से हम नयी शिक्षा नीति 2016 के ड्राफ्ट में दिए गए प्रस्तावों से जुड़े कुछ सवाल साझा कर रहे हैंI इसके प्रारूप को मानव संसाधन विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर देखा जा सकता है और आप इसपर अपनी ऑनलाइन या लिखित प्रतिक्रिया 15 अगस्त तक भेज सकते हैंI हम इस पर्चे में नीति के वभिन्न आयामों को पाठकों के लिए शब्दश: लिख रहे हैं और साथ ही अपनी आपत्ति भी व्यक्त कर रहे हैं|

वोकेशनल कोर्सों पर ज़ोर या बाज़ार के लिए सस्ता श्रम तैयार करने की कवायद

शिक्षा और प्रशिक्षण के माध्यम से हमारे देश का युवा कौशल और ज्ञान से सुसज्जित हो ताकि वह देश के कार्यबल में शामिल हो सके| हमारी शिक्षा व्यवस्था से निकलने वाले अधिकांश लोगों में रोजगार योग्य कौशलों का अभाव पाया जाता है| बहुत से ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट विद्यार्थी अपने-अपने कार्य क्षेत्रों में रोज़गार प्राप्त नहीं कर पाते| (NEP प्रारूप, अध्याय 2)

वोकेशनल व कौशल-विकास पर इतना ज़ोर दिया गया है और शिक्षा के वृहद, बौद्धिक व अकादमिक आयामों पर इतना कम कहा गया है कि इसे 'शिक्षा नीति' का दस्तावेज़ मानना ही मुश्किल है। समानता के प्रति भी कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई गई है जिसके चलते असमानता व भेदभाव पर आधारित तरह-तरह के  निजी व सरकारी स्कूलों वाली वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में इस बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि ये कोर्स, जैसा कि नीति का दस्तावेज़ कहता है, 'सभी के लिए' होंगे। उदाहरण के लिए, यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या निजी स्कूलों में भी इन कोर्सों को समान रूप से लागू किया जायेगा। अगर नहीं, तो फिर तो यह स्कूलों/शिक्षा द्वारा समाज में व्याप्त ग़ैर-बराबरी को बनाये रखने का ही तरीक़ा होगा। फिर हम विद्यार्थियों और ख़ुद को कैसे समझायेंगे कि शिक्षा वर्ग आदि से निरपेक्ष होती है? मेहनतकश वर्गों के बच्चे तो वैसे भी कम उम्र से काम-धंधों में लग जाते रहे हैंI तो यह कहने से क्या हासिल होगा कि इन बच्चों का स्तर कमज़ोर है इसलिए इन्हें मौलिक कौशल पढ़ाने होंगे अथवा इन बच्चों को निचली कक्षा से ही aptitude (अभिरुचि) टेस्ट के आधार पर बांटकर काम-धंधे के कौशल देने होंगे? फिर इसके लिए वैसे भी स्कूलों की क्या ज़रूरत रह जाती है? 'अभिरुचि' टेस्ट लेकर बच्चों की क्षमता पहचानने की जो बात की गई है वो मनोविज्ञान व शिक्षाशास्त्र की इस समझ के विपरीत है कि इन टेस्ट का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है और इनके आधार पर, ख़ासतौर से वंचित तबकों के बच्चों को चिन्हित करके वोकेशनल कोर्सों में धकेलना अनैतिक भी है। 
2016 की इस नीति में ‘बेरोज़गारी का डर’ निहित दिखता है| इस डर का आधार यह सच्चाई है कि आज भारत में रोज़गार का वृद्धि दर नेगेटिव है| जिस तेज़ी से लोग नौकरियों के लिए बाज़ार में उतर रहे हैं, उस तेज़ी से नौकरियां नहीं बढ़ रहीं| एक तरफ नौकरियाँ नहीं हैं, छोटे स्व-नियोजित व्यवसाय संकट में हैं और दूसरी तरफ यह कहा जा रहा है कि लोग इसलिए बेरोजगार हैं क्योंकि उनके पास कौशल नहीं हैं| इस झूठ का पर्दाफाश इस बात से हो जाता है कि आज प्रत्येक काम में skilling का नहीं deskilling का दौर है| ऐसी मोबाइल ओर कंप्यूटर तकनीकें आ रही हैं जिनके आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि शिक्षक को सोचने या कुशल होने की ज़रूरत नहीं है| उसे बस निर्देशों का पालन करना है| ठीक वैसे ही जैसे दर्ज़ियों को ख़त्म करके मशीन चलाने वाले मज़दूरों से कपड़ा उत्पादन हो रहा है| जब समाज में हाथ के काम की कीमत नहीं है तो कल वोकेशनल कोर्स करके जाने वाले बच्चों की कीमत कैसे हो जाएगी?  

