Wednesday, 10 June 2015

DCPCR का जबाब

लोक शिक्षक मंच की ओर से दिल्ली सरकार के स्कूलों में आधार कार्ड और बैंक खाते की अनिवार्य शर्त के कारण विद्यार्थियों के दाखिले में आ रही समस्याओं को  DCPCR के समक्ष रखा। इस सन्दर्भ में आया जबाब आपके समक्ष प्रस्तुत है। …………………… संपादक। 




Friday, 5 June 2015

पत्र : राजस्थान के स्कूलों को विभिन्न निजी संस्थाओं को सार्वजनिक निजी साझेदारी की नीति के अंतर्गत देने का प्रस्ताव के विरोध में ।

राजस्थान सरकार ने अपने स्कूलों को विभिन्न निजी संस्थाओं को सार्वजनिक निजी साझेदारी  की नीति के अंतर्गत देने का प्रस्ताव किया है और इस सन्दर्भ में लोगों से सुझाव आमंत्रित किया है । मंच की ओर से इस प्रस्ताव के विरोध स्वरूप यह पत्र वहाँ के शिक्षा विभाग को दिया गया है
                         संपादक 

Øe lañ लो॰शि॰म॰/01/मई/2015                                                     fnukad % 30&05&2015
                                   

        लोक शिक्षक मंच , राजस्थान सरकार की स्कूली शिक्षा के लिए सार्वजनिक-निजी साझेदारी की नीति (ड्राफ़्ट) से अपना विरोध दर्ज करता है। प्रस्ताव का विरोध करने के लिए हमारे पास कई मजबूत कारण हैं जिन्हें हम आपके सामने रख रहें हैं -