जवाबदेही के बहाने शिक्षकों को नियंत्रित करने की कोशिश

शिक्षा की खराब गुणवत्ता एक बड़ी चिंता का विषय है जिससे असंतोषजनक ज्ञानार्जन परिणाम सामने आते हैं| विद्यालयी शिक्षा की असंतोषजनक गुणवत्ता के लिए बहुत से कारक ज़िम्मेदार हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं: ऐसे विद्यालयों का बडी संख्या में मौजूद होना जो विद्यालयों के लिए निर्धारित मानकों और मानदंडों पर खरे नहीं उतरते; विद्यार्थियों और अध्यापकों की अनुपस्थिति, अध्यापकों के अभिप्रेरणा स्तर और प्रशिक्षण में गंभीर अभाव जिसके पररणामस्वरूप अध्यापक की गुणवतता और प्रदर्शन में कमी आना| (अध्याय 2) शिक्षकों में अनुशासनहीनताI (अध्याय 4)

यह पहला राष्ट्रीय स्तर का दस्तावेज़ है जिसमें शिक्षकों के लिए इतनी हतोत्साहित करने वाली भाषा का इस्तेमाल किया गया है। अपने विद्यार्थियों के सीखने के संदर्भ में हम शिक्षक न सिर्फ अपनी भूमिका का महत्व अच्छी तरह जानते हैं बल्कि शिक्षकों का विद्यार्थियों व समाज के साथ एक ऐतिहासिक जीवंत रिश्ता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के 'गिरते स्तर' पर कॉरपोरेट दुष्प्रचार व NGO द्वारा लगातार निकाली जा रही रपटों को आधार बनाकर जो माहौल बनाया जा रहा है उसके केंद्र में बच्चों के प्रति चिंता नहीं है, बल्कि उसका असल निशाना सार्वजनिक स्कूल व्यवस्था व उसके शिक्षकों को नाकारा सिद्ध करके शिक्षा के बाज़ार का विस्तार करना है। शिक्षा व स्कूलों को महज़ परीक्षा परिणामों के उद्देश्य तक सीमित कर देना ही ख़तरनाक है। यह तर्क देना मक्कारी है कि परिणामों के लिए शिक्षक एकाकी रूप से ज़िम्मेदार हैं, जबकि बच्चों के सीखने और परिणामों पर उनकी आर्थिक-सामाजिक व स्कूलों की परिस्थितियाँ भी प्रभाव डालती है - और इन दोनों की ही ज़िम्मेदारी राज्य पर है। साथ ही पाठ्यचर्या का स्वरूप - जैसे भाषा, विषयवस्तु, संस्कृति आदि - कुछ पृष्ठभूमियों से आने वाले बच्चों के लिए अजनबी, यहाँ तक कि पराया तक हो सकता है, जोकि उनके 'सीखने' को बाधित करता है।
विद्यार्थियों के परिणामों के संदर्भ में शिक्षकों पर ग़ैर-शैक्षणिक कामों के बोझ के प्रति चिंता जताई गई है लेकिन शिक्षकों को इनसे मुक्त रखने के लिए कोई प्रतिबद्धता दर्ज नहीं की गई है। आज हम स्कूलों में देख रहे हैं कि शिक्षा अधिकार क़ानून द्वारा शिक्षकों को अन्य दायित्वों से मुक्त रखने का वादा भी एक धोखा सिद्ध हुआ है। पिछले कुछ समय से नित नयी योजनाओं, आदेशों और ई-गवर्नेन्स के दबाव के चलते शिक्षकों पर ऐसे कामों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है जो हमारी ऊर्जा का अपव्यय और पढ़ाने से बाधित करते हैं। शिक्षकों को अनुशासनहीन, अनुपस्थित आदि क़रार देकर उन्हें परिणामों के कमतर स्तरों के लिए ज़िम्मेदार ठहराना और उनपर निगरानी रखने के लिए बायोमैट्रिक हाज़िरी व मोबाइल फ़ोन आदि के तकनीकी उपाय करने तथा SMC को अधिकार देने के प्रस्ताव शिक्षकों के प्रति अपमानजनक लांछन पर आधारित हैं। स्कूल प्रबंधन समिति (SMC) को सामुदायिक जुड़ाव या लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तौर पर नहीं बल्कि शिक्षकों को नियंत्रित करने के औज़ार के रूप में देखा जा रहा हैI बायोमैट्रिक हाज़िरी का तर्क सहज रूप से कक्षाओं में CCTV की निगरानी तक जाता है।
जो सोच इस देश के मेहनतकश वर्गों और उनसे आने वाले विद्यार्थियों को चोर ठहराकर उनसे ज़बरदस्ती 'आधार' में नामांकन करवाती है और उनके तमाम तरह के रिकॉर्ड्स पर डिजिटल नज़र रखती है, वही सोच शिक्षकों को भी कामचोर मानकर उनकी बायोमैट्रिक हाज़िरी लेती है और उन्हें CCTV की निगरानी में क़ैद करती है। शिक्षण एक अकादमिक कर्म है और इसे यांत्रिक निगरानी के अधीन करने से सिर्फ़ इन उपकरणों के कारोबारियों का ही फ़ायदा होगा, शिक्षा या स्कूलों का नहीं।  शिक्षकों की वेतन-वृद्धि व अन्य लाभों को परीक्षा परिणामों से जोड़ने का प्रस्ताव बाज़ारवादी मैनेजमेंट से लिया गया है। ग़ुज़रे वर्षों में दिल्ली सरकार के स्कूलों में बोर्ड परिणामों को लेकर प्रशासन द्वारा प्रधानाचार्यों पर अनैतिक स्तर तक दबाव बनाने व उन्हें अपमानित, प्रताड़ित करने के अनुभव हमें इस नीति के नकारात्मक परिणामों के प्रति चेताने के लिए पर्याप्त हैं। 