1-   निराधार दावे व शिक्षा की सतही समझ :  भाग 1.1 में राज्य द्वारा बढ़ते ख़र्च व सरकारी स्कूलों के गिरते स्तर के बारे में जो दावे किये गए हैं वो निराधार हैं। उनके पक्ष में कोई सार्वजनिक रपट, आँकड़ें आदि प्रस्तुत न करके इस गंभीर विषय पर सरकार बिना तथ्यों के फ़ैसला लेने का ख़तरा उठा रही है। इसी तरह, निजी स्कूलों के परीक्षा परिणामों का निराधार गुणगान न सिर्फ़ अनुचित है बल्कि शिक्षा की सतही व ग़लत समझ दर्शाता है जबकि स्कूलों का उद्देश्य एक समतामूलक समाज के निर्माण में योगदान देना है जिसके लिए निजी स्कूलों का समाजविरोधी चरित्र उन्हें सर्वथा अनुपयुक्त बनाता है।
2-   विफलता की स्वीकारोक्ति : भाग 1.2 में यह कहना कि सरकारी स्कूलों के प्रबंधन को सुधारने के लिए इन्हें निजी संचालकों के हाथों में देना ज़रूरी है, सरकार द्वारा अपनी विफलता की स्वीकारोक्ति है। यह अफ़सोस की बात है कि इसकी पड़ताल ज़रूरी नहीं समझी गई कि आख़िर अगर पहले सरकारी स्कूल, सरकार के ही दावे के अनुसार, बेहतर थे तो किन कारणों से और फिर क्यों इनमें गिरावट आई। बजाय इसके कि सरकार वस्तुस्थिति का अध्ययन करके प्रशासन सुधारने का संकल्प लेती, सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का आसान रास्ता अपनाने का फ़ैसला किया है। शिक्षा जैसे जनाधिकार के मुद्दे पर यह एक अलोकतान्त्रिक निर्णय है। 
3-   सलाह-सुझाव की प्रक्रिया खानापूर्ति : भाग 2 से प्रतीत होता है कि सरकार अब नए स्कूल खोलने की नीयत नहीं रखती है। साथ ही जिस ढाँचागत प्रतिबद्धता की बात PPP को सफलता से कार्यान्वित करने के लिए की गई है, वह सरकार की सार्वजनिक स्कूल व्यवस्था के प्रति नदारद दिखती है। इससे साफ़ होता है कि सरकार ने एकतरफा व अन्यायपूर्ण ढंग से निजी संचालकों के स्कूलों को सफल और सार्वजनिक व्यवस्था के स्कूलों को असफल सिद्ध करने का मन पहले ही बना लिया है। ऐसे में लोकतान्त्रिक सलाह-सुझाव की प्रक्रिया खानापूर्ति का भान देती है। 
4-   शिक्षा के बाजारीकरण को प्रोत्साहन : भाग 4.2 फ़ीस देने वाले 60% विद्यार्थियों के संबंध में कहता है कि उनकी फ़ीस क़ानून के अंतर्गत निर्धारित होगी जबकि सच्चाई तो यह है कि फ़ीस नियमन को लेकर कोई क़ानून है ही नहीं। साफ़ है कि यह निजी संचालकों को शिक्षा का व्यापार करके निर्बाध व कुटिलता से मुनाफ़ा कमाने देने की तैयारी है।
5-   वंचित-शोषित तबकों के अधिकारों पर हमला :  भाग 4.3 यह घोषित करके कि स्कूलों में शिक्षकों से लेकर अन्य कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए निजी संचालक स्वतंत्र होंगे और सरकार की इसमें कोई जवाबदेही नहीं होगी, साफ़ करता है कि इन स्कूलों में संविधानसम्मत सामाजिक न्याय के आरक्षण का पालन नहीं होगा। इसके फलस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र में बराबरी के अवसर और सिकुड़ जाएँगे। राजस्थान जैसे राज्य में जहाँ अभी सामाजिक न्याय की प्राप्ति हेतु परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण हैं, यह वंचित-शोषित तबकों के अधिकारों पर बड़ा कुठाराघात होगा। 
6-   माध्यम भाषा चुनने का विकल्प देना गलत : इसी भाग में स्कूली शिक्षा की माध्यम भाषा चुनने का विकल्प निजी संचालक की इच्छा पर छोड़कर सरकार ने शिक्षा की ग़लत समझ का परिचय दिया है। तमाम शिक्षास्त्रीय अनुशंसाओं व संविधान तक में मातृभाषा को अच्छी शिक्षा का अनिवार्य साधन माना गया है। यह नीति इस सिद्धांत की अनदेखी करती है। 
7-   अपारदर्शिता : भाग 7.0 निजी संचालकों के चयन के लिए किसी भी तरह के मापदंडों का हवाला नहीं देता है। इस अपारदर्शिता व गोपनीयता की आहट के चलते पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ जाती है और धाँधली, पक्षपात व मनमर्ज़ी की आशंका जगाती है। 
इन्हीं सब कारणों से शिक्षा में PPP की नीति विश्वभर में असफल हुई है और जनविरोध झेल रही है। असल में किसी भी लोकतान्त्रिक सरकार को संविधान के श्रेष्ठ आदर्शों व मूल्यों के अनुसार सभी बच्चों के लिए पूरी तरह सरकार द्वारा वित्त-पोषित समान स्कूल व्यवस्था खड़ी करने की नीयत और नीति दिखानी चाहिए, शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने की नहीं। 
मैं उम्मीद करता हूँ कि शिक्षा, सामाजिक न्याय, सरकार की छवि व समानता के हितों की रक्षा हेतु इस प्रस्तावित नीति पर लोकतान्त्रिक पुनर्विचार करके इसे ख़ारिज करेंगे / करेंगी  


सधन्यवाद 

Monday, 25 May 2015

लेख : 'उनके स्कूल, हमारे स्कूल'


फ़िरोज़ 

यह किसी सुनियोजित शोध का ब्यौरा नहीं है। मगर फिर भी इसे एक व्यवस्थित व व्यापक अध्ययन के लिए संकेत और दिशा के लिए एक शुरुआत, एक मदद माना जा सकता है। इस मायने में यहाँ वर्णित अनुभव काम के हो सकते हैं। 
दिल्ली के एक निगम स्कूल का लम्बा अनुभव बताता है कि कुछ वर्षों से पहली कक्षा की तुलना में चौथी व पाँचवीं कक्षा में अच्छे-ख़ासे दाख़िले हो रहे हैं। यह एक बालिका स्कूल है पर इसी इलाक़े के बाल स्कूल में भी प्रवेश लेने वालों की संख्या में इस तरह का रुझान है। निगम के अन्य स्कूलों से भी इस तरह के रुझान की जानकारी मिलती है। स्पष्ट है कि दाखिलों के संबंध में विस्तृत स्तर पर आँकड़े इकट्ठे किये बिना बड़ी तस्वीर के बारे में विश्वास से कुछ भी कहना हिमाक़त होगी। शिक्षकों (व अन्यों) के बीच में इस परिघटना को लेकर जो सामान्य समझ है उसमें दो विरोधाभासी तर्क प्रकट होते हैं। एक तरफ़ मान्यता है कि सरकारी स्कूलों के प्रति अविश्वास के कारण, 'नींव मज़बूत' करने की दृष्टि से कुछ अभिभावक अपने बच्चों को प्रारम्भिक दो-चार साल किसी निजी स्कूल में पढ़ाते हैं। दूसरी तरफ़ यह कहा जाता है कि छठी कक्षा से किसी सरकारी स्कूल में - विशेषकर 'प्रतिभा' सरीखे - प्रवेश प्राप्त कराने के लिए निगम में पढ़ाना ज़रूरी हो जाता है क्योंकि एक सरकारी व्यवस्था से अन्य सरकारी व्यवस्था में प्रवेश सुगम-सुलभ, निश्चित ही नहीं होता बल्कि कहीं-कहीं इसकी पूर्व-शर्त भी होती है। सवाल यह है कि अगर एक स्तर पर सरकारी व्यवस्था पर संदेह है तो अन्य स्तर पर ऐसा क्यों नहीं है? यह भी एक चिंता का बिंदु है कि एक बड़े वर्ग ने यह मान लिया है कि सरकारी व्यवस्था के अच्छे-बुरे होने से उसका इससे अधिक सरोकार नहीं है कि वो एक से, अगर सम्भव हो तो, पीछा छुड़ाए और दूसरे का, फिर सम्भव हो तो, दामन पकड़े। इस परिस्थिति को बदला जाना चाहिए, बदला जा सकता है, इस तरह की चेतना सामान्यतः नहीं दिखती। वैसे, एक प्रकार से यह इतना आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि अब तो सर्वशक्तिसम्पन्न सरकारों व स्वयं राज्य द्वारा भी यही घोषित किया जा रहा है कि सरकारी स्कूल व्यवस्था न सिर्फ़ बेकार है बल्कि उसे बेहतर (समतामूलक तो छोड़िये) बनाना उनके बस (असल में इच्छा) की बात नहीं - और इसी तर्क के आधार पर या तो उन्हें बंद करने का रास्ता बचता है या बेचने का। (और राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, तमाम राज्य सरकारें अपनी नाकामी का जश्न सरकारी स्कूलों की बलि देकर मना रही हैं।) फिर भी हैरानी-परेशानी इसलिए है क्योंकि भले ही ये सत्ताधारियों के हित में हो, हमें तो अपना हित समझकर सरकारी स्कूल व्यवस्था के प्रति उदासीन, भाग्यवादी या अवसरवादी रवैया नहीं अपनाना चाहिए।    