नो डिटेंशन पॉलिसी के कंधे पर शिक्षा व्यवस्था की नाकामी का बोझ

रोके ना जाने (नो डिटेंशन) की नीति के मौजूदा प्रावधानों को संशोधित किया जाएगा क्योंकि इसने छात्रों के शैक्षिक कार्य प्रदर्शन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है| रोके ना जाने की नीति कक्षा 5 तक ही सीमित होगी और उच्च प्राथमिक स्तर पर फेल किया जाने की प्रणाली को पुन:लागू किया जाएगा| (अध्याय 4)

यह विचार कि विद्यार्थी फ़ेल होने के डर से सीखते हैं, शिक्षाशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है और हम शिक्षकों के कर्म पर भी सवाल खड़े करता है। मगर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा व समाज की बाक़ी व्यवस्था के वैसे-का-वैसा बने रहने पर फ़ेल करने की नीति अपनाने या नहीं अपनाने से कोई निर्णायक असर नहीं पड़ेगा। जब ये तय है कि इतने बच्चों को ही उच्च-शिक्षा के अवसर, वो भी ऊँचे दामों पर, मिलेंगे तो ऐसे में इस नीति से बहुत उम्मीद करना या इसपर आरोप लगाना दोनों निरर्थक होगाI नीति में फेल करने की नीति अपनाने से वंचित वर्गों से आने वाले विद्यार्थियों, खासतौर से छात्राओं, पर स्कूली शिक्षा से बाहर हो जाने की संभावना के बढ़ जाने के प्रति कोई चिंता व्यक्त नहीं की गई हैI इस नीति के तहत ऐसे विद्यार्थियों को कच्ची उम्र में ही वोकेशनल कोर्सों की तरफ ही धकेला जायेगाI ज़रूरत ऐसी आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था और मजबूत सार्वजनिक स्कूल प्रणाली का निर्माण करने की है जो सब बच्चों का शिक्षित होना सुनिश्चित करेगी। 