शिक्षा को बाजार की एक वस्तु मानने वाली ताक़तों के द्वारा यह लगातार प्रचारित किया जा रहा है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन गिर रहा है क्योंकि अभिभावक इनके घटिया स्तर के कारण अपने बच्चों को निजी स्कूलों में दाख़िल करा रहे हैं। यह पूछा जा सकता है कि अगर गिरता नामांकन एक तथ्य है तो किसी के इसे रेखांकित करने पर ऐतराज़ क्यों। दरअसल आपत्ति का कारण वो मंशा है जिसके चलते इन 'तथ्यों' को पीटा जा रहा है। उदाहरण के लिए, लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा को उनकी आज़ादी के अधिकार से जोड़कर देखा जा सकता है तो उनपर पहरे बिठाने से जोड़कर भी देखा जाता रहा है। 
 उक्त निगम स्कूल की चौथी व पाँचवीं की कुछ कक्षाओं में जाकर यह जानने की कोशिश की शुरुआत की गई कि आख़िर जो छात्राएँ निजी स्कूल से एक सार्वजनिक स्कूल में आई हैं उनके पास इस परिवर्तन के कारणों को लेकर क्या समझ है। चूँकि यह जानकारी एक ही दिन में इकट्ठा की गई, इसे लिखित में दर्ज नहीं किया गया और हर कक्षा में बस लगभग दस मिनट ही रुकना हो पाया, इसलिए यहाँ इस जानकारी को संख्याओं में व्यक्त करना सम्भव नहीं है। सवाल लगभग इन शब्दों में पूछे गए - कौन-कौन इस स्कूल में आने से पहले किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ता था? किसे-किसे पता है कि उनके मम्मी-पापा ने उनका दाख़िला उस स्कूल को छुड़ाकर इस स्कूल में क्यों कराया? दोनों ही सवालों में छात्राओं से हाथ खड़े करवाए गए। दूसरे सवाल के जवाब एक-एक करके पूछे गए। यहाँ उन कारणों को प्रस्तुत किया जा रहा है 
1 फ़ीस बढ़ गई थी, हर साल फ़ीस बढ़ा देते थे। 
2 लेट फ़ीस देने पर सज़ा देते थे, सबके सामने खड़ा कर देते थे, मम्मी-पापा को सुनना पड़ता था। 
3 पापा की नौकरी छूट गई थी, पापा ग़ुज़र गए थे। 
4 बेकार पढ़ाई होती थी, अच्छा नहीं पढ़ाते थे। 
5 मारते थे, मार पड़ती थी। 
6 घर बदलने पर स्कूल दूर हो गया।
यहाँ किसी स्पष्ट तर्क के आधार पर तो इन कारणों को सूचीबद्ध नहीं किया गया है पर शायद पहले दो कारणों का हवाला सबसे ज़्यादा छात्राओं ने दिया हो। चौथा व पाँचवां कारण भी कई छात्राओं ने गिनाया। 
एक सवाल, शायद तैयारी न होने के कारण, सिर्फ़ एक ही कक्षा में पूछा गया - कौन-कौन इस स्कूल को छोड़कर वापस उसी प्राइवेट स्कूल में जाना चाहता है? इसके जवाब में केवल एक छात्रा ने हाथ उठाया और आगे पूछने पर उसने वजह अपनी सहपाठिनों से चल रही नाराज़गी बताई। यह संदेह किया जा सकता है कि अगर उक्त सवाल स्कूल में ही, वो भी एक शिक्षक द्वारा पूछे गए तो फिर इनसे उभरती तस्वीर को प्रामाणिक मानना कितना उचित होगा। सिवाय इसके कि उक्त शिक्षक के अनुसार उनके विद्यार्थियों से संबंध डर पर नहीं टिके हैं और सवाल उन्होंने सहज माहौल व भाव में पूछे थे, हम इस शोधमूलक शंका को ख़ारिज नहीं कर सकते। 