शिक्षकों की कमी पूरी करने के बहाने स्कूलों के विलय का नायाब तरीका

जब स्कूलों का विलय कर दिया जाएगा तब उन्हें एक ही परिसर में स्थापित किया जा सकेगाI राज्यों के परामर्श से आरटीई अधिनियम में ढील दिए बिना विलय एवं समेकन हेतु सामान्य दिशा निर्देश तैयार किए जाएंगेI यह समेकन देश को सामने दिखाई देने वाले भविष्य में एक कक्षा-एक अध्यापक मानक की प्राप्ति में समर्थ बनाएगाI (अध्याय 4) 

 सरकार द्वारा सार्वजनिक स्कूलों में गिरते नामांकन व कमतर सुविधाओं को एक चुनौती की तरह लेकर कोई उपाय या योजना न बनाना, बल्कि इस बहाने से स्कूलों को बंद करने  की नीति का प्रस्ताव देना शर्मनाक है। यह साफतौर से निजी स्कूलों के कारोबार को फलने-फूलने में मदद करेगाI रहा सवाल संसाधनों के व्यय का, तो शिक्षा जन-कल्याण का विषय है, विकास के दिखावटी समारोहों व प्रचारों की तरह कोई फ़ुज़ूलख़र्च नहीं। राजस्थान जैसे जिन राज्यों में इस नीति पर अमल करके स्कूलों को बंद किया गया है वहाँ का अनुभव यह बताता है कि इसका ख़ामियाज़ा वंचित जातियों व आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के बच्चों, उनमें भी ख़ासतौर से लड़कियों, को स्कूल से महरूम होकर उठाना पड़ा है। दिल्ली में ही हमारे सामने ऐसे ख़तरनाक और भविष्य की मंशा की तरफ़ इशारा करने वाले उदाहरण भी उपस्थित हैं जहाँ दक्षिणी दिल्ली नगर निगम ने गिरते नामांकन का बहाना करके अपना स्कूल एक एनजीओ को सौंप दिया। यह नीति ज़मीन और जनता के संसाधनों को निजी कब्ज़े में देने का ज़रिया बनेगी। बढ़ते GDP के ढोल, अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों में विनिवेश व शिक्षा के उपकर के बावजूद शिक्षा के लिए पैसों की कमी का रोना बदस्तूर जारी हैI इसी दौर में हम यह भी देख रहे हैं कि सरकारें पूंजीपतियों के लाखों करोड़ के ऋण माफ़ कर रही हैंI तो असल सवाल संसाधनों की कमी का नहीं बल्कि प्राथमिकताओं का हैI

ड्रॉप-आउट बच्चों व बाल-मज़दूरों के लिए स्कूलों के दरवाजे बंद

पढ़ाई बीच में छोड़ देने वाले और काम-काजी बच्चों को बिना पूर्णकालिक औपचारिक स्कूलों में उपस्थित हुए अपनी पढाई करने में समर्थ बनाने के लिए मुक्त स्कूली शिक्षा सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा| (अध्याय 4)

समाज में पहले-से ही वंचित-शोषित बच्चों की शिक्षा के लिए पूर्णकालिक स्कूलों की जगह ओपन/अल्पकालीन स्कूलों का  प्रस्ताव भेदभाव पर संस्थागत मुहर लगाता है। क्या यह दोयम दर्जे की नागरिकता का निर्माण लोकतंत्र का अपमान नहीं है? यह प्रस्ताव शिक्षा अधिकार क़ानून के ख़िलाफ़ तो है ही, इससे यह संदेश भी जाता है कि हमारी शिक्षा मुक्तिकामी नहीं, समझौतापरस्त रहेगी। 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने पहली बार इस तरह का शर्मनाक विचार दिया था और अगर सरकार इसकी असफलता की असलियत से वाक़िफ़ होकर आज भी इसे एक 'नेक उपाय' की तरह प्रस्तावित करती है तो यह साफ़तौर से इन बच्चों के प्रति बेईमानी व बदनीयती दिखाता है। इस प्रस्ताव को बाल-मज़दूरी कानून को लेकर हुए उन हालिया संशोधनों के संदर्भ में देखना होगा जिनसे 14 साल से कम उम्र के बच्चों को पारिवारिक धंधों/कामों में इस्तेमाल करने को चालाकी-भरी वैधता दे दी गई है और 14-18 साल के बच्चों के लिए ख़तरनाक समझे जाने वाले कामों की सूची को 83 से घटाकर 3 तरह के कामों तक ले आया गया हैI यह नीति निजी क्षेत्र का मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए कच्ची उम्र के सस्ते व असंगठित श्रमिकों की मजबूर फ़ौज उपलब्ध कराने की योजना हैI        

विद्यार्थियों को ऋण के जाल में फंसाना

आदिवासी बच्चों में शिक्षा स्तर एक गंभीर चिंता का विषय है| गंभीर मुद्दों, जैसे कि कम साक्षरता दरें, स्कूल छोड़ने का अधिक दर. आदिवासी बच्चो की अधिक मृत्यु दर का समाधान किया जाना है| अध्ययन कार्यक्रमों के लिए वित्त सुनिश्चित करने, जो या तो छात्रवृतियों अथवा ऋणों से हो सकता है, के लिए तंत्र बनाने से मेधावी छात्रों को उनके अध्ययन ज़ारी रखने में सहायता मिल सकती है| (अध्याय 4)

उच्च-शिक्षा के लिए ऋण देने की नीति को लेकर दिल्ली सरकार द्वारा जारी किये गये हालिया प्रचारों में हमें इस विचार में निहित अपमान की एक झलक मिलती है। ऋण की बात करने का तो मतलब ही यह है कि सरकार यह मानकर चल रही है, और हम लोगों को भी बता रही है, कि शिक्षा का निजीकरण, व्यावसायीकरण जारी रहेगा तथा वो महँगी होती जायेगी। ज़ाहिर है कि शिक्षा के सबसे बढ़िया संस्थानों में, जोकि आज भी सार्वजनिक हैं, कुछ समय पहले तक तो  फ़ीस इतनी नहीं होती थी कि मध्य-वर्गीय परिवारों को ऋण लेना पड़े। हम अनुमान लगा सकते हैं कि ऊँची फ़ीस चुकाने और ऋण लेकर पढ़ने के लिए मजबूर विद्यार्थियों की आगे की पढ़ाई की संभावना व उनके मनोविज्ञान पर जो प्रभाव पड़ेंगे वो समाज के हित में नहीं होंगे।  जहाँ लोग मकान, इलाज आदि ज़रूरतों के लिए पहले ही ऋण पर निर्भर हैं, वहाँ परिवारों पर शिक्षा के लिए भी ऋण लेने के क्या नतीजे होंगे?
शिक्षा के अंग्रेजीकरण की वकालत

अंग्रेज़ी का ज्ञान छात्र के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय गतिशीलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और यह वैश्विक ज्ञान तक पहुँच प्रदान करता है| अतः बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ने और लिखने में कुशल बनाना आवश्यक है| (अध्याय 4) 

शिक्षा में भाषा के सवाल को लेकर भी दस्तावेज़ के प्रस्ताव आपत्तिजनक हैं। शिक्षाशास्त्र के सर्वमान्य सिद्धांत व शिक्षा सम्बंधी लगभग सभी आयोगों की अनुशंसाओं के विपरीत जाकर इसमें प्रारम्भिक स्तर के लिए भी माध्यम के रूप में मातृभाषा/क्षेत्रीय/स्थानीय भाषा को अपनाने की वकालत नहीं की गई है। इस तरह अंग्रेज़ी-परस्त होने के नाते यह नीति पिछली नीतियों से बिल्कुल अलग है। शिक्षा को पूरी तरह अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की ज़रूरतों को पूरा करने का माध्यम मानकर अंग्रेज़ी के स्थान को और मज़बूत करने की वकालत की गई है। जहाँ निजी स्कूलों में तीन भाषा सूत्र का मखौल उड़ाकर फ्रेंच, जर्मन आदि पढ़ने के विकल्प दिए जाते रहेंगे, वहीं इस नीति के तहत विशिष्ट भाषाई संस्कृति को ढोने का दायित्व सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों पर डाला जाता रहेगाI इस बीच लोक संस्कृति और समृद्ध ज्ञान की वाहक भारत की सैकड़ों जनभाषायें उपेक्षा का शिकार होकर लगातार ख़त्म हो रही हैं। ऐसे में विशिष्ट जनों की भाषाओँ को अतिरिक्त बढ़ावा देना शिक्षा के उसूलों के भी विरुद्ध है और शिक्षा के जनतंत्रीकरण में भी बाधक ही होगा। 