उक्त शिक्षक का यह भी कहना है कि उनके स्कूल में वो और कुछ अन्य शिक्षक इस बात के प्रति सजग-सचेत रहते हैं कि विद्यार्थियों के बीच खासतौर से स्कूलों के संदर्भ में निजी व सार्वजनिक स्थलों के परस्पर चरित्रों की ओर ध्यानाकर्षित करते रहें। कक्षा में भी, सभा आयोजनों में भी व शिक्षकों के बीच आपसी बातचीत में भी। उनके अनुसार विद्यार्थियों से निजी स्कूलों के संदर्भ में उनके अपने व परिचितों के अनुभवों को आधार बनाकर बात करके, एक लोकतान्त्रिक, बराबरी की राजनैतिक समझ विकसित करने का काम किया जा सकता है। मगर निश्चित ही ऐसा अपने स्वयं के सार्वजनिक कर्मस्थल को गंभीरता से लिए बग़ैर करना बेईमानी होगी - अगर नैतिक रूप से सम्भव भी हो तो। 
आज जिस तरह भाषा को विकृत करके कई शब्दों के अर्थ पलटे जा रहे हैं उनमें से 'जवाबदेही' महत्वपूर्ण है। कहा जा रहा है कि सार्वजनिक व्यवस्था के कर्मचारी जवाबदेह नहीं हैं जबकि निजी संस्थाओं में कर्मचारियों की जवाबदेही तय होती है। इसलिए सार्वजनिक संस्थाओं को विफल ही नहीं हानिकारक तक बताया जा रहा है। शब्दों के इस धूर्त फेर में यह बात पूरी तरह बिसराने की क़वायद हो रही है कि निजी संस्था अपने चरित्र में ही केवल निजी ग्राहकों के फ़ौरी संतोष के प्रति सचेत रहेंगी। याद रखने योग्य यह है कि उनके लिए खरीदार का भी दूरगामी हित नहीं, ऐसा क्षणिक संतोष ही काम का है जोकि उनके धंधे के मुनाफ़े से मेल खाए। समाज के प्रति जवाबदेही का तो सवाल ही नहीं उठता क्योंकि इन्हें समाज की संकल्पना की ज़रूरत ही नहीं है। वहीं, सार्वजनिक संस्था में कितना भी विकार आ जाए, वो मूलतः दूरगामी सामाजिक हितों से स्वयं का औचित्य सिद्ध करती है। इस संदर्भ में उक्त शिक्षक बताते हैं कि वो और उनके साथी अक़्सर विद्यार्थियों के समक्ष निजी स्कूलों के जनविरोधी, अलोकतांत्रिक, शिक्षाविरोधी आयामों के उदाहरण देते रहते हैं - कैसे उनमें भेदभाव किया जाता है, दिखावा होता है, न्यूनतम मापदंड पूरे नहीं होते आदि। इसी आधार पर यह दावा किया जा सकता है कि सच्चे लोकतंत्र (जोकि समानता पर आधारित होगा) के लिए जिस तरह के मानस की आवश्यकता है वो सार्वजनिक स्कूल व्यवस्था की माँग करता है, सार्वजनिक संस्थाओं के सार्वभौमीकरण की माँग करता है। जिन बच्चों, लोगों ने सार्वजनिक स्कूल, स्थल, संस्था को अनुभव ही नहीं किया होगा, उनमें हिस्सा ही नहीं लिया होगा, वो भला देश-समाज की राजनीति, राज्य की व्यवस्था को लोकतान्त्रिक मूल्यों पर क्या खड़ा रख पाएँगे। बल्कि निजी स्कूलों, निजी स्थलों-संस्थाओं से निकल रहे, इनमें पल-बढ़ रहे लोग निश्चित ही एक निजी व्यक्तित्व विकसित करके, उसके पोषण की ज़रूरतों को ही देश हित क़रार देते रहेंगे। संक्षेप में कहें तो निजी संस्थाएँ, निजी स्कूल लोकतंत्र के लिए गंभीर ख़तरा हैं क्योंकि ये सार्वजनिक व्यक्तित्व, सार्वजनिक सरोकार, सार्वजनिक मूल्यों के बदले एक निजी संसार को रचते हैं। रही बात सार्वजनिक स्कूल के जनहितकारी उदाहरणों की, तो उसके लिए कुछ भी कहने से बेहतर होगा विद्यार्थियों का इसे अपने अनुभवों से भी आँकना। आख़िर सार्वजनिक स्कूलों की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ शिक्षकों पर नहीं है - उनके लिए राज्य की एक सही नीति व नीयत का होना अनिवार्य शर्त है। 