शिक्षा को कॉर्पोरेट के शिकंजे से बचाना होगा

इस नीति के विचार की पृष्ठभूमि में कॉर्पोरेट शक्तियों द्वारा स्कूलों पर शिकंजा कसने व शिक्षा को बाज़ारवादी दर्शन पर खड़ा करने की क़वायद हैI प्रधानाचार्यों व शिक्षकों के काम को प्रबन्धन व नेतृत्व के गुरों पर व्याख्यायित करने का मतलब है कि वो संस्थान के साथी न होकर प्रशासक की भूमिका में होंगे। शिक्षा को निजी प्रबंधन के उसूलों पर चलाने से निजी क्षेत्र की तरह शिक्षा में भी डर, प्रस्तुतिकरण, दिखावे  व नियंत्रण के तत्व हावी हो जायेंगे।  इस दस्तावेज़ में सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, वैज्ञानिक बोध/चेतना, समान स्कूल व्यवस्था जैसी संकल्पनाएँ बिल्कुल नदारद हैं। राज्य शिक्षा में देशी-विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करके इसे मुनाफाखोरी का क्षेत्र घोषित कर रहा हैI अन्य क्षेत्रों की तरह आज शिक्षा में भी नीति-निर्माण को राष्ट्रीय संप्रभुता, लोकतान्त्रिक निर्णय या देश के लोगों की माँग या जरूरत के अधीन समझना बेवक़ूफ़ी होगी। अपने मुख्य स्वरूप और विशिष्ट प्रस्तावों दोनों के स्तर पर शिक्षा नीति अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी ताकतों के प्रभाव के तहत लायी जा रही हैI
शिक्षा के बाज़ारीकरण व निजीकरण के परिणामस्वरूप गुणवत्ता में आई गिरावट और व्यावसायीकरण तथा मुनाफ़ाखोरी का उल्लेख मात्र लफ़्फ़ाज़ी के रूप में किया गया है। इसके बारे में कोई योजना या हस्तक्षेप प्रस्तावित नहीं किया गया है। यह देखने वाली बात है कि शिक्षा में खर्च करने के मामले में हम अभी भी नेपाल, भूटान व अफ्रीका के कई देशों से बदतर स्थिति में हैंI इस सन्दर्भ में  शिक्षा के लिए अपर्याप्त वित्त आवंटन की बात मानते हुए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 6% व्यय करने की ज़रूरत का उल्लेख तो किया  गया है लेकिन इस सम्बंध में कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई गई हैI

 बीते महीनों में स्कूलों के विलय के विरुद्ध कर्नाटक व आँध्र-प्रदेश के शिक्षक व विद्यार्थी संगठनों के मज़बूत व सफल आंदोलन, मैक्सिको में वेतन आदि को विद्यार्थियों के परिणामों से जोड़ने के प्रस्ताव के विरोध में शिक्षक आंदोलन जिसमें कई शिक्षकों ने शहादत तक दी, अमरीकी शहरों में शिक्षकों व अभिभावकों का विद्यार्थियों का बार-बार टेस्ट लेकर उन्हें चिन्हित करने व सतही पाठ्यक्रम पढ़ाने के ख़िलाफ़ हो रहे आंदोलन अमरीका में शिक्षा-ऋण के ख़िलाफ़ विद्यार्थियों के आंदोलन हमारे सामने अंतर्राष्ट्रीय पूँजी के दबाव में लाई जा रही शिक्षा नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध के प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। यह जानते हुए कि दमन पर टिकी अलोकतांत्रिक राज्य-व्यवस्था, शोषण पर टिकी पूँजीवादी अर्थ-व्यवस्था व भेदभाव पर टिकी सामंती समाज-व्यवस्था के रहते केवल शिक्षा के माध्यम से परिवर्तन की उम्मीद रखना बेमानी है, हमारे सामने यही विकल्प बचता है कि सभी मोर्चों पर एकजुटता के संघर्ष जारी रखे जायें।