Thursday, 30 April 2015

मेमोरेंडम : सभी बच्चों के लिए बराबरी की शिक्षा व्यवस्था खड़ी करने की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण माँगें

दिल्ली के शिक्षा मंत्री को लोक शिक्षक मंच ने दिल्ली के सभी बच्चों के लिए बराबरी की शिक्षा व्यवस्था खड़ी करने की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण माँगें प्रस्तुत की ................... संपादक। 

Øe lañ  07 /अप्रैल / 2015                                               fnukad % 26 / अप्रैल / 2015                                                                                 

प्रति
शिक्षा मंत्री  
दिल्ली सरकार
दिल्ली

विषय : सभी बच्चों के लिए बराबरी की शिक्षा व्यवस्था खड़ी करने की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण माँगें।  

महोदय,

लोक शिक्षक मंच शिक्षा के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों का एक समूह है जोकि सरकारी शिक्षा व्यवस्था के मजबूतीकरण के लिए प्रतिबद्ध है। जैसा कि आप जानते हैं, जनता की मूलभूत जरूरतों में शिक्षा भी एक महत्वपूर्ण घटक है और केवल कानून में शिक्षा का अधिकार देना ही इस जरूरत को पूरा नहीं करता। इस मूलभूत जरूरत के लिए आवश्यक है कि सभी बच्चों को पड़ोस के स्कूल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की पूरी व्यवस्था सरकार अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर करे।
इस प्रतिबद्धता को पूरा करने के संदर्भ में लोक शिक्षक मंच आपके समक्ष निम्नांकित माँगें रखता है :

स्कूल के सुचारू ढंग से काम करने से जुड़े बिंदु

·         विद्यार्थियों के लिए जरूरी सभी सुविधाओं को सत्र के आरंभ अर्थात अप्रैल के महीने में ही दे दिया जाए। इससे पूरे वर्ष शैक्षणिक कार्य को प्रभावित होने से बचाया जा सकता है।
·         दिल्ली के प्रत्येक विद्यालय में सफाई कर्मियों की स्थायी नियुक्ति बच्चों की संख्या के अनुपात में की जाए|
·         सभी स्कूलों में पर्याप्त संख्या में गैर-शैक्षणिक स्टाफ नियुक्त किया जाए ताकि शिक्षण से इतर ज़रूरी कामों के लिए विद्यार्थियों की पढ़ाका नुकसान न हो|

सुचारू शिक्षण से जुड़े बिंदु –

·              शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से पूरी तरह से मुक्त किया जाए।
·              शिक्षकों को मध्याहन भोजन की ज़िम्मेदारी से पूर्णरूपेण मुक्त किया जाए और इसकी सभी तरह के निदेशन के कार्य को विद्यालय प्रबंधन समिति को सौंपा जाए।  
·              दिल्ली के प्रत्येक विद्यालय में विशेष अध्यापकों की नियुक्ति की जाए जैसे CWSN शिक्षक, खेल, कला, संगीत आदि के अध्यापक और उन्हें अन्य कामों में व्यस्त न रखा जाए| 

बच्चों के अधिकारों से जुड़े बिंदु

·         सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले प्रत्येक बच्चे की ज़िम्मेदारी सरकार की है| इस हेतु हरेक बच्चे के लिए विद्यालय आने-जाने की मुफ्त व्यवस्था की जाए|
·         प्रत्येक स्कूल में हर स्ट्रीम व विषय उपलब्ध करवाया जाए और दसवीं के उपरांत सभी बच्चों को, बिना लैंगिक व वर्गीय भेदभाव के आधार पर दबाव बनाए, विभिन्न स्ट्रीम्स को पढ़ने के लिए समान रूप से प्रोत्साहित किया जाए।  

स्कूलों की अकादमिक स्वायत्तता से जुड़े बिंदु

·              विद्यालयों की स्वायत्तता का सम्मान किया जाए और उनके अकादमिक कैलंडर को सत्ताधारी फरमानों के हस्तक्षेप से बाधित न किया जाए| पिछले सत्र में कई अवसरों (जैसे शिक्षक दिवस, गाँधी जयंती,  क्रिसमस,  स्वच्छ भारत अभियान) पर स्कूलों में अनुचित हस्तक्षेप किया गया जिससे कि स्कूलों की गरिमा को ठेस पहुँची|

नीतियों से जुड़े बिंदु – 

·         स्कूलों में ठेकाकरण को पूरी तरह से खत्म किया जाए और सभी रिक्तियों को नियमित पदों से भरा जाए।
·         स्कूलों में शिक्षण सहित हर कार्य से एन.जी.ओ. को दूर रखा जाए| हमारा अनुभव व शोध बताते हैं कि शिक्षा को मुनाफा कमाने के लिए इस्तेमाल करने वाली ताक़तें एनजीओ के माध्यम से सरकारी शिक्षा तंत्र को विफल साबित करने के प्रयास करती हैं जिससे कि शिक्षा के बाजारीकरण व निजीकरण के लिए ज़मीन तैयार हो सके|

हम आशा करते हैं कि उपरोक्त मांगों के संदर्भ में आप उचित व त्वरित कार्यवाही करेंगे।



सधन्यवाद



सदस्य, संयोजक समिति          सदस्य, संयोजक समिति          सदस्य, संयोजक समिति
लोक शिक्षक मंच                 लोक शिक्षक मंच                लोक शिक्षक मंच 


पत्र : विद्यालय में दाखिला प्रक्रिया के संदर्भ में

लोक शिक्षक मंच द्वारा दाखिले के लिए कुछ स्कूलों को पत्र लिखा गया है जो कि हमारे सबको दाखिला अभियान का हिस्सा है।   संपादक 

Øe lañ  06 /अप्रैल / 2015                                               fnukad % 26 / अप्रैल / 2015                                                                                 

प्रति 
उप-प्रधानाचार्या 
उच्च माध्यमिक कन्या विद्यालय
ढक्का, दिल्ली

विषय: विद्यालय में दाखिला प्रक्रिया के संदर्भ में।
महोदया,
लोक शिक्षक मंच सार्वजनिक स्कूल व्यवस्था, बच्चों और शिक्षक साथियों के हितों को एक मानते हुये आपके साथ कुछ विचार व चिंताएँ साझा करना चाहता है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि स्कूलों में हमें किन विषम परिस्थितियों और प्रशासनिक दबाव के तहत काम करना होता है। इसके बावजूद आज भी सरकारी स्कूल और शिक्षक सभी बच्चों के शिक्षा अधिकारों के पक्ष में तहेदिल से कार्यरत हैं और अपनी लोकतान्त्रिक ज़िम्मेदारी निभाने में जुटे हुये हैं। फिर भी यह एक कड़वी हक़ीक़त है कि देश के लाखों बच्चे आज भी स्कूलों के बाहर हैं। हमारे इलाक़े में भी ऐसे बच्चे हैं। दूसरी तरफ हम एक ऐसे खतरनाक दौर में हैं जिसमें कि शिक्षा को निजी मुनाफा कमाने के लिए इस्तेमाल करने को आतुर ताक़तें सरकारी स्कूल व्यवस्था व शिक्षकों के विरुद्ध लगातार कुप्रचार कर रही हैं, जनता व हमारे बीच दूरी पैदा की जा रही है और गिरते नामांकन को हमारी विफलता व लोगों से अलगाव दोनों के सबूत के रूप में दिखाया जा रहा है। यह कहना अफसोसनाक है कि अक्सर हमारे स्कूलों में वो बच्चे दाखिला लेने आते हैं जिनके माता-पिता उन्हें और कहीं नहीं पढ़ा सकते, यानि सरकारी स्कूल उनका अंतिम विकल्प हैं। हम समझते हैं कि उपरोक्त संदर्भों में हमारी कानूनी, पेशागत व नैतिक सभी तरह की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि हम अपने स्कूलों के माहौल व प्रवेश प्रक्रिया को समाज के अंतिम पायदान पर खड़े वर्गों के हित में सहज-सुलभ बनाएँ।

हम आपसे अपील करते हैं कि अपने स्कूल को सच्चे अर्थों में जनता की संस्था के रूप में खड़ा करें जहाँ से एक भी प्रार्थी निराश या खाली हाथ ना लौटे।

     
सधन्यवाद


सदस्य, संयोजक समिति              सदस्य, संयोजक समिति                सदस्य, संयोजक समिति

लोक शिक्षक मंच                     लोक शिक्षक मंच                     लोक शिक्षक मंच